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सोमवार, 13 अगस्त 2012

एक सीधा सा टेढ़ा

सालों साल लग गये
यहाँ तो समझने में
कि आँखिर किसे
कैसे क्या किसको
समझाना आता है
सीधा सीधा कहने
वाले को कहाँ बेवकूफ
बनाना आता है
अपनी भी समझ में
कुछ आया तो वो भी
कभी भी सीधा कहाँ आया
उसका कहना ही
समझ पाये हम
जिसे उल्टा कर के
समझाना आता है
ये भी समझ में आया
कि उल्टा कर के
समझाना सबसे अच्छा
समझाना होता है
पूरा उल्टा नहीं भी
कर के आओ तो
बस थोड़ा सा टेढा़
करके आना होता है
लेकिन इस टेढा़ करके
समझाने वाले को
खुद भी टेढ़ा हो
जाना होता है
धीरे धीरे ऎसे टेढे़ को
सामने वाले से केकड़ा
कहलवाना होता है
कोई काम दुनिया के
ऎसे हो या वैसे हों
कहाँ कभी रुकते हैं
उनको करने वाले को
अपने अपने ढंग से
करते ही जाना होता है
केकडे़ भी आदत से
मजबूर होते हैं
उनको भी केकड़ापन
अपना दिखाना होता है
तब तक सब अपनी
जगह पर जैसे तैसे
चलाना होता है
पर मुसीबत तो
तब आती है जब
टेढे़ के सामने किसी
एक टेढे़
को दूसरे टेढे़ को
समझाना होता है

टेढे़ टेढे़
होकर
एक दूसरे के नजदीक
जाना होता है
केकड़ापन अपने अपने
भूल कर सीधा
हो जाना होता है
जो भी समझाना होता है
ऎसे में बिल्कुल सीधा ही
समझाना होता है ।

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