http://blogsiteslist.com
कबूतर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कबूतर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 18 अगस्त 2015

एक रंग से सम्मोहित होते रहने वाले इंद्रधनुष से हमेशा मुँह चुरायेंगे

अपने सुर पर
लगाम लगा
अपनी ढपली
बजाने से अब
बाज भी आ
बजा तो रहा हूँ
मैं भी ढपली
और गा
भी रहा हूँ कुछ
बेराग ही सही
सुनता क्यों नहीं
अब सब
अपनी अपनी
बजाना शुरु
हो जायेंगे तो
समझता क्यों नहीं
काँव काँव
करते कौए
हो जायेंगे
और
साफ सफेद
दूध से धुले हुऐ
कबूतर फिर
मजाक उड़ायेंगे
क्या करेगा
उस समय
अभी नहीं सोचेगा
समय भूल जायेगा
तुझे
और मुझे
फिर
हर खेत में
कबूतरों की
फूल मालाऐं
पहने हुऐ
रंग बिरंगे
पुतले
नजर आयेंगे
पीढ़ियों दर
पीढ़ियों के लिये
पुतलों पर
कमीशन
खा खा कर
कई पीढ़ियों
के लिये
अमर हो जायेंगे
कभी सोचना
भी चाहिये
लाल कपड़ा
दिखा दिखा
कर लोग
क्या बैलों
को हमेशा
इसी तरह
भड़काऐंगे
इसी तरह
बिना सोचे
जमा होते
रहेंगी सोचें
बिना सोचे समझे
किसी एक
रंग के पीछे
बिना रंग के
सफेद रंग
हर गंदगी को
ढक ढका कर
हर बार
की तरह
कोपलों को
फूल बनने
से पहले ही
कहीं पेड़ की
किसी डाल पर
एक बार
फिर से
बार बार
और
हर बार
की तरह ही
भटका कर
ले जायेंगे ।

चित्र साभार: www.allposters.com

शनिवार, 9 अगस्त 2014

बचपन से चलकर यहाँ तक गिनती करते या नहीं भी करते पर पहुँच ही जाते

दिन के आसमान
में उड़ते हुऐ चील
कौओं कबूतरों के झुंड
और रात में
आकाश गंगा के
चारों ओर बिखरे
मोती जैसे तारों की
गिनती करते करते
एक दो तीन से
अस्सी नब्बे होते जाते
कहीं थोड़ा सा भी
ध्यान भटकते
ही गड़बड़ा जाते
गिनती भूलते भूलते
उसी समय लौट आते
उतनी ही उर्जा और
जोश से फिर से
किसी एक जगह से
गिनती करना
शुरु हो जाते
ऐसा एक दो दिन
की बात हो
ऐसा भी नहीं
रोज के पसंदीदा
खेल हो जाते
कोई थकान नहीं
कोई शिकन नहीं
कोई गिला नहीं
किसी से शिकवा नहीं
सारे ही अपने होते
और इसी होते
होते के बीच
झुंड बदल जाते
कब गिनतियाँ
आदमी और
भीड़ हो जाते
ना दिखते कहीं
तारे और चाँद
ना ही चील के
विशाल डैने
ही नजर आते
थकान ही थकान
मकान ही मकान
पेड़ पौँधे दूर दूर
तक नजर नहीं आते
गिला शिकवा
किसी से करे या ना करें
समझना चाह कर
भी नहीं समझ पाते
समझ में आना शुरु
होने लगता यात्रा का
बहुत दूर तक आ जाना
कारवाँ में कारवाँओं
के समाते समाते
होता ही है होता ही है
कोई बड़ी बात फिर
भी नहीं होती इस सब में
कम से कम अपनापन
और अपने अगर
इन सब में कहीं
नहीं खो जाते ।
  

