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गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

बस चले मेरा तो अपने घर को भी केन्द्रीय बनवा दूँ !

जैसे ही मैने सुना
वो एक बीमार के लिये
नये कपडे़ कुछ
बनाने जा रहा है
बीमारी उसकी
दिख ना जाये
किसी को गलती
से भी कहीं
उसके लिये एक महल
बना कर उसे उसमें
सुलाने जा रहा है
खाने पीने का इंतजाम
बहुत अच्छा हो जायेगा
केंद्र से मिलने वाली
ग्रांट ढेर सारी
दिलवा रहा है
मुझे याद आ गयी
उसकी पुरानी साख की
जब उसकी छत्र छाया
में बहुत से कोयले
हीरे हो जाया करते थे
तब उसके पास कुछ
नहीं हुआ करता था
वो बहुतों को बहुत
कुछ दिया करता था
इन्ही लोगों ने
उस समय उसकी
बीमारियों को बढ़ाया
वो गेहूँ खाता था
उसे डबलरोटी और
केक का लालच दिलवाया
पैबंद पर पैबंद लगा कर
नया हो गया है
हम सब को समझाया
अब वो फिर वही
कारनामा दुहराने
जा रहा है
पैबंद लगे पर
पैबंद एक नया
फिर लगवा रहा है
हम आदी हो चुके
पुराने कभाड़ को
यूँ ही सजाने के
नया बने कुछ
नयी जमीन पर कहीं
नहीं सोचेंगे हम कभी
किसके पास है
फुरसत अपने
को छोड़ के सोचने की
और कौन दे रहा है
कुछ पैसे हमें
ऎसी बातों को
पचाने के ।

गुरुवार, 31 जनवरी 2013

कलियुगी गांंधियों का कारनामा बापू तू ना घबराना

टाँग अढ़ाना
अब छोड़ दे
पूरा का पूरा
आदमी 
अढ़ा
खुद नहीं कर
सकता है अगर
किसी  एक को
मोहरा तू बना
मोहरा हाथी
घोड़ा या ऊँट
में से कोई भी
हो सकता है
प्यादों को
एक
आवाज में
सजा या
गजबजा
सकता है
प्यादे नये
जमाने की
हवा खाये
खिलखिलाये
होते हैं
समझदारी से
अपनी टाँगों
का बीमा भी
कराये होते हैं
टाँग अढ़ाने
वाले को मुँह
बिल्कुल
नहीं लगाते हैं
पूरा फसाने
वाले पर
दिलो जान
से कुर्बान
बातों बातों
में हो जाते हैं
मौज में आते
हैं तो कम्बल
डाल कर फोटो
भी खिंचवाने में
जरा भी
नहीँ शर्माते हैं
टाँग अढा‌ने
वाला तो
बेचारा सतयुग
से मार खाता
ही आ रहा है
राम के जमाने
में तो रावण
मारा गया था
कलियुग में
आकर राम
ही खुद अपनी
टाँग 
अढ़ा रहा है 
सबको प्यार
से समझाया
जा रहा है
अभी भी
वक्त है थोड़ी
समझदारी
खरीद या लूट
कर जा ले आ
जवान बंदरों की
सेना ही
बस अब बना
पुराने बंदरों
को घर पर
ही रहना है
का नुस्खा
जा थमा
हनुमान जी
की
फोटो बंटवा
छपवा बिकवा
राम को पेड़
पर चढ़ा
रावण के
हाथ में एक
आरी दे के आ
टाँग 
अढ़ाना
बन्द कर
पूरा अढ़ना
सीख जा
नये जमाने
का गांंधी
तू ही
कहलायेगा
सब्र कर
थोड़ा रुक जा
ताली बजवाना
जारी रख
हाथों को
काम में ला
टाँग का
भरोसा छोड़ दे
मान भी जा
मत 
अढ़ा

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