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बुधवार, 12 सितंबर 2012

चित्रकार का चित्र / कवि की कविता

तूलिका के छटकने
भर से फैल गये रंग
चारों तरफ कैनवास पर
एक भाव बिखरा देते हैं
चित्रकार की कविता
चुटकी में बना देते हैं
सामने वाले के लिये
मगर होता है  बहुत
मुश्किल ढूँढ पाना
अपने रंग उन बिखरे हुवे
इंद्रधनुषों में अलग अलग

किसी को नजर आने
शुरु हो जाते हैं बहुत से
अक्स आईने की माफिक
तैरते हुऎ जैसे हो उसके
अपने सपने और कब
अंजाने में निकल जाता है
उसके मुँह से वाह !
दूसरा उसे देखते ही
सिहर उठता है
बिखरने लगे हों जैसे
उसके अपने सपने
और लेता है एक
ठंडी सी आह !
दूर जाने की
कोशिश करता हुआ
डर सा जाता है
उसके अपने चेहरे का
रंग उतरता हुआ
सा नजर आता है
किसी का किसी से
कुछ भी ना
कहने के बावजूद
महसूस हो जाता है
एक तार का झंकृत
होकर सरगम सुना देना
और एक तार का
झंकार के साथ
उसी जगह टूट जाना
अब अंदर की
बात होती है
कौन किसी को
कुछ बताता है
कवि की कविता
और चित्रकार का
एक चित्र कभी कभी
यूँ बिना बात के
पहेली बन जाता है ।

शनिवार, 14 जुलाई 2012

बहुत कम होते हैं

अपने ही बनाये
पोस्टर का
दीवाना हो जाना
बिना रंग भरे भी
क्योंकि पोस्टर अपना
कूची अपनी रंग अपने
और सोच भी अपनी
कभी भी उतारे
जा सकते हैं
अपनी इच्छा के सांचे में
जिस तरह चाहो
बस मूड अच्छा
होना चाहिये
उसके चश्में की
जरूरत होती है
उसके कैनवास पर
आड़ी तिरछी रेखाओं
से बने हुऎ चित्र को
देखने के लिये
हर कोई रख देता है
अपना कैनवास
समझने के लिये
किसी के भी सामने
पर उसे देखने के लिये
अपना चश्मा देने वाले
बहुत ही कम
लोग होते हैं
और ऎसे लोगों के
कैनवास भी
उनकी सोच ही के
बराबर उतने ही
बडे़ भी होते हैं

लेकिन ऎसे भी
कुछ लोग होते हैं।

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