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बुधवार, 3 सितंबर 2014

कतार बनाना सीख जाता तो तेरा भी बेड़ा पार हो जाता

कतार में लगी हो
कोई भी चीज तो
सभी को बहुत
अच्छी लगती है
और हर जगह के
कुछ लोग बहुत
माहिर होते हैं
कतार बनवाने में
ऐसे सभी कतार
बनाने वाले जानते हैं
बहुत अच्छी तरह
एक दूसरे को
इन सब कतार
बनाने वालों की
रिश्तेदारियाँ
कभी जात
हो जाती है
कभी इलाका
हो जाता है
कभी धर्म
हो जाता है
मजे की बात है
कभी कभी सकर्म
हो जाता है
कतार बनाने वाले
पहचानते हैं
कौन सबसे अच्छी
कतार बनाता है
कतार बनाने की
इच्छा पूरी करने
के लिये एक
कतार बनाने वाला
दूसरे कतार बनाने
वाले के पास
ही जाता है
कतारें देख कर
कतार बनाने वाले
कभी सीखते हैं
कतार बनाना और
अपनी अपनी
कतार की कमिंयों
को दूर कर ले जाना
लेकिन ये सारे कतारें
बनाने वाले कभी
किसी कतार में
नहीं होते हैं
सही बात भी है
हलवाई भी कहाँ
खाता है अपनी
बनाई हुई मिठाई
और इसमें कहाँ
कहा जा सकता है
कि है कोई भी बुराई
पता नहीं तुम्हारे
जमाने में क्या
होता होगा
पर मेरे जमाने में
हर दूसरा आदमी
जो अपनी जिंदगी
में कभी भी किसी
कतार में शामिल
नहीं हो पाता है
कतार बना ही
ले जाता है
और जो कतार में
चला जाता है
पूरी जिंदगी
कतार से बाहर
नहीं आ पाता है
उसके लिये लैफ्ट
लैफ्ट रह जाता है
और राईट राईट
रह जाता है
‘उलूक’ को अपने
चारों और दिखाई
देते हैं बस और बस
कतार बनाने वाले
और फिर भी बेचारा
ना कतार बनाना
सीख पाता है
ना ही किसी कतार में
शामिल ही हो पाता है ।

चित्र साभार: http://www.shutterstock.com/

सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

पञ्चतन्त्र में सुधार: कूदना छोड़ उड़ना सीख मेंढक

समुद्री जीव
आक्टोपस
बना दिया गया
एक कुऎं का राजा
मिलने जा पहुँचा
मेंढकों से
जब सबने
उससे बोला
एक बार तो
यहां आजा
कतार में खडे़
मेंढक एक एक
कर अपना
परिचय उसे देते
ही जा रहे थे
कुछ कुऎं ही में
रहे हुऎ थे हमेशा
कुछ अंदर बाहर
भी कभी कभी
आ जा रहे थे
अपनी अपनी
जीभों की लम्बाई
बता बता कर
इतरा रहे थे
किस किस तरह के
कीडे़ मकौडे़ मच्छर
वो कैसे कैसे
खा रहे थे
महाराज लेकिन
ये सब कहाँ
सुनने जा रहे थे
व्हेल एक
पाल क्यों नहीं लेते
सब मेंढक
मिल बाट कर
अच्छी तरह
समझाये जा रहे थे
साथ में बता रहे थे
जिस समुद्र को वो
यहाँ के राज पाट
के लिये छोड़
के आ रहे थे
वहाँ एक हजार
समुद्री व्हेलों को
खुद पाल के
आ रहे थे
सारे समुद्र के
समुद्री जन
व्हेल का तेल
ही तेल बना रहे थे
कीडे़ मकौडे़ नहीं
बडी़ मछली का मांस
भी साथ में खा रहे थे
वहाँ की तरक्की का
ये उपक्रम वो मेंढकों
से कुऎं में भी
करवाना चाह रहे थे
मेंढक शर्मा शर्मी
हाँ में हाँ मिला रहे थे
मन ही मन अपने
कूदने की लम्बाई
भी भूलते जा रहे थे
बेचारों को याद भी
नहीं रह पा रहा था
कि नम्बर एक और
नम्बर दो करने भी
अभी तक वो लोग
खेतों की ओर ही
तो जा रहे थे
कितने कुऎं से
बना होता होगा
वो समुंद्र जहाँ
से उनके राजा जी
यहाँ आ रहे थे
कुंद हो चुकी थी
बुद्धि अब तक
कुछ सोच भी
नहीं पा रहे थे ।

मंगलवार, 4 सितंबर 2012

सामान नहीं बस दुकानदार चाहिये

राशन की
दुकान पर
हो रही
मारामार हो
गैस और
कैरोसिन
के लिये
लगी लम्बी
कहीं एक
कतार हो

जब प्रश्न
जीवन और
जीने का
हो जाता है
जरूरी होता है
इसलिये
भीड़ होने
के बावजूद
हर कोई
चला जाता है

दूसरी तरफ
एक भीड़
उस दुकान
पर जाकर
पता नहीं
कोई क्यों
लगाता है

जहां होता
है बस
काम में
ना आने वाला
ढेर सारा
कुछ सामान

कुछ सड़
गया होता है
और
बचा हुआ
आउट
आफ डेट
हो गया
होता है

राशन
और
कैरोसिन
लेने
जाने वाला
उस दुकान
के बगल से
गुजर के
रोज जाता है
थोड़ा दिमाग
लगाता है
उसको
साफ साफ
अंदाज
आ जाता है

इस तरह की
दुकानों पर
हर कोई
सामान ही
खरीदने
को नहीं
आता है

कोई दिखाने
के लिये
चिड़िया के
पंख खरीद
भी अगर
ले जाता है

असली में
वो तो
दुकानदार
के लिये
वहाँ जाता है

उसके बाद
फिर कोई
प्रश्न किसी
के दिमाग में
कहाँ रह
जाता है ।

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