मंगलवार, 6 मई 2014

जिसको काम आता है उसको ही दिया जाता है

अपनी प्रकृति
के हिसाब से
हर किसी को
अपने लिये
काम ढूँढ लेना
बहुत अच्छी
तरह आता है
एक कबूतर
होने से
क्या होता है
चालाक हो अगर
कौओं को सिखाने
के लिये भी
भेजा जाता है
भीड़ के लिये
हो जाता है
एक बहुत
बड़ा जलसा
थोड़े से गिद्धों को
पता होता है
मरा हुआ घोड़ा
किस जगह
पाया जाता है
बहुत अच्छी
बात है अगर
कोई काली स्याही
अंगुली में
अपनी लगाता है
गर्व करता है
इतराता हुआ
फोटो भी कई
खिंचाता है
चीटिंयों की
कतार चल
रही होती है
एक तरफ को
भेड़ो का रेहड़
अपने हिसाब से
पहाड़ पर
चढ़ना चाहता है
एक खूबसूरत
ख्वाब कुछ दिनों
के लिये ही सही
फिल्म की तरह
दिखाया जाता है
देवता लोग
नहीं बैठते हैं
मंदिर मस्जिद
गुरुद्वारे में
हर कोई भक्तों से
मिलने बाहर को
आ जाता है
भक्तों की हो रही
होती है पूजा
न्यूनतम साझा
कार्यक्रम के बारे में
किसी को भी कुछ
नहीं बताया जाता है
चार दिन शादी ब्याह
के बजते ढोल नगाड़ों
के साथ कितना
भी थिरक लो
उसके बाद दूल्हा
अकेले दुल्हन के
साथ जाता है
तुझे क्या करना है
इन सब बातों से
बेवकूफ ‘उलूक’
तेरे पास कोई
काम धाम
तो है नहीं
मुँह उठाये
कुछ भी
लिखने को
चला आता है ।

बुधवार, 2 अप्रैल 2014

समझाने वाले की बात को समझना जरूरी समझा जाता है

पूरी जिंदगी बीतती है  
किसी की कुछ कम
किसी की कुछ ज्यादा
लम्बी ही खींचती है
पर समझ में सबके
सबकुछ अपने अपने
हिसाब का कम या
ज्यादा आ ही जाता है
फिर भी कोशिश
जारी रहती है
समझाने वाले की
हमेशा ही कुछ
ना कुछ समझाने की
सामने वाले को भी
समझाने वाला समझ
में पूरा ही आता है
ये बात अलग है
पता होता है
समझाने वाले को भी
जो वो समझाना
किसी को भी चाहता है
खुद की समझ में
उसके भी जिंदगी भर
बस वही नहीं आ पाता है
समझने वाला पूरी जिंदगी
समझाने वाले से
पीछा नहीं छुड़ा पाता है
समझाने वाले के साथ
भी कोई ना कोई
एक रंगीन छतरी लेकर
जरूर ही इधर या उधर
खड़ा हुआ पाया जाता है
एक श्रँखला बन जाती है
कबूतर के आगे कबूतर
कबूतर के पीछे कबूतर
और बीच वाला कबूतर
अपनी जान साँसत में
हमेशा इस तरह
फँसा ले जाता है
ना निगला जाता है
ना उगला जाता है 

उलूक आधी सदी 
बीत गई तुझे
समझते समझते
तू ही कुछ शरम
कर लेता कुछ
समझ ही लेता
समझाने वालों को
शरम आने की बात
तेरी सोच में भी
कैसे आ जाती है
समझाने वाला
समझने वाले से
हमेशा बीस ही
माना जाता है । 

मंगलवार, 22 अक्तूबर 2013

कौन जानता है किस समय गिनती करना बबाल हो जाये

गिनती करना
जरूरी नहीं हैं
सबको ही आ जाये
कबूतर और कौऐ
गिनने को अगर
किसी से कह
ही दिया जाये
कौन सा बड़ा
गुनाह हो गया
अगर एक कौआ
कबूतर हो जाये
या एक कबूतर की
गिनती कौओं
मे हो जाये
कितने ही कबूतर
कितने ही कौऔं को
रोज ही जो देखता
रहता हो आकाश में
इधर से उधर उड़ते हुऐ
उससे कितने आये
कितने गये पूछना ही
एक गुनाह हो जाये
सबको सब कुछ
आना भी तो
जरूरी नहीं
गणित पढ़ने
पढ़ाने वाला भी
हो सकता है कभी
गिनती करना
भूल जाये
अब कोई
किसी और ज्ञान
का ज्ञानी हो
उससे गिनती
करने को कहा
ही क्यों जाये
बस सिर्फ एक बात
समझ में इस सब
में नहीं आ पाये
वेतन की तारीख
और
वेतन के नोटों की
संख्या में गलती
अंधा भी हो चाहे
भूल कर भी
ना कर पाये
ज्ञानी छोड़िये
अनपढ़ तक
का सारा
हिसाब किताब
साफ साफ
नासमझ के
समझ में
भी आ जाये !

