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मंगलवार, 26 मई 2015

शतक इस साल का कमाल आस पास की हवा के उछाल का

फिर से हो गया
एक शतक और
वो भी पुराने
किसी का नहीं
इसी का और
इसी साल का
जनाब क्रिकेट
नहीं खेल रहा है
यहाँ कोई ये सब
हिसाब है लिखने
लिखाने के फितूर
के बबाल का
करते नहीं अब
शेर कुछ करने
दिया जाता भी
नहीं कुछ कहीं
जो भी होता है
लोमड़ियों का
होता है हर
इंतजाम
दिखता भी है
बाहर ही बाहर
से बहुत ही और
बहुत ही कमाल का
हाथियों की होती
है लाईन लगी हुई
चीटिंयों के इशारे
पर देखने लायक
होता है सुबह से
लेकर शाम तक
माहौल उनके
भारी भरकम
कदमताल का
मन ही मन
नचाता है मोर
भी ‘उलूक’
सोच सोच कर
मुस्कुराते हुऐ
जब मिलता नहीं
जवाब कहीं भी
देखकर अपने
आस पास सभी
के पिटे पिटाये
से चेहरों के साथ
बंद आँख और
कान करके
चुप हो जाने
के सवाल का ।

चित्र साभार: www.dreamstime.com

मंगलवार, 16 जुलाई 2013

पूछ रहा है पता जो खुद है लापता

बहुत दिनों से
कई कई बार
सुन रहा था
नया आया है
एक हथियार
कह रहे थे लोग
बहुत ही काम
की चीज है
कहा जा रहा था
उसको सूचना
का अधिकार
एक आदमी
अपना दिमाग
लगाता है और
एक हथियार
अच्छा बना
ले जाता है
दूसरा आदमी
उसी हथियार
को सही जगह
पर फिट करना
सीख जाता है
कमाल दिखाता है
धमाल दिखाता है
ऎल्फ्रेड नोबल का
डायनामाईट कब
का ये हो जाता है
जिसने बनाया
होता है उसे
भी ये पता
नहीं चल
पाता है
उसके घर का
एक लापता
दस रुपिये
के पोस्टल
आर्डर से
उसको ढूँढने
के लिये उसको
ही आवेदन
थमा जाता है
उस बेचारे को
समझ में ही
नहीं आ पाता है
किस से पूछे
कैसे जवाब
इसका बनाया
जाता है कि वो
रहता है आता है
और कहीं भी
नहीं जाता है
तीस दिन तक
बस ये ही काम
बस हो पाता है
जवाब देने की
सीमा समाप्त
भी हो जाती है
जवाब भी तैयार
किसी तरह
कर लिया जाता है
किसी को भी
ये खबर नहीं
होती है कि
लापता इस
बीच फिर
लापता हो
जाता है
सूचना उसकी
कोई भी नहीं
दे पाता है ।

