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गुरुवार, 19 सितंबर 2013

सोचता हूं कुछ अलग सा लिखूं पर जब ऐसा देखता हूं तो कैसे लिखूं

बंदर को नहीं
पता होता है
उसका एक
एक करतब
मदारी के कितने
काम का होता है
बंदर को बंदर से
जब लड़ाया जा
रहा होता है
मदारी भी मदारी
की टांग खीचने
का गणित लगा
रहा होता है
मदारी भी क्या करे
उसके ऊपर भी एक
मदारी होता है
बंदर तो पूरी चेन का
एक छोटा सा बस
खिलाड़ी होता है
बंदर की हार या
बंदर की जीत
तय करती है
मदारी उसके अपने
मदारी के कितने
काम का होता है
जरुरी नहीं होता है
कि हरेक मदारी
अपने अपने बंदर
के साथ होता है
मौका पड़ता है तो
दूसरे मदारी के
बंदर का हाथ भी
उसके हाथ होता है
बंदर और बंदरों
की लड़ाईयां
मौके बे मौके
प्रायोजित
करवाई जाती हैं
बंदर इस
काम के लिये
बहुत से बंदरों
को अपने
साथ लेता है
बंदर कभी
नहीं सोचता है
वो क्यों और
किसके लिये
मैदान में होता है
मदारी का काम भी
अपने मदारी के
लिये होता है
हर मदारी के
ऊपर भी एक
मदारी होता है
बंदर बस मैदान का
एक खिलाड़ी होता है
बंदर का बंदर भी
अपना नहीं होता है
एक बंदर एक मदारी के
लिये कुर्बान होता है
ये सब कुछ तो
हर समय हर जगह
पर हो रहा होता है
मेरे देश की
एक खासियत है ये
मजमा जरूर होता है
हर समय होता है
हर जगह हो
रहा होता है
'उलूक'
खुद भी कभी
एक मूक
दर्शक होता है
और कभी
एक बंदर
भी किसी का
हो रहा होता है ।

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