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रविवार, 4 सितंबर 2016

समय को मत समझाया कर किसी को एकदम उसी समय

ये तय है
जो भी
करेगा कोशिश
लिखने की
समय को
समय पर
देखते सुनते
समय के साथ
चलते हुए

समय से ही
मात खायेगा

लिखते ही हैं
लिखने वाले
समझाने के
लिये मायने
किसी और
की लिखी
हुई पुरानी
किताब में
किसी समय
उस समय के
उसके लिखे
लिखाये के

समझते हैं
करेंगे कोशिश
उलझने की
समय से
समय पर
ही आमने
सामने अगर
समय की
सच्चाइयों से
उसी समय की

समय के साथ
ही उलझ जाने
का डर
दिन की रोशनी
से भी उलझेगा
और
रात के सपनों
की उलझनों
को भी
उलझायेगा

अच्छा है बहुत
छोड़ देना
समय को
समझने
के लिये
समय के
साथ ही
एक लम्बे
समय के लिये

जितना पुराना
हो सकेगा समय
एक मायने के
अनेकों मायने
बनाने के नये
रास्ते बनाता
चला जायेगा

कोई नहीं
देखता है
सुनता है
समय की
आवाज को
समय के साथ
समय पर

ये मानकर

किसी का
देखा सुना
किसी को
बताया गया
किसी और
का लिखा
या किसी से
लिखवाया गया
बहुत आसान
होगा समझाना
बाद में कभी
समय लम्बा
एक बीत
जाने के बाद
उस समय
का समय
इस समय
लौट कर भी
नहीं आ पायेगा

कुछ का कुछ
या कुछ भी
कभी भी
किसी को भी
उस समय के
हिसाब से
समझा ही

दिया जायेगा ।

चित्र साभार: worldartsme.com

सोमवार, 1 जून 2015

बुद्धिजीवियों के शहर में चर्चा है किताबों की का कुछ शोर हो रहा है

भाई बड़ा गजब हो रहा है
कोई कुछ भी नहीं कह रहा है
फुसफुसा कर कहा
बुद्धिजीवियों से भरे
एक शहर के एक बुद्धिजीवी ने
बगल में बैठे दूसरे बुद्धिजीवी से
चिपकते चिपकते हुऐ कान
के पास मुँह लगाते हुऐ
बहुत बुरा
सच में बहुत बुरा हो रहा है
बड़ा ही गजब हो रहा है
मैं भी देख रहा हूँ
कई साल से यहाँ पर
बहुत कुछ हो रहा है
समझ भी नहीं पा रहा हूँ
कोई कुछ भी क्यों
नहीं कह रहा है
एक ने सुनते ही
दूसरे का जवाब
जैसे ही लगा उसे
उसका तीर निशाने
पर लग रहा है
दुबारा फुसफुसा कर कहा
सुनो
सुना है कल शहर में
कुछ बाहर के शहर के
बुद्धिजीवियों का कोई
फड़ लग रहा है
किताबों पर किसी
लिखने लिखाने वाले की
कोई चर्चा कर रहा है
फुसफुसाते क्यों नहीं
तुम वहाँ जा कर कि
यहाँ हो रहा है और
गजब हो रहा है
कितनी अजीब सी
बात है देखिये तो जरा
हर कोई एक दूसरे के
कान में जा जा कर
फुस फुस कर रहा है
कोई किसी से कुछ
नहीं कह रहा है
कुछ आप ही कह दें
इस पर जरा जोर
कुछ लगाकर
यहाँ तो फुसफुसाहट
का ही बस जोर हो रहा है ।

