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रविवार, 5 अक्तूबर 2014

अभी अपनी अपनी बातें है बहुत हैं तेरी मेरी बातें कभी मिल आ वो भी करते हैं

कभी मिलेगी फुरसत
इन सब बातों से
तो तेरी कुछ बात भी
लिख के कहीं रख लूंंगा
अभी तो समेटने में
लगा हूँ अपने आस पास
के फैल चुके रेगिस्तानी
कांंटो की फसल को
जो जाने अन्जाने
में खु
द ही बोता
चला जा रहा हूँ
देख कर उगे हुऐ
बहुत ही खूबसूरत
फूल कैक्टस के
बहुत से रेगिस्तानों में
बिना पानी और
मिट्टी के भी
कई कई तो उगते हैं
कई कई सालों में
बस एक बार ही
और हमेशा इंतजार
रहता है उनके
किसी सुबह मुँह अंधेरे
खिल उठने का
चुभने वाली चीजें
वैसे तो वास्तु
के अनुसार
घर के सामने से
नहीं रखी जाती हैं
लेकिन बैचेनियाँ
कोई बेचे या ना बेचे
अपने लिये अपने आप
ही खरीदी जाती हैं
धुंंऐ और कोहरे में
वैसे भी दूर से कोई
फर्क नजर नहीं आता है
एक कहीं कुछ
जलने से बनता है
और दूसरा कहीं
कुछ बुझाने के बाद ही
राख के ऊपर से मडराता है
अब कैसे कहे कोई
कि इतना कुछ है
उलझा हुआ आस पास
एक दूसरे से
सुलझाने की कौन सोचे
बस लिख कर रख देने
से ही काम चल जाता है
तुझ पर है और
बहुत कुछ है
लिखने के लिये
लिखूंंगा भी किसी दिन
अभी तो अपने
बही खाते के
हिसाब किताब को ही
कुछ लिख लिखा
कर रख लूँ कहीं
किसी पन्ने पर
तब तक तेरे पास भी
बहुत मौके हैं
अपने हिसाब किताब
निबटाने के लिये
मिलते हैं किसी दिन
कभी बैठ कर
अपने अपने
बही खातों के साथ
कुछ सवालों के हल
हर किताब में
एक जैसे ही
मिला करते हैं ।

चित्र साभार: http://www.clipartillustration.com

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