मंगलवार, 2 जुलाई 2013

कभी बड़ा ढोल पीट

कब तक
पीटेगा
कनिस्तर
कभी बड़ा
ढोल पीट
घर के फटे
पर्दे छोड़
नंगी धड़ंगी
पीठ पीट
आती हो
बहुसंख्यकों
को समझ में
ऎसी अब
ना लीक पीट
अपने घर के
कूडे़ को
कर किनारे
कहीं छिपा
ना दिखा
दूर की एक
कोडी़ लाकर
सरे आम
शहर के
बीच पीट
क ख से
कब तक
करेगा शुरु
समय आ
गया अब
एक महंगा
शब्द कोश
ला के पीट
पीट रहे
हैं सब
जब कुछ
किनारे में
जा कर
अपने लिये
ही जब
तू अपने
लिये अब
तो पीटना
ले इन
से सीख
कुछ ना
मिल पा
रहा हो
कहीं गर
तुझे तो
छाती अपनी
ही खोल
और पीट
मक्खियाँ
भिनभिनायें
गिद्ध लाशों
को खायें
किसने कहा
जा के देख
समझदारी
बस दिखा
महामारी की
खबर पीट
घर की
मुर्गी उड़ा
कबूतर
दिल्ली से ला
ओबामा
का कव्वा
बता के पीट
पीटना
है नहीं
तुझको
जब छोड़ना
कुछ बड़ा
सोच कर
बडी़ बातें
ही पीट
कब तक
पीटेगा
कनिस्तर
कभी बड़ा
ढोल पीट ।

मंगलवार, 24 जुलाई 2012

कबूतर कबूतर

नर कबूतर ने
मादा कबूतर को
आवाज देकर
घौंसले से बाहर
को बुलाया
घात लगाकर
बैठी हुई उकड़ू
एक बिल्ली
को खेत में
सामने दिखाया
फिर समझाया
बेवकूफ बिल्ली
पुराने जमाने
की नजर
आ रही है
कबूतर को
पकड़ने के
लिये खुद
ही घात
लगा रही है
जमाना कहाँ
से कहाँ देखो
पहुँचता जा
रहा है
इस पागल को
अब भी बिल्ली
को देखकर
आँख बंद
करने वाला
कबूतर याद
आ रहा है
अरे इसे
कोई समझाये
ठेका किसी
स्टिंग आपरेशन
करने वाले
को देकर
के आये
किसी भी
ईमानदार
सफेद कबूतर
पर पहले
काला धब्बा
एक लगवाये
उसके बाद
उसका जलूस
एक निकलवाये
उधर अपने
खुद के घर
पत्रकार सम्मेलन
एक करवाये
फोटो सोटो
सेशन करवाये
इतना कुछ
जब हो
ही जायेगा
कबूतर खुद
ही शरम
के मारे
मर ही जायेगा
समझदारी
उसके बाद
बिल्ली दिखाये
कबूतर के घर
फूल लेकर
के जाये
शवयात्रा में
शामिल होकर
कबूतरों के
दिल में
जगह बनाये
फिर जब भी
मन में आये
कबूतर
के किसी
भी रिश्तेदार
को घर बुलाये
आराम से
खुद भी खाये
बिलौटे को
भी खिलाये ।

