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सोमवार, 3 अक्तूबर 2016

कर कुछ उतारने की कोशिश तू भी कभी 'उलूक'

कोशिश
कर तो सही
उतारने की
सब कुछ
कभी
फिर दौड़ने
की भी
उसके बाद
दिन की
रोशनी में ही
बिना झिझक
जो सब
कर रहे हैं
क्यों नहीं
हो पा
रहा है
तुझसे
सोचने का
विषय है
तेरे लिये
उनके
लिये नहीं
जिन्होने
उतार
दिया है
सब कुछ
कभी का
सब कुछ
के लिये
हर
उतारा हुआ
उतारे हुए
के साथ
ही खड़ा
होता है
तू बस
देखता
ही रहता है
दोष
किसका है
उतार कर
तो देख
बस
एक बार
शीशे के
सामने
ही सही
अकेले में
समझ सकेगा
पहने हुऐ
होने के
नुकसान
जाति
उतारने
की बात
नहीं है
क्षेत्र
उतारने
की बात
नहीं है
धर्म
उतारने
की बात
नहीं है
कपड़े
उतारने
की बात
भी नहीं है
बात
उतरे हुए
को
सामने से
देख कर
ही समझ
में आती है
निरन्तरता
बनाये
रखने
के लिये
वैसे भी
बहुत
जरूरी है
कुछ ना
कुछ करते
चले जाना
समय के
साथ चलने
के लिये
समय
की तरह
समय पहने
तो
पहन लेना
समय उतारे
तो
उतार लेना
अच्छा है
सब को
सब की
सारी बातें
समझ में
आसानी से
नहीं आती हैं
वरना
आदमी
के बनाये
आदमी
के लिये
नियमों
के अन्दर
किसी को
आदमी
कह देने
के जुर्म में
कभी भी
अन्दर हो
सकता है
कोई भी
आदमी
आमने
सामने ही
पीठ करके
एक दूसरे
से
निपटने में
लगे हुऐ
सारे आदमी
अच्छी तरह
जानते हैं
उतारना
पहनना
पहनना
उतारना
तू भी
लगा रह
समेटने में
अपने
झड़ते हुए
परों को
फिर से
चिपकाने की
सोच लिये
‘उलूक’
जिसके पास
उतारने
के लिये
कुछ ना हो
उसे पहले
कुछ पहनना
ही पड़ता है
पंख ही सही
समय की
मार खा कर
गिरे हुए ।

चित्र साभार:
www.clipartpanda.com

गुरुवार, 11 दिसंबर 2014

कभी कर भी लेना चाहिये वो सब कुछ जो नहीं करना होता है अपने खुद के कानूनो में

कुछ देर के
लिये ही सही
अच्छा है
बहुत दूर को नहीं
अपने आस पास
को छोड़
अपने से थोड़ा
कुछ दूर को ही
देखने सुनने
की कोशिश करना
रोज देखते देखते
वही अपने या
कहीं से थोड़ा सा
भी अपने नहीं भी
कुछ गोल कुछ लम्बे
कुछ हसीन और
कुछ रोते चेहरे
यहाँ तक खुद को
भी टाल देना
हो सके तो खुद से
सुबह सवेरे देख लेना
दूर एक पहाड़ को
उस पर कहीं से
उठ रहे धुऐं को
या फिर पहाड़ की
घुमावदार सड़को
पर उतरती चढ़ती
चीटियों के आकार
की गाड़ियों
को ही सही
और दिन भर
खुश हो लेना
बंदरों के उछलने
कूदने में अपने
ही आस पास
नहीं टोकना
झुँझला कर उनको
उखाड़ने देना
खेत पर मेहनत से
अपनी लगाई हुई
फसल को
और शाम होते होते
ध्यान से सुनने
की कोशिश करना
झिंगुरों की तीखी
आवाज के साथ
जुड़े संगीत को
खोजना सियारों की
चिल्लाने में भी
कोई राग
मस्जिद से आ रही
अजान में खोजना
कोई मंत्र ध्वनी
नहीं खोलना रेडियो टी वी
समाचारों के लिये
मना कर देना फेकने को
हाँकर को कुछ दिन
शहर की खबरों से
पटे अखबारों को
अपने आस पास
बहुत अच्छा होता हुआ
या बहुत अच्छा करने वाले
बहुत दिनों तक
अच्छा अच्छा महसूस
कराते रहें और
वही सब अच्छा
अपने दिमाग में
भर भरा कर
धो धुला कर
सोच के नीरमा से
रोज लाकर रख देना
यहाँ सूखने के लिये
धूप में जैसे
भीगे हुऐ कपड़े
किसी दिन वो सब
भी करना या
कर लेने की
कोशिश कर लेना
जो नहीं करना चाहिये
जो नहीं होना चाहिये
और जो नहीं आता हो
कहीं से भी सोच में
किसी भी तरह से
अपने कानूनों को
तोड़ कर देखना
और भुगतना
सजा भी खुद से
खुद को दी गई
देख तो सही कर के
अच्छा होता है
बहुत कभी कभी ।