चित्र साभार: www.clipartreview.com

शुक्रवार, 22 मई 2015

समय समय के साथ किताबों के जिल्द बदलता रहा

गुरु लोगों ने
कोशिश की
और सिखाया भी
किताबों में
लिखा हुआ काला
चौक से काले
श्यामपट पर
श्वेत चमकते
अक्षरों को उकेरते
हुऐ धैर्य के साथ
कच्चा दिमाग भी
उतारता चला गया
समय के साथ
शब्द दर शब्द
चलचित्र की भांति
मन के कोमल
परदे पर सभी कुछ
कुछ भरा कुछ छलका
जैसे अमृत क्षीरसागर
में लेता हुआ हिलोरें
देखता हुआ विष्णु
की नागशैय्या पर
होले होले डोलती काया
ये शुरुआत थी
कालचक्र घूमा और
सीखने वाला खुद
गुरु हो चला
श्यामपट बदल कर
श्वेत हो चले
अक्षर रंगीन
इंद्रधनुषी सतरंगी
हवा में तरंगों में
जैसे तैरते उतराते
तस्वीरों में बैठ
उड़ उड़ कर आते
समझाने सिखाने का
सामान बदल गया
विष्णु क्षीरसागर
अमृत सब अपनी
जगह पर सब
उसी तरह से रहा
कुछ कहीं नहीं गया
सीखने वाला भी
पता नहीं कितना कुछ
सीखता चला गया
उम्र गुजरी समझ में
जो आना शुरु हुआ
वो कहीं भी कभी भी
किसी ने नहीं कहा
‘उलूक’ खून चूसने
वाले कीड़े की दोस्ती
दूध देने वाली एक
गाय के बीच
साथ  रहते रहते
एक ही बर्तन में
हरी घास खाने
खिलाने का सपना
सोच में पता नहीं
कब कहाँ और
कैसे घुस गया
लफड़ा हो गया
सुलझने के बजाय
उलझता ही रहा
प्रात: स्कूल भी
उसी प्रकार खुला
स्कूल की घंटी
सुबह बजी और
शाम को छुट्टी
के बाद स्कूल बंद
भी रोज की भांति
उसी तरह से ही
आज के दिन
भी होता रहा ।

चित्र साभार: www.pinterest.com

शनिवार, 9 मई 2015

लिखने लिखाने वालों का लिखना लिखना तेरा लिखना लिखाना लिखने जैसा ही नहीं

लिखने लिखाने
की बातें वैसे बहुत
कम की जाती हैं
कभी कभी
गलतियाँ
भी मगर हो
ही जाती हैं
बातों बातों में
पूछ बैठा कोई कहीं
लिखने वाले से ही
लिखने लिखाने
के बावत यूँ ही
क्यों लिखते हो
कहाँ लिखते हो
क्या लिखते हो
ज्यादा कुछ नहीं
कुछ ही बताओ
मगर बताओ तो सही
हम तो बताते भी हैं
लिखते लिखाते भी हैं
छपते छपाते भी हैं
किताबों में कहीं
अखबारों में कहीं
तुम तो दिखते नहीं
लिखते हुऐ भी कहीं
पढ़े तो क्या पढ़े
कैसे पढ़े कुछ कोई
लिखने वाले के
लिये ऐसा नहीं
किसी ने पूछी हो
नई बात अब कोई
उसे मालूम है
वो भी लिखता है कुछ
कुछ भी कभी भी
कहीं भी बस यूँ ही
लिखता है
जिनके कामों को
जिनकी बातों को
उनको करने
कराने से ही
फुरसत नहीं
पढ़ने आते हैं मगर
कुछ भटकते हुऐ
जो पढ़ते तो हैं
लिखे हुऐ को यहीं
पल्ले पढ़ता है कुछ
या कुछ भी नहीं
पढ़ने वाला ही तो
कुछ कहीं लिखता नहीं ।

चित्र साभार: fashions-cloud.com

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2015

लिख कोई भी किताब बिना इनाम बिना सम्मान की कभी भी जिसमें सभी पाठ हों बस तेरे सामने के हो रहे झूठों के


किसी दिन
शायद दिखे
बाजार में
गिनी चुनी
किताबों की
कुछ दुकानों में
एक ऐसी
किताब

जिसमें
दिये गये हों
वो सारे पाठ
जो होते तो हैं
 पर हम
पढ़ाते नहीं हैं
कहीं भी
कभी भी

प्रयोगशाला
में किये
जाने वाले
प्रयोग नहीं
हों जिसमें

होंं झूठ के साथ
किये गये प्रयोग
जो हम
सब करते हैं
रोज अपने लिये
या
अपनो के लिये
ग़ाँधी के सत्य के
साथ किये गये
प्रयोगों की तरह
रोज

किताबों
का होना
और
उसमें लिखी
इबारत का
एक
इबारत होना
देखता
आ रहा है
सदियों से
हर पढ़ने
और नहीं
पढ़ने वाला

लिखने
वाले की
कमजोर
कलम
उठती तो
है लिखने
के लिये
अपनी
बात को
जो उठती
है शूल
की तरह
कहीं उसके
ही अंदर से

पर लिखना
शुरु करने
करने तक
चुन लेती
है एक
अलग रास्ता
जिसमें
कहीं कोई
मोड़
नहीं होता

चल देता
है लेखक
कलम के
साथ स्याही
छोड़ते हुऐ
रास्ते रास्ते
अपनी
बात को
हमेशा
की तरह
ढक कर
पीछे छोड़
जाते हुऐ

