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शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

फसल तो होती है किसान ध्यान दे जरूरी नहीं होता है

ना कहीं खेत होता है
ना ही कहीं रेत होती है
ना किसी तरह की खाद की
और ना ही पानी की कभी
कहीं जरूरत होती है
फिर भी कुछ ना कुछ
उगता रहता है
हर किसी के पास
हर क्षण हर पल
अलग अलग तरह से
कहीं सब्जी तो कहीं फल
किसी को काटनी
आती है फसल
किसी को आती है
पसंद बस घास उगानी
काम फसल भी आती है
और उतना ही घास भी
शब्दों को बोना हर किसी के
बस का नहीं होता है
इसके बावजूद कुछ ना कुछ
उगता चला जाता है
काटना आता है जिसे
काट ले जाता है
नहीं काट पाये कोई
तब भी कुछ नहीं होता है
अब कैसे कहा जाये
हर तरह का पागलपन
हर किसे के बस
का नहीं होता है
कुकुरमुत्ते भी तो
उगाये नहीं जाते हैं
उग आते हैं अपने आप
कब कहाँ उग जायें
किसी को भी
पता नहीं होता है
पर कुछ कुकुरमुत्ते
मशरूम हो जाते हैं
सोच समझ कर अगर
कहीं कोई बो लेता है
रेगिस्तान हो सकता है
कैक्टस दिख सकता है
कोई लम्हा कहा जा सके
कहीं एक बंजर होता है
बस शायद ऐसा ही
कहीं नहीं होता है ।

बुधवार, 9 मई 2012

गैंग

सभ्य एवम
पढे़ लिखे
कहलाये
जाने वाले
एक बड़े
समूह में
छितराये
हुए से
कुछ लोग
कहीं कहीं
साथ साथ से
हो जाते है
आपस में
बतियाते हैं
रोज मिल
पाते हैं
लोगों को
दिख जाते हैं
ऎसे ऎसे
कई झुरमुट
कुकुरमुत्ते
की तरह
जगह जगह
उगते चले
जाते हैं

अब
कुकुरमुत्ते
भी तो
माहौल के
हिसाब से
ही पनप
पाते हैं
कुछ ही
कुकुरमुत्ते
मशरूम
की श्रेणी
में आते है
सँयमित
तरीके से
जब उगाये
जाते हैं
तभी तो
खाने में
प्रयोग में
लाये जाते हैंं

कभी कभी
जब इधर के
कुछ लोग
उधर के
लोगों में
चले जाते हैं
बातों बातों
में फिसल
जाते है
सामने वाले
से उसके
समूह को
गैंग कह
कर बुलाते हैं
उस समय
हम समझ
नहीं पाते हैं
कि
वो उन्हे
गिरोह
कह रहे हैं
टोली
कह रहे हैं
दल
कह रहे हैं
या
मँडली
कह रहे हैं
संग गण
वृन्द मजदूर
गुलाम भी
तो गैंग के
रूप के रूप
में कहीं कहीं
प्रयोग किये
जाते हैं

अच्छा
रहने दो
अब
बातो को
हम लम्बा
खींच कर
नहीं ले
जाते है
मुद्दे पर
आते हैं

भले लोग
बात करने
में अपनी
मानसिकता
का परिचय
जरूर
दे जाते हैं
बता जाते हैं
सभ्य एवम
पढे़ लिखे
लोग
सही समय
पर सही
शब्द ही
प्रयोग में
लाते हैं।

बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

सारे कुकुरमुत्ते मशरूम नहीं हो पाते हैं

जंगल में
उगते हैं
कुकुरमुत्ते
कोई भाव
नहीं देता है
उगते चले
जाते हैं

बिना खाद
पानी के
शहर में
सब्जी की
दुकान पर
मशरूम
के नाम पर
बिक जाते हैं
कुकुरमुत्ते
अच्छे भाव
के साथ
चाव से
खाते हैं
लोग बिना
किसी डर के
गिरगिट की
तरह रंग
बदल लेना
या फिर
कुकुरमुत्ता
हो जाना
होते नहीं
हैं एक जैसे
बहुत से
गिरगिट
रंग बदलते
चले जाते हैं
इंद्रधनुष
बनने की
चाह में
पर उन्हे
पता ही
नहीं चल
पाता है
कि वो कब
कुकुरमुत्ते
हो गये
कुकुरमुत्तों
की भीड़ में
उगते हुवे
मशरूम भी
नहीं हो पाये।

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