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मंगलवार, 17 जून 2014

भ्रम कहूँ या कनफ्यूजन जो अच्छा लगे वो मान लो पर है और बहुत है

भ्रम कहूँ
या
कनफ्यूजन

जो
अच्छा लगे
वो
मान लो

पर हैंं
और
बहुत हैंं

क्यों हैंं
अगर पता
होता तो
फिर
ये बात
ही कहाँ
उठती

बहुत सा
कहा
और
लिखा
सामने से
आता है
और
बहुत
करीने से
सजाया
जाता है

पता कहाँ
चलता है
किसी और
को भी है
या नहीं है
उतना ही
जितना
मुझे है

और मान
लेने में
कोई शर्म
या झिझक
भी नहीं है
जरा सा
भी नहीं

पत्थरों के
बीच का
एक पत्थर
कंकणों
में से एक
कंकण
या
फिर रेत
का ही
एक कण
जल की
एक बूँद
हवा में
मिली हुई
हवा
जंगल में
एक पेड़
या
सब से
अलग
आदमियों
के बीच
का ही
एक आदमी
सब आदमी
एक से आदमी
या
आदमियों के
बीच का
पर एक
अलग
सा आदमी

कितना पत्थर
कितनी रेत
कितनी हवा
कितना पानी
कितने जंगल
कितने आदमी

कहाँ से
कहाँ तक
किस से
किस के लिये

रेत में पत्थर
पानी में हवा
जंगल में आदमी
या
आदमीं में जँगल

सब गडमगड
सबके अंदर
बहुत अंदर तक

बहुत तीखा
मीठा नशीला
बहुत जहरीला
शांत पर तूफानी
कुछ भी कहीं भी
कम ज्यादा
कितना भी
बाहर नहीं
छलकता
छलकता
भी है तो
इतना भी नहीं
कि साफ
साफ दिखता है

कुछ और
बात कर
लेते हैं चलो

किसी को
कुछ इस
तरह से
बताने से भी
बहुत बढ़ता है

बहुत है
मुझे है
और किसी
को है
पता नहीं
है या नहीं

भ्रम कहूँ
या
कनफ्यूजन
जो
अच्छा लगे
वो
मान लो
पर है
और
बहुत है ।

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

बहुत कनफ्यूजन होता है शिव जब कोई तीसरी आँख की बात करता है

कितनी कथाऐं
कितनी कहाँनियाँ
शिव सुनी थी
तेरे बारे में
पढ़ाई भी गई थी
कभी किसी जमाने में
कोई तेरे विवाह की
बात कहता है
कोई कहता है
ताँडव रोक दिया था
करना आज के दिन
सब कुछ भस्म
हो गया होता वरना 
तीन तीन आँखे
भी हैं तेरी
दो आधी खुली
तीसरी रहती है
सुना बंद
अब आज के दिन
तू भी व्यस्त
होगा बहुत
यहाँ वहाँ
इधर उधर
मंदिरों में तेरे
बह रहा होगा दूध
कुछ करते ही हैं
रोज ही याद तुझे
अपनी पूजा में
और कोई बस
आज के दिन
याद कर कर के
रहा होगा पूछ
दिख रहे होगें
कमंडल हाथ में लिये
बहुत से ब्रह्मचारी
व्यभिचारी फलाहारी
तिलकधारी तेरे द्वार
वो सभी जिनसे
रोज होती है
मुलाकात मेरी
जिनसे हारता है
मेरा मनोबल
एक ही दिन में
एक ही नहीं
कई कई बार
और मुझे ये
भी पता है
तेरी भी आदत है
तेरे द्वार पर
आने वाले सभी
कीड़े मकौंड़ों को
भी आभास रहता है
बहुत भोला है
बंम भोला शिव
छोटे छोटे सभी
पापों को माफ
करता है और
जो कुछ
नहीं करता है
उसी के
लिये खुलती है
कभी क्रोध में तेरी
तीसरी आँख हमेशा
ऐसा एक नहीं
सालों साल में
एक नहीं कई बार
हुआ करता है
पापी भोगते हैं
पापों को
इसीलिये रहते हैं
ऊँचाईयों में हमेशा
उनके ही जहन में
हलाहल की तरह
तू ही वास करता है
तेरी तू ही
जानता है शिव
तुझे ही
पता भी होगा
कलियुग का
कलियुगी प्राणी ही
तेरी एक नहीं
तीन तीन आँखों में
झाँक लेने का
कैसे साहस करता है ।

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