जिसे देखने
का मौका
मुड़कर
एक जिंदगी
में तो नहीं
मिलता

फिर भी
हर कोई
लिखता है
एक किताब
जिसमें होते
हैं कुछ
जिंदगी के पाठ

जो बस
लिखे होते
हैं पन्नों में
उतारे जाते हैं
सुनाये जाते हैं
उसी पर प्रश्न
पूछे जाते हैं
उत्तर दिये
जाते हैं
और
जो हो रहा
होता है
सामने से
वो पाठ
कहीं किसी
किताब में
कभी
नहीं होता

क्या पता
किसी दिन
कोई
हिम्मत करे
नहीं हो
एक कायर

’उलूक’
की तरह का
और
लिख डाले
एक किताब
उन सारे
झूठों के
प्रयोगों की
जो हम
तुम और वो
कर रहे हैं रोज
सच को
चिढ़ाने
के लिये
गाँधी जी
की फोटो
चिपका कर
दीवार से
अपनी पीठ
के पीछे ।

चित्र साभार: galleryhip.com

शनिवार, 7 फ़रवरी 2015

पढ़ पढ़ के पढ़ाने वाले भी कभी पानी भर रहे होते हैं

मत पूछ लेना
कि क्या हुआ है
अरे कुछ भी
नहीं हुआ है
जो होना है वो तो
अभी बचा हुआ है
हो रहा है बस
थोड़ा धीरे धीरे
हो रहा है
इस सब के
बावजूद भी कहीं
एक बेवकूफी
भरा सवाल
मालूम है
तेरे सिर में
कहीं उठ रहा है
अब प्रश्न उठते ही हैं
साँप के फन की तरह
पर सभी प्रश्न
 जहरीले नहीं होते हैं
हाँ कुछ प्रश्नों के
सिर और पैर
नहीं होते हैं
और कुछ के नाखून
नहीं होते हैं
खून निकला नहीं
करता है जब
प्रश्न ही प्रश्न को
खरोंच रहे होते हैं
वैसे ज्यादातर प्रश्नों
के उत्तर पहले से ही
कहीं ना कहीं
किताबों में लिखे होते हैं
और बहुत ज्यादा
पढ़ाकू टाईप के लोग
एक ना एक किताब
कहीं अपनी किसी
चोर जेब में लिये
घूम रहे होते हैं
बहुत भरोसे से
कह रहे होते हैं
प्रश्न और उत्तर
उनके भरोसे से ही
किताबों के किसी
पन्ने में रह रहे होते हैं
हँसी आ ही जाती है
कभी हल्की सी
बेवकूफी भरी
किसी किनारे से मुँह के
जब कभी किसी समय
हड़बड़ी में पढ़ाकू लोग
अपनी अपनी किताब
निकालने से परहेज
कर रहे होते हैं
प्रश्न कुछ आवारा से
इधर से उधर और
उधर से इधर
उनके सामने से ही
जब गुजर रहे होते हैं
समझने वाले
समझ रहे होते हैं
नासमझ कुछ
इस सब के बाद भी
प्रश्न कुछ नये तैयार
करने के लिये
अपनी अपनी किताब के
पन्ने पलट रहे होते हैं ।

चित्र साभार:
backreaction.blogspot.com  

रविवार, 28 सितंबर 2014

इसकी उसकी करने का आज यहाँ मौसम नहीं हो रहा है

किसी छुट्टी के दिन
सोचने की भी छुट्टी
कर लेने की सोच
लेने में क्या बुरा है
सोच के मौन
हो जाने का सपना
देख लेने से
किसी को कौन
कहाँ रोक रहा है
अपने अंदर की बात
अपने अंदर ही
दफन कर लेने से
कफन की बचत
भी हो जाती है
दिल अपनी जगह से
चेहरा अपनी जगह से
अपने अपने हिसाब का
हिसाब किताब खुद ही
अगर कर ले रहा है
रोज ही मर जाती हैं
कई बातें सोच की
भगदड़ में दब दबा कर
बच बचा कर बाहर
भी आ जाने से भी
कौन सा उनके लिये
कहीं जलसा स्वागत
का कोई हो रहा है
कई बार पढ़ दी गई
किताबों के कपड़े
ढीले होना शुरु
हो ही जाते हैं
दिखता है बिना पढ़े
सँभाल के रख दी गई
एक किताब का
एक एक पन्ना
चिपके हुऐ एक
दूसरे को बहुत
प्यार से छू रहा है
जलने क्यों नहीं देता
किसी दिन दिल को
कुछ देर के लिये
यूँ ही ‘उलूक’
भरोसा रखकर
तो देख किसी दिन
राख हमेशा नहीं
बनती हर चीज
सोचने में
क्या जाता है
जलता हुआ
दिल है और
पानी बहुत जोर
से कहीं से चू रहा है
सोचने की छुट्टी
किसी एक
छुट्टी के दिन
सोच लेने से
कौन सा क्या
इसका उसका
कहीं हो रहा है ।

