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सोमवार, 26 दिसंबर 2016

पीटना हो किसी बड़ी सोच को आसानी से एक छोटी सोच वालों का एक बड़ा गिरोह बनाया जाता है

बड़ी सोच का
बड़ा कबीर
खुद को दिखा
दिखा कर ही
बड़ा फकीर
हुआ जाता है

छोटी सोच
बता कर
प्रतिद्वन्दी की
अपने जैसों
के गिरोह के
गिरोहबाजों
को समझाकर
आज किसी
की भी एक बड़ी
लकीर को
बेरहमी के साथ
खुले आम
पीटा जाता है

लकीर का
फकीर होना
खुद का
फकीर को
भी बहुत
अच्छी तरह
से समझ
में आता है

फकीर को
लकीर अगर
कोई समझा
पाता है तो
बस कबीर
ही समझा
पाता है

जरूरी नहीं
होता है तीखा
होना अँगुलियों
के नाखूँनो का
किसी की सोच
को खुरचने के लिये
खून भी आता है
लाल भी होता है
सोच समझ कर
योजना बना कर
अगर हाँका
लगाया जाता है
अकेले ज्यादा
सोचना ही
किसी का
कभी उसी
की सोच
को खा जाता है

बोलने के लिये
अकेले आता है
लेकिन
रोज का रोज
समझाया जाता है
इशारों में भी
बताया जाता है
किताबों खोल कर
पढ़ाया जाता है


एक आदमी
का बोलना
लिखने के लिये
एक दर्जन
दिमागों को
काम में
लगाया
जाता है

छोटी सोच
बताने को
इसी लिये
कोई ना कोई
फकीर कबीर
हो जाता है
 बड़ी सोच में
लोच लिये ऐसे
ही फकीर को
बैचेनियाँ खरीदना
खोदना और
बेचना आता है

आसान होता है
किसी की सोच
के ऊपर चढ़ जाना
उसे नेस्तनाबूत
करने के लिये
एक गिरोह की
सोच का सहारा
लेकर
किसी भी सोच
का दिवाला
निकाला जाता है

जरूरी होता है
दबंगों की सोच
का दबंग होना
दबंगई
समझाने के लिये
अकेले चने की
भाड़ नहीं फोड़
सकने की कहानी
का सार समझ में
देर से ही सही
मगर कभी
आता है

‘उलूक’
ठहर जाता है
आजकल
पढ़ते समझते
गोडसे सोचों
की गाँधीगिरी
लिखा लिखाया
खुद के लिये
उसका खुद
के पास ही
छूट जाता है

समझ जाता है
पीटना हो किसी
बड़ी सोच को
आसानी से
एक छोटी
सोच वालों
का एक
बड़ा गिरोह
बनाया जाता है ।

चित्र साभार: Clipart Panda

सोमवार, 17 नवंबर 2014

जरूरी है याद कर लेना कभी कभी रहीम तुलसी या कबीर को भी



बहुत सारी तालियाँ
बजती हैं हमेशा ही
अच्छे पर अच्छा
बोलने के लिये
इधर भी और
उधर भी
 नीचे नजर
आ जाती हैं
दिखती हैं
दूरदर्शन में
सुनाई देती हैं
रेडियो में
छपती हैं
अखबार में
या जीवित
प्रसारण में भी
सामने से खुद
के अपने ही
शायद बजती
भी हों क्या पता
उसी समय
कहीं ऊपर भी
अच्छा बोलने
के लिये अच्छा
होना नहीं होता
बहुत ही जरूरी भी
बुरे को अच्छा
बोलने पर नहीं
कहीं कोई पाबंदी भी
अच्छे होते हैं
अच्छा ही देखते हैं
अच्छा ही बोलते हैं
ज्यादातर होते ही हैं
खुद अपने आप में
लोग अच्छे भी
बुरी कुछ बातें
देखने की उस पर
फिर कुछ कह देने की
उसी पर कुछ कुछ
लिख देने की
होती है कुछ बुरे
लोगों की आदत भी
अच्छा अच्छा होता है
अच्छे के लिये
कह लेना भी
और जरूरी भी है
बुरे को देखते
बुरा कुछ कहते
रहना भी
करते हुऐ याद
दोहा कबीर का
बुरा जो देखन मैं चला
हर सुबह उठने
के बाद और
रात में सोने से
पहले भी ।