रविवार, 15 जुलाई 2012

कविता कमाल या बबाल

अखबार में छपी
मेरी एक कविता
कुछ ने देख कर
कर दी अनदेखी
कुछ ने डाली
सरसरी नजर
कुछ ने की
कोशिश समझने की
और दी प्रतिक्रिया
जैसे कहीं पर
कुछ हो गया
किसी का जवान
लड़का कहीं खो गया
हर किसी के भाव
चेहरे पर नजर
आ जा रहे थे
कुछ बता रहे थे
कुछ बस खाली
मूँछों के पीछे
मुस्कुरा रहे थे
कुछ आ आ कर
फुसफुसा रहे थे
फंला फंला क्या
कह रहा था
बता के भी
मुझे जा रहे थे
ऎसा जता रहे थे
जैसे मुझे मेरा कोई
चुपचाप किया हुआ
गुनाह दिखा रहे थे
श्रीमती जी को मिले
मोहल्ले के एक बुजुर्ग
अरे रुको सुनो तो जरा
क्या तुम्हारा वो
नौकरी वौकरी
छोड़ आया है
अच्छा खासा मास्टर
लगा तो था
किसी स्कूल में
अब क्या किसी
छापेखाने में काम
पर लगवाया है
ऎसे ही आज
जब अखबार में
उसका नाम छपा
हुआ मैने देखा
तुम मिल गयी
रास्ते में तो पूछा
ना खबर थी वो
ना कोई विज्ञापन था
कुछ उल्टा सुल्टा
सा लिखा था
पता नहीं वो क्या था
अंत में उसका
नाम छपा था
मित्र मिल गये
बहुत पुराने
घूमते हुवे उसी दिन
शाम को बाजार में
लपक कर आये
हाथ मिलाये और बोले
पता है अवकाश पर
आ गये हो
आते ही अखबार
में छा गये हो
अच्छा किया
कुछ छप छपा
भी जाया करेगा
जेब खर्चे के लिये
कुछ पैसा भी हाथ
में आया करेगा
घर वापस पहुंचा
तो पड़ोसी की
गुड़िया आवाज
लगा रही थी
जोर जोर से
चिल्ला रही थी
अंकल आप की
कविता आज के
अखबार में आई है
मेरी मम्मी मुझे
आज सुबह दिखाई है
बिल्कुल वैसी ही थी
जैसी मेरी हिन्दी की
किताब में होती है
टीचर कितनी भी
बार समझाये लेकिन
समझ से बाहर होती है
मैं उसे देखते ही
समझ गयी थी कि ये
जरूर कोई कविता है
बहुत ही ज्यादा लिखा है
और उसका मतलब भी
कुछ नहीं निकलता है।

शुक्रवार, 15 जून 2012

कुछ नहीं

अच्छा तो फिर 
आज क्या कुछ 
नया यहाँ लिखने
को ला रहे हो
या रोज की तरह
आज भी हमको
बेवकूफ बनाने
फिर जा रहे हो
ये माना की
बक बक आपकी
बिना झक झक
हम रोज झेल
ले जाते हैं
एक दिन भी नागा
फिर भी आप
कभी नहीं करते
कुछ ना कुछ
बबाल ले कर
यहाँ आ जाते हैं
लगता है आज कोई
मुद्दा आपके हाथ
नहीं आ पाया है
या फिर आपका
ही कोई खास
फसाद कहीं कुछ
करके आया है
कोई बात नहीं
कभी कभी ऎसा
भी हो ही जाता है
मुर्गा आसपास
में होता तो है
पर हाथ नहीं
आ पाता है
आदमी अपनी
जीभ से लाख
कोशिश करके भी
अपनी नाक को
नहीं छू पाता है
लगे रहिये आप
भी कभी कमाल
कर ले जायेंगे
कुछ ऎसा लिखेंगे
कि उसके बाद
एक दो लोग
जो कभी कभी
अभी इधर को
आ जाते हैं
वो भी पढ़ने
नहीं आयेंगे
कुछ कहना लिखना
तो दूर रहा
सामने पढ़ ही गये
किसी रास्ते में
देखेंगे आपको जरूर
पर बगल की गली से
दूसरे रास्ते में खिसक
कर चले जायेंगे
बाल बाल बच गये
सोच सोच कर
अपने को बहलायेंगे।

शनिवार, 24 दिसंबर 2011

शब्द

शब्द मीठे होते हैं
कानों से होते हुवे
दिल में उतरते है
शहद घोल घोल के

शब्द ही खंजर से
तीखे भी हो जाते हैं
ले आते हैं
ज्वार और भाटे

सभी के पास ही
तो रखे होते हैं
अपने अपने शब्द

हर कोई ढाल
नहीं पाता है
सांचों में अपने
शब्दों को हमेशा

कोई उस्ताद होता है
दूसरों के शब्दों से
अपने को बचाने में
बना लेता है एक
ढाल शब्दों की

एक ही शब्द
देता हैं जिंदगी
किसी को
वही सिखाता है
बंदगी किसी को

किसी के लिये
हो सकता है
कमाल एक शब्द
कोई बना ले जाता
है जाल एक शब्द

तूफान भी अगर
लाता है एक शब्द
तो मलहम भी तो
लगाता है कभी
एक शब्द ।

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