चित्र साभार: http://www.gograph.com

रविवार, 7 सितंबर 2014

लिखा हुआ पढ़ते पढ़ते नहीं लिखा पढ़ने से रह गया था

कुछ था
जरूर
उन सब
जगहों पर
जहाँ से
गुजरा
था मैं

एक नहीं
हजार बार
जमाने के
साथ साथ

और
कुछ नहीं
दिखा था
कभी भी

ना मुझे
ना ही
जमाने को

कुछ दिखा
हो किसी को
ऐसा जैसा ही
कुछ लगा
भी नहीं था

अचानक
जैसे बहुत
सारी आँखे
उग आई थी
शरीर में
और
बहुत कुछ
दिखना शुरु
हो गया था

जैसे
कई बार
पढ़ी गई
किताब के
एक खाली
पड़े पन्ने को
कुछ नहीं
लिखे होने
के बावजूद
कोई पढ़ना
शुरु
हो गया था

आदमी
वही था
कई कई
बार पढ़ा
भी गया था

समझ में
हर बार
कुछ
आया था
और
जो आया था

उसमें
कभी कुछ
नया भी
नहीं था

फिर अचानक
ऐसा क्या कुछ
हो गया था

सफेद पन्ना
छूटा हुआ
एक पुरानी
किताब का
बहुत कुछ
कह गया था

एक जमाने
से जमाना
भी लगा
था पढ़ने
पढ़ा‌ने में

लिखा
किताब का

और
एक खाली
सफेद पन्ना
किसी का
सफेद
साफ चेहरा
हो गया था

‘उलूक’
आँख
ठीक होने से
ही खुश था

पता ही
नहीं चला
उसको
कि
सोच में
ही एक
मोतियाबिंद
हो गया था ।

चित्र साभार: http://www.presentermedia.com/

बुधवार, 18 जून 2014

पुरानी किताब का पन्ना सूखे हुऐ फूल से चिपक कर सो रहा था

वो गुलाब पौंधे पर
खिला हुआ नहीं था
पुरानी एक किताब के
किसी फटे हुऐ अपने
ही एक पुराने पेज पर
चिपका हुआ पड़ा था
खुश्बू वैसे भी पुराने
फूलों से आती है कुछ
कहीं भी किसी फूल
वाले से नहीं सुना था
कुछ कुछ बेरंंगा
कुछ दाग दाग
कुछ किताबी कीड़ोंं
का नोचा खाया हुआ
बहुत कुछ ऐसे ही
कह दे रहा था
फूल के पीछे कागज
में कुछ भी लिखा हुआ
नहीं दिख रहा था
ना जाने फिर भी
सब कुछ एक आइने
में जैसा ही हो रहा था
बहुत सी आड़ी तिरछी
शक्लों से भरा पड़ा था
खुद को भी पहचानना
उन सब के बीच में कहीं
बहुत मुश्किल हो रहा था
कारवाँ चला था
दिख भी रहा था
कुछ धुंंधला सा
रास्ते में ही कहीं
बहुत शोर हो रहा था
बहुत कुछ था
इतना कुछ कि पन्ना
अपने ही बोझ से जैसे
बहुत बोझिल हो रहा था
कहाँ से चलकर
कहाँ पहुंंच गया था
‘उलूक’
बिना पंखों के धीरे धीरे
पुराने एक सूखे हुऐ
गुलाब के काँटो को
चुभोने से भी दर्द
थोड़ा सा भी
नहीं हो रहा था
कारवाँ भी पहुँचा होगा
कहीं और किसी
दूसरे पन्ने में किताब के
कहाँ तक पहुँचा
कहाँ जा कर रुक गया
बस इतना ही पता
नहीं हो रहा था ।

