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गुरुवार, 10 अक्तूबर 2013

राम तुलसी को कोस रहा होता अगर वो सब तब नहीं आज हो रहा होता

हुआ तो
बहुत कुछ था
एक मोटी
किताब में
सब कुछ
लिखा गया है
कुछ समझ में
आ जाता है
जो नहीं आता है
सब समझ चुके
विद्वानो से पूछ
लिया जाता है
मान लिया
जाता है
पढ़ा लिखा
आदमी कभी भी
किसी को बेवकूफ
नहीं बनाता है
वही सब
अगर आज
हो रहा होता
तो राम
तुलसी को
बहुत कोस
रहा होता
क्या कर
रहा है
पता नहीं
इतने दिनो से
अभी तक
तो पूरी
रामचरित मानस
को छ्पने को
दे चुका होता
प्रोजेक्ट
इस पर भी
भेजने के
लिये बोला था
आवेदन तो
कम से कम
कर ही
दिया होता
आपदा के
फंड से
दीर्घकालीन
अध्ययन के
नाम पर कुछ
किसी से
कहलवा कर
अब तक
दे दिलवा
भी दिया होता
हनुमान जी
आये थे
खोद कर
ले गये थे
संजीवनी
का पहाड़
केदारनाथ
में जो हुआ
उसी के
कारण हुआ
इतना ही तो
लिखना होता
लिख ही
दिया होता
पर ये सब
आज के
दिन कैसे
हो रहा होता
थोड़ा सा भी
समझदार होता
तो तुलसीदास
नहीं कुछ और
हो रहा होता
बिना कुछ
लिये दिये एक
कालजयी ग्रंथ
लिख लिखा
कर ऐसे ही
बिना कोई
अ‍ॅवार्ड लिये
दुनिया से
थोड़ा विदा
हो गया होता ।

मंगलवार, 13 अगस्त 2013

कभी एक रोमानी खबर क्यों नहीं तू लाता है !

सब कुछ तो वैसा 
नहीं होता है जैसा
रोज का रोज आकर
तू यहां कह देता है
माना कि अंदर से
ज्यादातर वही सब
कुछ निकलता है
जैसा कि अपने आस
पास में चलता है
पर सब कुछ तुझे
ही कैसे और क्यों
समझ में आता है
तेरे वहाँ तो एक से
बढ़कर एक चिंतकों
का आना जाना
हमेशा से ही
देखा जाता है
पर तेरी जैसी
अजीब अजीब सी
परिकल्पनाऎं लेकर
तो कोई ना तो
कहीं आता है
ना ही कहीं पर
जाकर बताता है
दूसरी ओर देख
बहुत सी चीजें जो
होती ही नहीं है
कहीं पर भी
दिखती नहीं हैं
उन विषयों पर
भी आज जब
विद्वानो द्वारा
बहुत कुछ लिखा
हुआ सामने आता है
शब्दों के चयन का
बहुत ही ध्यान
रखा जाता है
भाषा अलंकृत होती है
ऊल जलूल कुछ भी
नहीं कहा जाता है
तब तू भी ऎसा कुछ
कालजयी लिखने की
कला सीखने के लिये
किसी को अपना गुरू
क्यों नहीं बनाता है
वैसे भी रोज का रोज
सारी की सारी बातों
को कहना कौन सा
इतना जरूरी
हो जाता है
जहाँ तेरे चारों ओर
के हजारों लोगों को
अपने सामने गिरते
हुऎ एक मकान को
देखकर कुछ भी नहीं
हुआ जाता है
तू बेकार में एक
छोटी सी बात को
रेल में बदलकर
हमारे सामने रोज
क्यों ले आता है
अपना समय तो
करता ही है बरबाद
हमारा दिमाग भी
साथ में खाता है ।

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