 चित्र साभार:
funny-pictures.picphotos.net

मंगलवार, 27 अगस्त 2013

छोटी करना बात को नहीं सिखायेगा तो लम्बी को ही झेलने के लिये आयेगा

कबीर सूर तुलसी 
या उनके जैसे कई
और ने पता नहीं
कितना कुछ लिखा
लिखते लिखते इतना
कुछ लिख दिया
संभाले नहीं संभला
कुछ बचा खुचा
जो सामने था
उसपर भी ना जाने
कितनो ने कितना
कुछ लिख दिया
शोध हो रहे है
कार्यशालाऎं
हो रही हैं
योजनाऎं
चल रही हैं
परियोजनाऎं
चल रही हैं
एक विद्वान जैसे
ही बताता है
इसका मतलब ये
समझ में आता  है
दूसरा दूसरा मतलब
निकालने में तुरंत
ही जुट जाता है
स्कूल जब जाता था
बाकी बहुत कुछ
समझ में आ
ही जाता था
बस इनके
लिखे हुऎ
को समझने की
कोशिश में ही
बस चक्कर थोडा़
सा आ जाता था
कभी किसी
को ये बात
नहीं बता पाता था
अंकपत्र में भाषा में
पाये गये अंको से
सारा भेद पर
खुल ही जाता था
कोई भी इतना
सब कुछ अपने एक
छोटे से जीवन में
कैसे लिख ले
जाता होगा
ये कभी भी
समझ में नहीं
आ पाता था
ये बात अलग है
उनके लिखे हुऎ
का भावार्थ
निकालने में
अभी भी वही
हालत होती है
तब भी पसीना
छूट जाता था
मौका मिलता तो
एक बार
इन लोगों के
दर्शन करने
जरूर जाता
कुछ अपनी
तरफ से
राय भी जरूर
दे के आता
एक आईडिया
कल ही तैरता
हुआ दिख
गया था यहीं
उसी को
लेकर कोई
कहानी बना
सुना आता
क्यों इतनी
लम्बी लम्बी
धाराप्रवाह
भाषा में
लिखते चले
जा रहे हो
घर में बच्चे
नहीं हैं क्या
जो सारी दुनियाँ
के बच्चों का
दिमाग खा रहे हो
सीधे सीधे भी तो
बताया जा
सकता था
एक राम था
रावण को मार के
अपनी सीता को
वापस लेकर घर
तक आया था
फिर सीता को
जंगल में छोड़
कर आया था
किस को पता चल
रहा था कि बीच में
क्या क्या हो गया था
कोई बात नहीं
जो हो गया था
सो हो गया था
अब उसमें कुछ
नहीं रह गया था
इतना कुछ लिख गये
पर अपने बारे में
कहीं भी कुछ आप
नहीं कह गये
सारा का सारा
प्रकाश बाहर
फैला कर गये
पता भी नहीं चला
कैसे सारे अंदर के
अंधकारों पर इतनी
सरलता से विजय
पा कर गये
सब कुछ खुद ही
पचा कर गये
लेकिन एक बात
तो पक्की सभी को
समझा कर गये
लिखिये तो
इतना लिखिये
कि पढ़ने वाला
उसमें खो जाये
समझ में आ
ही जाये कुछ
तो अच्छा है
नहीं आये तो
पूरा ही पागल
हो कर जाये
कह नहीं पाये
इतना लम्बा
क्यों लिखते
हो भाई की
पढ़ते पढ़ते
कोई सो जाये |

मंगलवार, 30 जुलाई 2013

सीधे सीधे बता पागल मत बना

कबीर जैसा
कैसे बनूँ
कैसे कुछ
ऎसा कहूँ
समझ में
खुद के
भी कुछ
आ जाये
समझाना
भी सरल
सरल सा
हो जाये
पहेलियाँ
कहाँ किसी
की सहेलियाँ
हुआ करती हैं
समझने के
लिये दिमाग
तो लगाना
ही पड़ता है
जिसके पास
जितना होता है
उतना ही बस
खपाना पड़ता है
जिसके समझ
में आ गई
जिंदगी को
सुलझाता
चला जाता है
उससे पहेली
पूछने फिर
किसी को
कहीं नहीं
आना पड़ता है
उसका एक
इशारा अपने
आप में पूरा
संदेश हो जाता है
उसे किसी
को कुछ
ज्यादा में
बताना भी
नहीं पड़ता है
दूसरी तरफ
ऎसा भी कहीं
पाया जाता है
जिसको आस पास
का बहुमत ही
पागल बनाता है
जहाँ हर कोई
एक कबूतर को
बस यूं ही देखता
चला जाता है
पूछने पर एक
नहीं हर एक उसे
कौवा एक बताना
जहाँ चाहता है
एक अच्छी भली
आँखो वाले को
डाक्टर के पास
जाना जरूरी
हो जाता है
बस इन्ही बातों
से कोई दीवाना
सा हो जाता है
सीधे सीधे किसी
बात को कहने
में शरमाता है
कभी आदमी
को गधा
कभी गधे
को आदमी
बनाना सीख
जाता है
समझने वाला
समझ भी
अगर जाता है
समझ में आ
गया है करके
किसी को भी
बताना नहीं
चाहता है
अब आप ही
बताइये
बहुमत छोड़ कर
कौन ऎसे पागल
के साथ में आ
जाना चाहता है ।

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