रविवार, 11 मई 2014

किताबों के होने या ना होने से क्या होता है

किताबें सब के
नसीब में
नहीं होती हैं
किताबें सब के
बहुत करीब
नहीं होती हैं
किताबें होने से
भी कुछ
नहीं होता है
किताबों में जो
लिखा होता है
वही होना भी
जरूरी नहीं होता है
किताबों में लिखे को
समझना नहीं होता है
किताबों से पढ़ कर
पढ़ने वालो से बस
कह देना ही होता है
किताबों को खरीदना
ही नहीं होता है
किताबों का कमीशन
कमीशन नहीं होता है
किताबें बहुत ही
जरूरी होती है
ऐसा कहने वाला
बड़ा बेवकूफ होता है
किताबें होती है
तभी बस्ता
भी होता है
किताबें डेस्क
में होती है
किताबें अल्मारी
में सोती हैं
किताबे दुकान
में होती हैं
किताबे किताबों के
साथ रोती हैं
किताबों में
लिखा होना
लिखा होना
नहीं होता है
किताबों में
इतिहास होता है
किताबों में हास
परिहास होता है
किताबों की बातों को
किताबों में ही
रहना होता है
जो अपने
आस पास होता है
किताबों से नहीं होता है
किसी को पता
भी नहीं होता है
होना या ना
होना भी
किताबों में
नहीं होता है
सब पता होना
इतना भी जरूरी
नहीं होता है
इतिहास
पुराना हो
बहुत अच्छा
नहीं होता है
नया होने
के लिये
ही कुछ
नया होता है
जो पहले से
ही होता है
उसका होना
होना नहीं होता है
किताबों को पढ़ना
और पढ़ाना होता है
बताना कुछ
और ही होता है
जिसको इतना
पता होता है
गुरुओं का भी
गुरु होता है ।

बुधवार, 23 अप्रैल 2014

कुछ भी लिखे पर छपने लगे एक किताब क्या जरूरी है ऐसा हो जाये

कुछ अच्छे पर
कुछ अच्छा
कभी कहा जाये
और एक
किताब हो जाये
दिखे रखी हुई
सामने से कहीं
किताबों की बीच
किताबों की भी
किताब हो जाये
किसकी चाहत
नहीं होती कभी
बहुत सी खुश्बू
भरी हुई कुछ
ऐसी ही एक
बात हो जाये
कल दिखे तो
पढ़े कोई
परसों दिखे
फिर पढ़े कोई
पढ़ते पढ़ते
पता ना चले
दिन हो कहीं
और कहीं
रात हो जाये
यहाँ रोज लिखी
देखता है बेवकूफी
की एक बाराहखड़ी
सब अच्छा सा
होता होगा कहीं
उसे देखने की
आदत होगी
तुझे भी पड़ी
बात बात में
कुछ भी लिखे
को देख कर
बोल देता है
अब एक
किताब हो जाये
ऐसे में कुछ
नहीं कहा जाता
किसी से
कहा भी
क्या जाये
अनहोनियाँ
हो रही हैं
जिस तरह
आसपास
तेरे भी और
मेरे भी
तू ही बता
कितने दिनों तक
देख देख कर
सब कुछ
चुप रहा जाये
आज फिर
कह दिया
‘उलूक’ से
कह दिया होगा
बहुत मेहरबानी
अगली बार से
इसी बात को
फिर ना कहा जाये
इस तरह की बातें
लिखी भी जायें कहीं
लिखी जाते ही
मिटा भी दी जायें
गीता नहीं लिखी
जा रही हो अगर
कहीं किसी से
फिर से ना
कह दिया जाये
अब किताब
हो जाये ।

बुधवार, 29 जनवरी 2014

पुरानी किताब में भी बहुत कुछ दबा होता है खोलने वाले को पता नहीं होता है

एक बहुत पुरानी
सी किताब पर
पड़ी धूल को
झाड़ते ही कुछ
ऐसा लगा जैसे
कहीं किसी पेज
पर कोई चीज
है अटकी हुई
जिससे लग रही है
किताब कुछ
पटकी पटकी हुई
चिपके हुऐ पन्नों के
खुलने में बहुत
ध्यान रखना पड़ा
सोचना ये पड़ा
फट ना जाये कहीं
थोड़ा सा भी
रखा हुआ कुछ विशेष
और हाथ से निकल
ना जाये कोई खजाना
बरसों पुराना या उसके
कोई भी अवशेष
या शायद कोई
सूखा हुआ गुलाब
ही दिख जाये
किसी जमाने की
किसी की प्रेम
कहाँनी ही समझ
में आ जाये
ऐसा भी मुमकिन है
कुछ लोग रुपिये पैसे
भी कभी किताबों में
सँभाला करते थे
हो सकता है
ऐतिहासिक बाबा
आदम के जमाने
का कोई पैसा
ऐसा निकल जाये
अपनी खबर ना सही
फटे नोट की किस्मत
ही कुछ सुधर जाये
किसी शोध पत्र में
कोई उसपर कुछ
लिख लिखा ले जाये
धन्यवाद मिले नोट
पाने वाले को
नाम पत्र के अंतिम
पेज में ही सही
छप छ्पा जाये
शेखचिल्ली के सपने
इसी तरह के मौकों
में समझ में आते होंगे
किताबों के अंदर
बहुत से लोग
बहुत कुछ रख रखा
कर भूल जाते होंगे
परेशानी की बात तो
उसके लिये हो
जाती होगी जिसके
हाथ इस तरह की
पुरानी किताब कहीं
से पड़ जाती होगी
बड़ी मेहनत और
जतन से चाकू
स्केल की मदद से
बहुत देर में जब
सफलता हाथ में
आ ही जाती है
जो होता है अंदर से
उसे देख कर खुद
झेंप आ जाती है
अपने ही लेख में
लिखी एक इबारत
पर जब नजर
पड़ जाती है
लिखा होता है
"इसे इसी तरह से
चिपका कर उसी तरह
रख दिया जाये
उलूक अपनी
बेवकूफी किसी को
बताई नहीं जाती है" ।

