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शनिवार, 9 दिसंबर 2017

अचानक से सूरज रात को निकल लेता है फिर चाँद का सुबह सवेरे से आना जाना शुरु हो जाता है

जब भी कभी
सैलाब आता है
लिखना भी
चाहो अगर कुछ

नहीं लिखा जाता है

लहरों के ऊपर
से उठती हैं लहरें
सूखी हुई सी कई
बस सोचना सारा
पानी पानी सा
हो जाता है

इसकी बात से
उठती है जरा
सोच
एक नयी
उसकी याद
आते ही सब  
पुराना पुराना
सा हो जाता है

अचानक नींद से
उठी दिखती है
सालों से सोई
हुई कहीं
की एक भीड़


फिर से तमाशा
कठपुतलियों का
जल्दी ही कहीं
होने का आभास
आना शुरू

हो जाता है

जंक लगता नहीं है
धागों में पुराने
से पुराने कभी भी
उलझी हुई गाँठों
को सुलझाने में
मजा लेने वालों
का मजा दिखाना 

शुरु हो जाता है 

पुरानी शराबें
खुद ही चल देती हैं
नयी बोतल के अन्दर
कभी इस तरह भी
‘उलूक’
शराबों के मजमें
लगे हुऐ जब कभी
एक लम्बा जमाना
सा हो जाता है ।

चित्र साभार: recipevintage.blogspot.com

शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

सुबह एक सपना दिखा उठा तो अखबार में मिला

कठपुतली वाला
कभी आता था
मेरे आँगन में
धोती तान दी
जाती थी एक
मोहल्ले के बच्चे
इक्ट्ठा हो जाते थे
ताली बजाने के
लिये भी तो कुछ
हाथ जरूरी हो
जाते थे
होते होते सब
गायब हो गया
कब पता ही
कहाँ ये चला
कठपुतलियाँ
नचाने वाले
नियम से
चलते हुऎ
हमेशा ही देखे
जाते थे
धोती लांघ कर
सामने भी नहीं
कभी आते थे
कठपुतलियाँ
कभी भी पर्दे
के पीछे नहीं
जाती थी
काठ की जरूर
होती थी सब
पर हिम्मत की
उनकी दाद
सभी के द्वारा
दी जाती थी
धागे भी दिखते
थे साफ साफ
बंधे हुऎ कठपुतलियों
के बदन के साथ
समय के साथ
जब समझ कुछ
परिपक्व हो जाती है
चीजें धुँधली भी हों
तो समझ में आनी
शुरु हो जाती है
कठपुतली वाला
अब मेरे आँगन
में कभी नहीं आता है
कठपुतलियाँ के काठ
हाड़ माँस हो गये हैं
वाई फाई के आने से
धागे भी खो गये हैं
धोती कौन पहनता
है इस जमाने में
जब बदन के कपडे़
ही खो गये हैं
बहुत ही छोटे
छोटे हो गये हैं
कठपुतली का नाच
बदस्तूर अभी भी
चलता जा रहा है
सब कुछ इतना
साफ नजर सामने
से आ रहा है
कठपुतलियाँ ही
कठपुतलियों को
अब नचाना सीख
कर आ रही है
पर्दे के इधर भी हैं
और पर्दे के उधर
भी जा रही हैं
बहुत आराम से
है कठपुतलियाँ
नचाने वाला
अब कहीं और
चला जाता है
उसको इन सब
नाचों में उपस्थिती
देने की जरूरत
कहाँ रह जा रही है
खबर का क्या है
वो तो कुछ होने
से पहले ही
बन जा रही है
क्या होगा ये
भी होता है पता
कठपुतलियाँ सब
सीख चुकी हैं
ऎ आदमी तू
अभी तक है कहाँ
बस एक तुझे ही
क्यों नींद आ रही है
जो सुबह सुबह
सपने दिखा रही है ।

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