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मंगलवार, 8 जुलाई 2014

मुक्ति के मार्ग चाहने वाले के हिसाब से नहीं होते हैं

एक दिन के
पूरे होने से
जिंदगी बढ़ी
या कम हुई
ऊपर वाले के
यहाँ आवेदन
करने के
हिसाब से तो
अनुभव में
इजाफा
हुआ ही कहेंगे
नीचे वालों के
हिसाब से
देखा जाये
तो जगह
खाली होने के
चाँस बढ़ने
से दिन
कम ही होंगे
गणित जोड़
घटाने का
गणित के
नियमों के
हिसाब से
नहीं होगा
अपनी सुविधा
के हिसाब
से होगा
जो कुछ
भी होगा
या होना होगा
वैसे भी दिन
गिनने वाले
कम ही होते हैं
बाकी सारे
हिसाब किताब
के ऊपर
टाट रखकर
बैठे होते हैं
फर्क किसे
पड़ता है
थोड़ा भी
उनके हिसाब
किताब में
दिन आधे या
पूरे होते हैं
बाकी सभी
के लिये
मुक्ति के
कहीं भी
कोई भी मार्ग
कहीं भी
नहीं होते हैं
सब मिलकर
काँव काँव
कर लेते हैं
एक ही
आवाज में
मजे की बात
है ना ‘उलूक’
जो कौए भी
नहीं होते हैं ।

गुरुवार, 31 मई 2012

निठल्ले का सपना

कौआ अगर
नीला होता
तो क्या होता

कबूतर भी
पीला होता
तो क्या होता

काले हैं कौए
अभी भी
कुछ नया कहाँ
कर पा रहे हैं

कबूतर भी
तो चिट्ठियों 

को नहीं ले
जा रहे हैं

एक निठल्ला
इनको कबसे
गिनता हुवा
आ रहा है

मन की कूँची
से अलग
अलग रंगों
में रंगे
जा रहा है

सुरीली आवाज
में उसकी जैसे
ही एक गीत
बनाता है

कौआ
काँव काँव
कर चिल्ला
जाता है

निठल्ला
कुढ़ता है
थोड़ी देर
मायूस हो
जाता है

जैसे किसी
को साँप
सूँघ जाता है

दुबारा कोशिश
करने का मन
बनाता है

कौए को छोड़
कबूतर पर
ध्यान अपना
लगाता है

धीरे धीरे तार
से तार जोड़ता
चला जाता है

लगता है जैसे
ही उसे कुछ
बन गयी
हो बात

एक सफेद
कबूतर
उसके सर
के ऊपर से
काँव काँव कर
आसमान में
उड़ जाता है।

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