रविवार, 22 दिसंबर 2013

किताब पढ़ना जरुरी है बाकी सब अपने ही हिसाब से होता है

किताबों तक
पहुँच ही

जाते हैं
बहुत से लोग

कुछ नहीं भी
पहुँच पाते हैं

होता कुछ
भी नहीं है

किताबों को
पढ़ते पढ़ते
सब सीख
ही जाते हैं

किताबें
चीज कितने
काम की होती हैं

किताबों को
साथ रखना
पढ़ना ही
सिखाता है

अपनी
खुद की एक
किताब का
होना भी
कितना जरूरी
हो जाता है

एक
आदमी के
कुछ कहने
का कोई
अर्थ नहीं
होता है

क्या फरक
पड़ता है
अगर वो
गाँधी या
उसकी
तरह का ही
कोई और
भी होता है

लिखना पढ़ना
पाठ्यक्रम के
हिसाब से एक
परीक्षा दे देना

पास होना
या फेल होना
किताबों के
होने या
ना होने
का बस
एक सबूत
होता है

बाकी
जिंदगी के
सारे फैसले
किताबों से
कौन और
कब कहाँ
कभी ले लेता है

जो भी होता है
किसी की अपनी
खुद की किताब
में लिखा होता है

समय के साथ
चलता है
एक एक पन्ना
हर किसी की
अपनी किताब का

कोई जल्दी
और
कोई देर में
कभी ना कभी
तो अपने
लिये भी
लिख ही
लेता है

पढ़ता है
एक किताब
कोई भी
कहीं भी
और कभी भी

करने पर
आता है
तो उसकी
अपनी ही
किताब का
एक पन्ना
खुला होता है ।

गुरुवार, 10 अक्तूबर 2013

राम तुलसी को कोस रहा होता अगर वो सब तब नहीं आज हो रहा होता

हुआ तो
बहुत कुछ था

एक मोटी
किताब में
सब कुछ
लिखा गया है

कुछ समझ में
आ जाता है
जो नहीं आता है
सब समझ चुके
विद्वानो से पूछ
लिया जाता है

मान लिया
जाता है
पढ़ा लिखा
आदमी कभी भी
किसी को बेवकूफ
नहीं बनाता है

वही सब
अगर आज
हो रहा होता
तो राम
तुलसी को
बहुत कोस
रहा होता

क्या कर
रहा है
पता नहीं
इतने दिनो से
अभी तक
तो पूरी
रामचरित मानस
को छ्पने को
दे चुका होता

प्रोजेक्ट
इस पर भी
भेजने के
लिये बोला था
आवेदन तो
कम से कम
कर ही
दिया होता

आपदा के
फंड से
दीर्घकालीन
अध्ययन के
नाम पर कुछ
किसी से
कहलवा कर
अब तक
दे दिलवा
भी दिया होता

हनुमान जी
आये थे
खोद कर
ले गये थे
संजीवनी
का पहाड़

केदारनाथ
में जो हुआ
उसी के
कारण हुआ
इतना ही तो
लिखना होता

लिख ही
दिया होता
पर ये सब
आज के
दिन कैसे
हो रहा होता

थोड़ा सा भी
समझदार होता
तो तुलसीदास
नहीं कुछ और
हो रहा होता

बिना कुछ
लिये दिये एक
कालजयी ग्रन्थ
लिख लिखा
कर ऐसे ही
बिना कोई
अ‍ॅवार्ड लिये
दुनिया से
थोड़ा विदा
हो गया होता ।