चित्र साभार: socialtimes.com

सोमवार, 17 फ़रवरी 2014

पानी नहीं है से क्या है अपनी नाव को तो अब चलने की आदत हो गई है

कोई नई बात 
नहीं कहीं गई है 
कोई गीत गजल 
कविता भी 
नहीं बनी है 
बहुत जगह एक 
ही चीज बने 
वो भी ठीक 
जैसा तो नहीं है 
इसलिये हमेशा 
कोशिश की गई है 
सारी अच्छी और 
सुन्दर बातें 
खुश्बू वाले 
फूलों के लिये 
कहने सुनने 
के लिये रख 
दी गई हैं 
अपने बातों के 
कट्टे में सीमेंट 
रेते रोढ़ी की 
जैसी कहानियाँ 
कुछ सँभाल कर 
रख दी गई हैं 
बहुत सारी 
इतनी सारी 
जैसे आसमान 
के तारों की 
एक आकाशगंगा 
ही हो गई है 
खत्म नहीं 
होने वाली हैं 
एक के निकलते
पता चल जाता है 
कहीं ना कहीं 
तीन चार और 
तैय्यार होने के 
लिये चली गई हैं 
रोज रोज दिखती है 
एक सी शक्लें 
अपने आस पास 
वाकई में बहुत 
बोरियत सी 
अब हो गई है 
बहुत खूबसूरत है 
ये आभासी दुनियाँ 
इससे तो अब 
मोहब्बत सी 
कुछ हो गई है 
बहुत से आदमियों 
के जमघट के बीच 
में अपनी ही 
पहचान जैसे कुछ 
कहीं खो गई है 
हर कोई बेचना 
चाहता है कुछ नया 
अपने कबाड़ की 
भी कहीं तो 
अब खपत 
लगता है हो 
ही गई है ।

गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

कुछ नया लिख कोशिश तो कर उल्टा ही लिख

किसी एक दिन
लिख क्यों नहीं
लेता अपनी तन्हाई
पूरी ना सही
आधी अधूरी ही सही
अपने लिये ना सही
किसी और को
समझाने के
लिये ही सही
पता तो चले
तन्हाई तन्हाई
का अंतर
तुझे भी और
किसी और को भी
सभी लिखते हैं
बताने के लिये
वो सब जो
पता होता है
कोई कहाँ
लिखता है
वो सब कुछ
जो सच में
छुपा होता है
दिखाने की
हो चुकी है
दुनियाँ तो
दिखाने के
लिये ही सही
कुछ लिख
तो सही
अजीब सा
ही सही
जो है
लिखा हुआ
कुछ भी
नया नहीं
कुछ है नया
लिखा हुआ
बताने के
लिये ही सही
तन्हाई कोई
नहीं लिखता है
कभी हिम्मत
तो कर कुछ लिख
कोशिश तो कर
ना पढ़े ना
समझे कोई
आज तक
कौन सा समझ
ले रहा है तेरा लिखा
समझा कर
कौन सा
मर जायेगा
लिख कर
अपनी तन्हाई
समझा कर
मर भी गया
तो कुछ नहीं होगा
तन्हा तन्हा
मरने वालों के
गम को
कुछ तो
कम कर
चल तन्हाई पर
लिख ही ले आज
कुछ अपना और
कुछ किसी का
बोझ तो
कम कर
जो होना है वो
हो रहा है
होता रहेगा
तू लिखेगा
लिखता रहेगा
कभी अपनी
अंगड़ाई पर लिख
कभी अपनी
तन्हाई पर लिख
कोशिश तो कर
कुछ नया
लिखने की
ऊपर वाले की
बेहयाई पर लिख ।

गुरुवार, 23 जनवरी 2014

पता होता है फूटता है फिर भी जानबूझ कर हवा भरता है

पानी में बनते
रहते हैं बुलबुले
कब बनते हैं
कब उठते हैं
और कब
फूट जाते हैं
कोशिश करना
भी चाहता है
कोई छाँटना
एक बुलबुला
अपने लिये
मुश्किल में जैसे
फँस जाता है
जब तक नजर
में आता है एक
बहुत सारों को 