सोमवार, 23 जुलाई 2012

आज बस मुर्गियाँ

आज कुछ
मुर्गियाँ लाया हूँ
खाने वाले
खुश ना होईयेगा
चिकन नहीं
बनाया हूँ बस
लिख कर
मुर्गियाँ फैलाया हूँ
सुबह सुबह
मुर्गियों ने मेरी
बहुत कोहराम
मचाया हुआ था
कल देर से
सोया था रात को
सुबह के
शोर से जागा
तो बहुत
झल्लाया था
कल ही नयी
कुछ तमीजदार
मुर्गियाँ खरीद
के लाया था
पुराने दड़बे
में पुरानी
कम पढ़ी
लिखी मुर्गियों में
लाकर उन को
घुसाया था
नयी मुर्गियाँ
पुरानी मुर्गियों से
नाराज नजर
आ रही थी
इसलिये सब के
सब जोर जोर
से चिल्लाये
जा रही थी
मुर्गियों को मुर्गियों
में ही मिलाया था
मुर्गीखाना था उसी में
डाल के आया था
किसी को लग रहा हो
कबूतर खाना मैने तो
कहीं नहीं बनाया था
क्यों कर रही होंगी
मुर्गियाँ ऎसा
समझने की कोशिश
नहीं कर पा रहा था
अपने खाली दिमाग की
हवा को थोड़ा सा बस
हिलाये जा रहा था
थक हार कर सोचा
मुर्गियों से ही
अब पूछा जाये
इस सब बबाल
का कुछ हल तो
ढूँढा ही अब जाये
मुर्गियों ने बताया
कल जब उनको
लाया जा रहा था
तब उनको ये भी
बताया जा रहा था
इधर की मुर्गियाँ
कुछ अलग
मुर्गियाँ होंगी
कुछ नहीं करेंगी
उनको बहुत
आराम से
सैटल होने को
जगह दें देंगी
पर यहाँ तो
अलग माजरा
नजर आ रहा है
हर मुर्गी में
हमारे यहाँ की
जैसी मुर्गियों का
एक डुप्लीकेट
नजर आ रहा है
मैने बहुत
धैर्य से सुना
और प्यार से
मुर्गियों को
थपथपाया
और समझाया
वहाँ भी मुर्गियाँ थी
यहाँ भी मुर्गियाँ है
वहाँ से यहाँ
आने पर मुर्गी
आदमी तो
नहीं हो जायेगी
हो भी जायेगी
तब भी मुर्गी
ही कहलायेगी
चुप रहे तो
शायद कोई
नहीं पहचान पायेगा
मुँह खोलते ही
दही दूध फैलायेगी
अपनी हरकतों से
पकड़ी ही जायेगी
इसलिये ज्यादा मजे
में तो मत ही आओ
दाना मिल तो रहा है
पेट भर के खाते जाओ
फिर कुकुड़ूँ कूं करते रहो
मेरा बैंड बाजा पहले
से ही बजा हुआ है
तुम उसको फिर से
तो ना बजाओ ।

गुरुवार, 31 मई 2012

निठल्ले का सपना

कौआ अगर
नीला होता
तो क्या होता
कबूतर भी
पीला होता
तो क्या होता
काले हैं कौए
अभी भी
कुछ नया कहाँ
कर पा रहे हैं
कबूतर भी
तो चिट्ठियों 

को नहीं ले
जा रहे हैं
एक निठल्ला
इनको कबसे
गिनता हुवा
आ रहा है
मन की कूँची
से अलग
अलग रंगों
में रंगे
जा रहा है
सुरीली आवाज
में उसकी जैसे
ही एक गीत
बनाता है
कौआ
काँव काँव
कर चिल्ला
जाता है
निठल्ला
कुढ़ता है
थोड़ी देर
मायूस हो
जाता है
जैसे किसी
को साँप
सूँघ जाता है
दुबारा कोशिश
करने का मन
बनाता है
कौए को छोड़
कबूतर पर
ध्यान अपना
लगाता है
धीरे धीरे तार
से तार जोड़ता
चला जाता है
लगता है जैसे
ही उसे कुछ
बन गयी
हो बात
एक सफेद
कबूतर
उसके सर
के ऊपर से
काँव काँव कर
आसमान में
उड़ जाता है।

