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शनिवार, 9 सितंबर 2017

किस बात की शर्म जमावड़े में शरीफों के शरीफों के नजर आने में

किस लिये
चौंकना
मक्खियों के
मधुमक्खी
हो जाने में

सीखना 
जरूरी
है 
बहुत
कलाकारी
कलाकारों से
उन्हीं के
पैमानों में

किताबें ही
किसलिये
दिखें हाथ में
पढ़ने वालों के

जरूरी नहीं
है नशा
बिकना
बस केवल
मयखाने में

शहर में हो
रही गुफ्तगू
पर कान
देने से क्या
फायदा

बैठ कर
देखा
किया कर
 घर पर ही
हो रहे मुजरे
जमाने में

दुश्मनों की
दुआयें साथ
लेना जरूरी
है बहुत

दोस्त मशगूल
हों जिस समय
हवा बदलवाने
की निविदा
खुलवाने में

‘उलूक’
सिरफिरों
को बात
बुरी लगती है

शरीफों की
भीड़ लगी
होती है
जिस बात को
शरीफों को
शराफत से
समझाने में ।

चित्र साभार: Prayer A to Z

गुरुवार, 31 अगस्त 2017

कभी तो छोड़ दिया कर ‘उलूक’ हवा हवा में हवा बना कर हवा दे जाना

किसी की
मजबूरी
होती है

अन्दर की
बात लाकर
बाहर के
अंधों को
दिखाना
बहरों को
सुनाना
और
बेजुबानों को
बात को
बार बार
कई बार
बोलने
बतियाने
के लिये
उकसाना

सबके
बस में भी
नहीं होती है

झोले
में कौए
रख कर
रोज की
कबूतर बाजी

हर कोई
नहीं कर
सकता है
भागते हुऐ
शब्दों को
लंगोट पहना
पहना कर
मैदान में
दौड़ा ले जाना

कुछ
कलाकार
होते हैं
माहिर होते हैं
जानते हैं
शब्दों को
बाँध कर
उल्लू की
भाँति अंधेरे
आकाश
में बिना
लालटेन बांधे
उड़ा ले जाना

सुना है कहीं
किसी हकीम
लुकमान ने
अपने बिना
लिखे नुस्खे
में कहा है

अच्छा नहीं
होता है
पत्थरों पर
कुछ भी
लिख लिखा
कर सबूत
दे जाना

देख सुन
कर तो कभी
किसी दिन
समझ
लिया कर
‘उलूक’

अन्दर की
बात का
बाहर
निकलते
निकलते
हवा हवा में
हवा होकर
हवा हो जाना।

चित्र साभार: www.clker.com

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

ऊपर वाले के जैसे ही कुछ अपने अपने नीचे भी बना कर वंदना कर के आते हैं

आइये साथ
मिलकर
अपनी अपनी
समझ कुछ
और बढ़ाते हैं
दूर बज रहे
ढोल नगाड़ों
में अपने अपने
राग ढूँढ कर
अपनी सोच के
टेढ़े मेढ़े पेंच
अपनी अपनी
पसंद के झोल में
कहीं फँसाते हैं
अपने घर में
सड़ रहे फलों
पर इत्र डाल कर
चाँदी का वर्क लगा कर
अगली पीढ़ी के लिये
आइये साथ
साथ सजाते हैं
शोर नहीं है
नहीं है शोर
कविताएं हैं गीत हैं
झूमते हैं नाचते हैं गाते हैं
आइये सब मिल जुल कर
अपने अपने घर की
खिड़कियाँ दरवाजे के
साथ में अपनी
आँख बंद कर
दूर कहीं चल रहे
नाटक के लिये
जोर शोर से
तालियाँ बजाते हैं
कलाकारी कलाकार
की काबिले तारीफ है
आखिरकार उम्दा
कलाकारों में से
छाँटे गये कलाकार
के द्वारा सहेज कर
मुंडेर पर सजाया गया
एक खूबसूरत कलाकार है
आइये लच्छेदार बातों के
गुच्छों के फूलों को
मरी हुई सोचों के ऊपर
से जीवित कर सजाते हैं
बहुत कुछ है
दफनाने के लिये
लाशों को कब्र से
निकाल निकाल
कर जलाते हैं
कहीं कोई रोक कहाँ है
अपने अपने घर को
अपनी अपनी दियासलाई
दिखा कर आग लगाते हैं
रोशनी होनी है
चकाचौंध खुद कर के
चारों तरफ झूठ के
पुलिंदों पर सच के
चश्में लगा लगा कर
होशियार लोगों को
बेवकूफ बनाते हैं
नाराज नहीं होना है
‘उलूक’
आधे पके हुऐ को
मसाले डाल डाल कर
अपने अपने हिसाब से
अपनी सोच में पकाते हैं
स्वागत है आइये चिराग
ले कर अपने अपने
रोशनी ही क्यों करें
पूरी ही आग लगाते हैं ।

चित्र साभार: www.womanthology.co.uk

रविवार, 16 अगस्त 2015

कलाकारी क्यों एक कलाकार से मौका ताड़ कर ही की जाती है

मस्जिद में
होती है अजान
सुनी भी जाती है
दिन में एक नहीं
कई बार उसको
पुकारने की
आवाज आती है
कुछ अजीब सा
लगता है जब
समाचार वाचिका
किसी की जय
जयकार की आवाजें
ऐसी जगह से
आने की खबर
जब सुनाती है
ये ऊपर वाले के
समय के साथ
बदलने की तरफ
का एक इशारा
भर है या
नीचे वाले ही
किसी की सोच
कुछ पलट जाती है
बहुत सी बातें
किताबों में कहीं भी
लिखी नहीं जाती हैं
उठती है इस तरह
के मौकों पर
ना समझ में
आती हैं ना ही
खुद को समझाई
ही जाती हैं
किसलिये करते हैं
कुछ कलाकार
केवल कलाकारी
के लिय ही कुछ
सच में अगर दिल
साफ होता है तो
पूजा मस्जिद में
क्यों नहीं की जाती है
और मंदिर में नमाज
क्यों कभी नहीं
कहीं भी पढ़ी जाती है ।

चित्र साभार: www.gograph.com

सोमवार, 3 सितंबर 2012

अच्छी दिखे तो डूब मर

घरवाली की आँखें
एक अच्छे डाक्टर
को दिखलाते हैं
काला चश्मा एक
बनवा के तुरंत
दिलवाते हँ
रात को भी
जरूरी है पहनना
एक्स्ट्रा पैसे देकर
परचे में लिखवाते हैं
दिखती हैं कहीं भी
दो सुंदर सी आँखें
बिना सोचे समझे
ही कूद जाते हैं
तैराक होते हैं
पर तैरते नहीं
बस डूब जाते हैं
मरे हुऎ लेकिन कहीं
नजर नहीं आते हैं
आयी हैं शहर में
कुछ नई आँखे
खबर पाते ही
गजब के ऎसे
कुछ कलाकार
कूदने की तैयारी
करते हुऎ फिर
से हाजिर
हो जाते हैं
हम बस यही
समझ पाते हैं
अच्छे पिता जी
अपने बच्चों को
तैरना क्यों नहीं
सिखाते हैं ।

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