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गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

बहुत कनफ्यूजन होता है शिव जब कोई तीसरी आँख की बात करता है

कितनी कथाऐं
कितनी कहाँनियाँ
शिव सुनी थी
तेरे बारे में
पढ़ाई भी गई थी
कभी किसी जमाने में
कोई तेरे विवाह की
बात कहता है
कोई कहता है
ताँडव रोक दिया था
करना आज के दिन
सब कुछ भस्म
हो गया होता वरना 
तीन तीन आँखे
भी हैं तेरी
दो आधी खुली
तीसरी रहती है
सुना बंद
अब आज के दिन
तू भी व्यस्त
होगा बहुत
यहाँ वहाँ
इधर उधर
मंदिरों में तेरे
बह रहा होगा दूध
कुछ करते ही हैं
रोज ही याद तुझे
अपनी पूजा में
और कोई बस
आज के दिन
याद कर कर के
रहा होगा पूछ
दिख रहे होगें
कमंडल हाथ में लिये
बहुत से ब्रह्मचारी
व्यभिचारी फलाहारी
तिलकधारी तेरे द्वार
वो सभी जिनसे
रोज होती है
मुलाकात मेरी
जिनसे हारता है
मेरा मनोबल
एक ही दिन में
एक ही नहीं
कई कई बार
और मुझे ये
भी पता है
तेरी भी आदत है
तेरे द्वार पर
आने वाले सभी
कीड़े मकौंड़ों को
भी आभास रहता है
बहुत भोला है
बंम भोला शिव
छोटे छोटे सभी
पापों को माफ
करता है और
जो कुछ
नहीं करता है
उसी के
लिये खुलती है
कभी क्रोध में तेरी
तीसरी आँख हमेशा
ऐसा एक नहीं
सालों साल में
एक नहीं कई बार
हुआ करता है
पापी भोगते हैं
पापों को
इसीलिये रहते हैं
ऊँचाईयों में हमेशा
उनके ही जहन में
हलाहल की तरह
तू ही वास करता है
तेरी तू ही
जानता है शिव
तुझे ही
पता भी होगा
कलियुग का
कलियुगी प्राणी ही
तेरी एक नहीं
तीन तीन आँखों में
झाँक लेने का
कैसे साहस करता है ।

गुरुवार, 11 जुलाई 2013

किसने बोला कलियुग में रामराज्य नहीं है आता

बाघ बकरी कभी
खेला जाता था
अब नहीं
खेला जाता
बहुत सी जगह
ये देखा है जाता
बाघ बकरी की
मदद कर उसे
बाघ बनाने में
मदद करने है आता
जहाँ बाघ बकरी
की मदद कतिपय
कारणों से नहीं
है कर पाता
वहाँ खुद ही
शहर की मुर्गियों
से बकरियों के लिये
अपील करवाने की
गुहार भी है लगाता
बाघ जिन बकरियों
के साथ है रहता
उनको खाने की
इच्छा नहीं दिखाता
वो बाघ होता है
इतना गया गुजरा
भी नहीं होता
उसके पास इधर
उधर से भी खाने
के लिये बहुत
है आ जाता
बाघ की टीम
का हर सदस्य
बकरियों को
हमेशा ही है
ये समझाता
बाघ बस बकरियों
को बाघ बनाने के
लिये अपनी
जान है लगाता
जिस बकरी की
समझ में नहीं
आ पाती है बात
उसके हाथ से
बाघ बनने का
स्वर्णिम अवसर
है निकल जाता
बाघ बकरियों को
बाघ बनाने के
लिये ही तो
उनकी लाईन
है लगवाता
अपनी कुछ खास
बकरियों को ही
इसके लिये
मानीटर है बनाता
अब इतना कुछ
कर रहा होता है
अपने लिये भी
कुछ माहौल इससे
बनवा ले जाता
बकरियों का इसमें
कौन सा कुछ
है चला जाता
बकरियों की मैं मैं
का शोर जब
अखबार में उसकी
फोटो के साथ
छप है जाता
उसका कद थोड़ा
सा लम्बा इससे
अगर हो भी जाता
ये सब भी तो
बाघ बकरी के
खेल में आघे को
काम है आता
बाघ का ऎसा
आत्मविश्वास
कहानियों में भी
नजर नहीं आता
कौन कहता है
राम राज्य अब
कहीं यहा नहीं
पाया है जाता
बाघ बकरियों को
अपने साथ है
पानी तक पिलाता
बस कभी जब
महसूस करता है
बकरियों के लिये
कुछ नहीं कर पाता
शहर की मुर्गियों से
उनके लिये
झंडे है उठवाता
बकरियों के लिये
बन जाती है
ये एक बडी़ खबर
अखबार तो कायल
होता है बाघ का
उसे छींक भी आये
उसकी फोटो अपने
फ्रंट पेज में
है छपवाता
बकरियों पर आई
आफत का होने
जा रहा है समाधान
बाघ का बस
होना ही
बकरियों के साथ
काम के होने का
संकेत है हो जाता
बाघ बकरी कभी
खेला जाता था
अब नहीं है
खेला जाता ।

शुक्रवार, 8 मार्च 2013

जैसा करेगा वैसा भरेगा, जब नहीं रहेगा तब क्या करेगा?

क्यों अपने लिये
औखली खुद
ही बनाता है
अपना सिर
फिर उसके अंदर
डाल के आता है
सारे फिट
लोगों के बीच
अपने को मिसफिट
जानते बूझते
क्यों बनाता है
जब देखता है
बिना रीढ़ की
हड्डियों का
चल रहा है राज
तू अपनी जबान
की रेल पर रोक
क्यों नहीं लगाता है
हर नया राजा
इस कलियुग में
पहले वाले राजा से
ताकतवर ही
भेजा जाता है
पहले वाले राजा के
किये गये गड्ढों को
जब वो भी नहीं
पाट पाता है
कोशिश करता है
गड्ढे को और
बडा़ बनाता है
फिर तेरा इस्कूल
एक दिन पूरा
उसके अंदर
कोई ना कोई
जरूर घुसा
ले जाता है
फिर तुझ बेवकूफ
को पता नहीं
क्या हो जाता है
क्यों थोडी़ मिट्टी
लेकर गड्ढे को
पाटने चला जाता है
समय रहते किसी
नटवर लाल को
तू भी गुरू
क्यों नहीं बनाता है
माना कि वेतन तू
अपना खा
ही नहीं पाता है
पर जमाना ऊपर के
पैसे वाले को ही
इज्जत दे पाता है
इस छोटी सी
बात को तू क्यों
नहीं समझ पाता है
देखता नहीं है
तेरे स्कूल में
तेरे को क्यों
कोई मुँह नहीं
कहीं लगाता है
तेरी सबकी पैंट में
छेद दिखाने की
खराब आदत से
हर कोई परेशान
नजर आता है
किसी को देखता
है प्रतिकार
करते हुऎ कभी
जब राजा उल्टी
बाँसुरी बजाता है
तरस आता है
चिंता भी होती है
तेरी आदतों पर
मुझको कई बार
ऊपर वाले की
तरफ मेरा हाथ
तेरे लिये ऎसे में
उठ जाता है
क्यों वो तेरे को
गाँधी के तीन
बंदरों जैसा नहीं
बना ले जाता है
जहाँ निनानवे
लोगों को कोई
मतलब नहीं
कुछ रह जाता है
तू सौंवा क्यों
अपने को ऎसे
माहौल में
उखड़वाता है ।

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