सोमवार, 23 अप्रैल 2012

आहा मेरा पेड़

मुर्गे
मुर्गियां
कबूतर तीतर
मेरे पेड़ की
एक मिसाल हैं

हर एक
अपना
अपनी
जगह पर
धर्म निभाते हैं

मुर्गियां
मुर्गियों के साथ
कबूतर
कबूतर के साथ
हमेशा
ही पाये जाते हैं
कव्वे
कव्वों से ही
चोंच लड़ाते हैं
धर्म
निरपेक्षता का एक
उत्तम
उदाहरण दिखाते हैं

जंगल के
कानून
किसी को भी
नहीं पढ़ाये जाते हैं
बड़े छोटे
का कोई भेद
नहीं किया जाता है
कभी कभी
उल्लू को भी
राजा बनाया जाता है

कोई
झगड़ा फसाद
नहीं होता है
मेरे पेड़ पर कभी
सरकारी चावल
ताकत के अनुसार
घौंसलों में ही
पहुंचा दिया जाता है

पेड़
के अंदर
कोई लाल बत्ती
नहीं लगाता है

जंगल
जाने पर ही
लाल बत्ती है करके
बस शेर को ही बताता है

कोई किसी
को कभी
थोड़ा सा भी
नहीं डराता है
जिसकी जो
मन में आये
कर ले जाता है

बहुत ही
भाईचारा है,
आनन्द ही
आ जाता है
साल के
किसी दिन जब
सफेद कौआ
काले कौऎ को
साथ लेकर
कबूतर के
घर जाता हुवा
दिखाई दे जाता है।

बुधवार, 18 अप्रैल 2012

छ से छन्द

कविता सविता
तो तब लिखता
अगर गलती से
भी कवि होता

मैं सिर्फ
बातें बनाना
जानता हूँ
छंद चौपाई
दोहे नहीं
पहचानता हूँ

रोज दिखते
हैं यहां कई
उधार लेकर
जिंदगी बनाते

कुछ जुटे
होते हैं
फटती हुवी
जिंदगी में
पैबंद लगाते

जो देखता
सुनता
झेलता
हूँ अपने
आस पास
कोशिश कर
लिख ही
लेता हूँ
उसमें से
कुछ
खास खास

ऎसे में
आप कैसे
कहते हो
छंद बनाओ
हमारी तरह
कविता एक
लिख कर
दिखाओ

गुरु आप
तो महान हो
साहित्य जगत
की एक
गरिमामय
पहचान हो

खाली दिमाग
वालों पर
इतना जोर
मत लगाओ
बेपैंदे के
लोटे को तो
कम से कम
ना लुढ़काओ

क से कबूतर
लिख पा
रहा हो
अगर
कोई यहां
गीत लिखने
की उम्मीद
उससे तो
ना ही लगाओ

हो सके
तो उसे  

ख से
खरगोश
ही
सिखा जाओ

नहीं कर
सको
इतना भी
तो
कम से कम
उसके लिये
एक ताली ही
बजा जाओ।

शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

झपट लपक ले पकड़

जमाना वाकई में
बड़ी तेजी से
बदलता जा रहा है
कौआ कबूतर को
राजनीति सिखा रहा है
कबूतर अब चिट्ठियाँ
नहीं पहुंचाया करता है
कौवा भी कबूतर को
खाया नहीं करता है
कौवा उल्लुओं का
शिकार करने की नयी
जुगत बना रहा है
कौवा कबूतर भेज
कर उल्लूओं को
फंसा रहा है
ये पक्षियों को
क्या होता
जा रहा है
पारिस्थितिकी
को क्यों इस तरह
बिगाड़ा जा रहा है
"आदमी की
संगत का असर 

पक्षियों का
राजनीतिक सफर"
मूँछ मे ताव देता
एक प्रोफेसर
टेढ़े टेढ़े मुंह से
हंसता हुवा
यू जी सी की
संस्तुति हेतु
एक करोड़
की परियोजना
बना रहा है।

रविवार, 13 सितंबर 2009

सत्ता

बरसो के कौओं
के राज से
उकताकर
कबूतरो ने
सत्ता
सम्भाली
और
अब
वे भी
बहुत अच्छा
कांव कांव
करने लगे हैं।

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...