बुधवार, 28 अगस्त 2013

मैने तो नहीं पढ़ी है क्या आप के पास भी गीता पड़ी है

कृष्ण
जन्माष्टमी
हर वर्ष
की तरह
इस बार
भी आई है

आप
सबको
इस पर्व
पर बहुत
बहुत
बधाई है

बचपन से
बहुत बार
गीता के
बारे में
सुनता
आया था

आज फिर
से वही
याद लौट
के आई है

कोशिश की
कई बार
पढ़ना शुरू
करने की
इस ग्रन्थ को
पर कभी
पढ़ ही
नहीं पाया

संस्कृत में
हाथ तंग था
हिन्दी भावार्थ
भी भेजे में
नहीं घुस पाया

आज
फिर सोचा
एक बार
यही कोशिश
फिर से
क्यों नहीं
की जाये

 दिन
अच्छा है
अच्छी
शुरुआत
कुछ आज
ही कर
ली जाये

जो
समझ
में आये
आत्मसात
भी कर
लिया जाये

कुछ
अपना और
कुछ अपने
लोगों का
भला कर
लिया जाये

गीता थी
घर में एक

देखी कहीं
पुत्र से पूछा

पुस्तकालय
के कोने से
वो एक
पुरानी पुस्तक
उठा के
ले आया

कपडे़ से
झाड़ कर
उसमें
जमी हुई
धूल को
उड़ाया

पन्नो के
भीतर
दिख रहे थे

कागज
खाने वाले
कुछ कीडे़
उनको
झाड़ कर
भगाया

फिर
सुखाने को
किताब को
धूप में
जाकर के
रख आया

किस्मत
ठीक नहीं थी
बादलों ने सूरज
पर घेरा लगाया

कल को
सुखा लूंगा
बाकी
ये सोच
कर वापस
घर के अंदर
उठा कर
ले आया

इतनी
शुरुआत
भी क्या
कम है

महसूस
हो रहा है
अभी भी
इच्छा शक्ति
में कुछ दम है

पर आज
तो मजबूरी है
धूप किताब
को दिखाना
भी बहुत
जरूरी है

आप के
मन में
उठ रही
शंका का
समाधान
होना भी
उतना ही
जरूरी है

जिस
गीता को
आधी जिंदगी
नहीं कोई
पढ़ पाया हो

उसके लिये
गीता को
पढ़ना इतना
कौन सा
जरूरी हो
आया हो

असल में
ये सब
आजकल
के सफल
लोगों को
देख कर
महसूस
होने लगा है

जरूर इन
लोगों ने
गीता को
समझा है
और बहुत
बार पढ़ा है

सुना है
कर्म और
कर्मफल
की बात
गीता में ही
समझायी
गयी है
और
यही सब
सफलता
की कुंजी
बनाकर
लोगों के
द्वारा
काम में
लायी गयी है

मैं जहाँ
किसी
दिये गये
काम को
करना चाहिये
या नहीं
सोचने में
समय
लगाता हूँ

तब तक
बहुत से लोगों
के द्वारा
उसी काम को
कर लिया
गया है की
खबर अखबार
में पाता हूँ

वो सब
कर्म करते हैं
सोचा नहीं
करते हैं

इसीलिये
फल भी
काम करने
से पहले ही
संरक्षित
रखते हैं

मेरे जैसे
गीता ज्ञान
से मरहूम
काम गलत
है या सही
सोचने में ही
रह जाते हैं

काम होता
नहीं है
तो फल
हाथ में
आना
तो दूर

दूर से
भी नहीं
दिख पाते हैं

गीता को
इसीलिये
आज बाहर
निकलवा
कर ला
रहा हूँ

कल से
करूँगा
पढ़ना शुरू
आज तो
धूप में
बस सुखा
रहा हूँ ।

शनिवार, 18 मई 2013

कुछ अच्छा लिख ना

आज कुछ तो
अच्छा लिखना
रोज करता है
यहाँ बक बक
कभी तो एक
कोशिश करना
एक सुन्दर सी
कविता लिखना
तेरी आदत में
हो गया है शुमार
होना बस हैरान
और परेशान
कभी उनकी तरह
से कुछ करना
जिन्दगी को रोंदते
हुऎ जूते से
काला चश्मा
पहने हुऎ हंसना
गेरुआ रंगा
कर कुछ कपडे़
तिरंगे का
पहरा करना
अपने घर मे
क्या अटल
क्या सोनिया
कहना
दिल्ली में
करेंगे लड़ाई
घर में साथ
साथ रहना
ले लेना कुछ
कुछ दे देना
इस देश में
कुछ नहीं
है होना
देश प्रेम
भगत सिंह का
दिखा देना
बस दिखा देना
बता देना वो
सब जो हुआ
था तब बस
बता देना
लेना देना
कर लेना
कोई कुछ
नहीं कहेगा
गाना इक
सुना देना
वन्दे मातरम
से शुरु करना
जन गण मन
पर जाकर
रुका देना
कर लेना जो
भी करना हो
ना हो सके तो
पाकिस्तान
के ऊपर ले जा
कर ढहा देना
सब को सब
कुछ पता होता है
तू अपनी किताब
को खुला रखना
आज कुछ तो
अच्छा लिखना
रोज करता है
यहाँ बक बक
कभी तो एक
कोशिश करना
एक सुन्दर सी
कविता लिखना ।

