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बुधवार, 30 अप्रैल 2014

पँचतंत्र लोकतंत्र पर हावी होने जा रहा है

खाली रास्ते पर
एक खरगोश
अकेला दौड़
लगा रहा है
कछुआ बहुत
दिनों से गायब है
दूर दूर तक
कहीं भी नजर
नहीं आ रहा है
सारे कछुओं से
पूछ लिया है
कोई कुछ नहीं
बता रहा है
दौड़ चल रही है
खरगोश दौड़ता ही
जा रहा है
इस बार लगता है
कछुआ मौज में
आ गया है और
सो गया है या
कहीं छाँव में बैठा
बंसी बजा रहा है
दौड़ शुरु होने से
पहले भी कछुऐ की
खबर भी कोई अखबार
नहीं दिखा रहा है
कुछ ऐसा जैसा
महसूस हो पा रहा है
कछुवा कछुओं के साथ
मिलकर कछुओं को
इक्ट्ठा करवा रहा है
एक नया करतब
ला कर दिखाने के लिये
माहौल बना रहा है
कुछ नये तरह का
हथियार बन तो रहा है
सामने ला कर
कोई नहीं दिखा रहा है
दौड़ करवाने वाला भी
कछुऐ को कहीं नहीं
देखना चाह रहा है
खरगोश गदगद
हो जा रहा है
कछुऐ और उसकी
छाया को दूर दूर तक
अपने आसपास
फटकता हुआ जब
नहीं पा रहा है
‘उलूक’ हमेशा ही
गणित में मार
खाता रहा है
इस बार उसको लेकिन
दिन की रोशनी में
चाँदनी देखने का जैसा
मजा आ रहा है
कछुओं का शुरु से
ही गायब हो जाना
सनीमा के सीन से
दौड का गणित
कहीं ना कहीं तो
गड़बड़ा रहा है
प्रश्न कठिन है और
उत्तर भी शायद
कछुआ ही ले
कर आ रहा है ।

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