शनिवार, 8 सितंबर 2012

बात की लम्बाई

कभी
लगता है
बात
बहुत लम्बी
हो जाती है

क्यों नहीं
हाईकू
या हाईगा
के द्वारा
कही जाती है

घटना
का घटना
लम्बा
हो जाता है

नायक
नायिका
खलनायक
भी उसमें
आ जाता है

उसको
पूरा बताने
के लिये
पहले खुद
समझा जाता है

जब
लगता है
आ गई
समझ में
कागज
कलम दवात
काम में आता है

सबसे
मुश्किल काम
अगले को
समझाना
हो जाता है

कहानी
तो लिखते
लिखते
रेल की
पटरी में
दौड़ती
चली जाती है

ज्यादा
हो गयी
तो हवाई
जहाज भी
हो जाती है

समझ
में तो
अपने जैसे
दो चार
के ही
आ पाती है

उस समय
निराशा
अगर
हो जाती है

तुलसीदास जी
की बहुत
याद आती है

समस्या
तुरंत हल
हो जाती है

उनकी
लिखी हुई
कहानी
भी तो
बहुत लम्बी
चली जाती है

आज नहीं
सालों पूर्व
लिखी जाती है

अभी तक
जिन्दा भी
नजर आती है

उस किताब
को भी
बहुत कम
लोग पढ़
पाते है

पढ़ भी
लेते है
कुछ लोग
पर
समझ
फिर भी
कहाँ पाते हैं ।

शुक्रवार, 31 अगस्त 2012

कुछ कर

उधर की
मत सोच
आज इधर
को आ

कुछ अलग
सा कर
माहौल बना

गुलाब एक
सोच में
अपनी ला
खुश्बू भीनी
किताब
में दिखा
स्वाद की
रंगीन फोटो
चल बना
प्यार की
फिलम देख
रिश्तों के
धागे सुलझा

ध्यान मत
अब भटका
उधर होने दे
इधर को आ

अपना अपना
सब को
करने दे
तू अपना
भी करवा

कोई किसी
के लिये
नहीं मर
रहा है
तू भी
मत मर
कुछ अलग
सा तो कर

मधुशाला
की सोच
साकी को
सपने में ला
फूलों के
गिलास बुन
पराग की
मय गिरा

टेड़ा हो जा
हरी हरी
दूब बिछा
लुड़क जा

जब देख
रहा है
सब को
बेहोश
अपने होश
भी कभी
तो उड़ा

उनसे अपना
जैसा करवाने
की छोड़
उनका जैसा
ही हो जा

चैन से
बैठ कर
जुगाली कर
चिढ़ मत
कभी चिढ़ा

चल अपना
आज अलग
तम्बू लगा

कर ना
कुछ अलग
तो कर

उसको
उसका
उधर
करने दे
तू कुछ
इधर
अपना
भी कर ।

मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

कूड़ा (दो)

किसी ने
कहा है
क्या
तुझसे
कुछ लिख

इस पर
भी लिख
उस  पर
भी लिख

कुछ होता
है अगर
तो होने
पर लिख
नहीं होता
है कुछ तो
नहीं होने
पर लिख

सब लिख
रहे हैं
तू भी
कुछ लिख

किताब
में लिख
कापी
में लिख
नहीं मिलता
है लिखने
को तो
बाथरूम
की ही
दीवारों
पर ही लिख

पर
सुन तो
कुछ
अच्छा सा
तो लिख

रोमाँस
पर लिख
भगवान
पर लिख
फूलों
पर लिख
आसमान
पर लिख

औल्ड कब
तक लिखेगा
कुछ बोल्ड
ही लिख

लिखना
छोड़ने को
कहने की
हिम्मत नहीं
पर इतना
तो बता

किसने
कहा
तुझसे
'उलूक'
तू कूड़े
पर लिख
और
कूड़ा
कूड़ा
ही लिख।

चित्र साभार: imageenvision.com

रविवार, 25 मार्च 2012

सारे साहब

अपने रोज के नये साहब
को नया सलाम बोलता है
आके फिर से यहाँ
वो किताब खोलता है
सुबह खोलता है
शाम खोलता है
किताब के पन्ने
एक गुलाम खोलता है
देख कर नये पन्ने
जब दिमाग डोलता है
कई बार खोलता है
अपने आप बोलता है
खेल नहीँ खेलता है
खिलाड़ी को झेलता है
फुटबाल बना के कोई
जब हवा पेलता है
हर कोई अपने को
साहब बोलता है
गुलाम कभी नहीं
जुबान खोलता है
अपने रोज के नये साहब
को नया सलाम बोलता है
आके फिर से यहाँ
वो किताब खोलता है।

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