अगल बगल से
बन कर फूटता
हुआ देखता
रह जाता है
कुछ ही देर में
ही बुलबुलों से
ही जैसे सम्मोहित
हो जाता है
कब बुलबुलों के
बीच का ही एक
बुलबुला खुद
हो जाता है
समझ ही
नहीं पाता है
बुलबुलों को
कोमल अस्थाई
और अस्तित्वहीन
समझने की
कोशिश में ये
भूल जाता है 

बुलबुला एक 
क्षण में ही
फूटते फूटते
अपनी पहचान
बना जाता है
एक फूटा नहीं
जैसे हजार पैदा
कर जाता है
ये और वो भी
इसी तरह
रोज ही फूटते हैं
रोज भरी
जाती है हवा
रोज उड़ने की
कोशिश करते हैं
अपने उड़ने की छोड़
दूसरे की उड़ान से
उलझ जाते हैं
इस जद्दोजहद में
कितने बुलबुले
फोड़ते जाते हैं
बुलबुले पूरी जिंदगी
में लाखों बनते हैं
लाखों फूटते हैं
फिर भी बुलबुले
ही कहलाते हैं
ये और वो भी
एक बार नहीं
कई बार फूटते हैं
या फोड़ दिये जाते हैं
इच्छा आकाँक्षाओं की
हवा को जमा भी
नहीं कर पाते हैं
ना वो हो पाते हैं
ना ये हो पाते हैं
हवा भी यहीं
रह जाती है
बुलबुले बनते हैं
उड़ते भी हैं
फिर फूट जाते हैं
सब कुछ बहुत कुछ
साफ कह रहा होता है
सब सब कुछ
समझते हुऐ भी
नासमझ हो जाते हैं
फूटते ही हवा
भरने भराने के
जुगाड़ में लीन और
तल्लीन हो जाते हैं ।

बुधवार, 28 अगस्त 2013

मैने तो नहीं पढ़ी है क्या आप के पास भी गीता पड़ी है

कृष्ण जन्माष्टमी
हर वर्ष की तरह
इस बार भी आई है
आप सबको इस
पर्व पर बहुत
बहुत बधाई है
बचपन से बहुत बार
गीता के बारे में
सुनता आया था
आज फिर से वही
याद लौट के आई है
कोशिश की कई बार
पढ़ना शुरु करने की
इस ग्रन्थ को पर
कभी पढ़ ही नहीं पाया
संस्कृत में हाथ तंग था
हिन्दी भावार्थ भी
भेजे में नहीं घुस पाया
आज फिर सोचा
एक बार यही कोशिश
फिर से क्यों नहीं की जाये
दिन अच्छा है अच्छी
शुरुआत कुछ आज
ही कर ली जाये
जो समझ में आये
आत्मसात भी
कर लिया जाये
कुछ अपना और
कुछ अपने लोगों का
भला कर लिया जाये
गीता थी घर में एक
देखी कहीं पुत्र से पूछा
पुस्तकालय के कोने से
वो एक पुरानी पुस्तक
उठा के ले आया
कपडे़ से झाड़ कर
उसमें जमी हुई
धूल को उड़ाया
पन्नो के भीतर
दिख रहे थे
कागज खाने वाले
कुछ कीडे़ उनको
झाड़ कर भगाया
फिर सुखाने को
किताब को धूप में
जाकर के रख आया
किस्मत ठीक नहीं थी
बादलों ने सूरज
पर घेरा लगाया
कल को सुखा लूंगा बाकी
ये सोच कर वापस
घर के अंदर
उठा कर ले आया
इतनी शुरुआत
भी क्या कम है
महसूस हो रहा है
अभी भी इच्छा शक्ति
में कुछ दम है
पर आज तो मजबूरी है
धूप किताब को दिखाना
भी बहुत जरूरी है
आप के मन में
उठ रही शंका का
समाधान होना भी
उतना ही जरूरी है
जिस गीता को
आधी जिंदगी नहीं
कोई पढ़ पाया हो
उसके लिये गीता को
पढ़ना इतना कौन सा
जरूरी हो आया हो
असल में ये सब
आजकल के सफल
लोगों को देख कर
महसूस होने लगा है
जरूर इन लोगों ने
गीता को समझा है
और बहुत बार पढा़ है
सुना है कर्म और कर्मफल
की बात गीता में ही
समझायी गयी है
और यही सब सफलता
की कुंजी बनाकर
लोगों के द्वारा
काम में लायी गयी है
मैं जहाँ किसी
दिये गये काम को
करना चाहिये या नहीं
सोचने में समय लगाता हूँ
तब तक बहुत से लोगों
के द्वारा उसी काम को
कर लिया गया है की
खबर अखबार में पाता हूँ
वो सब कर्म करते हैं
सोचा नहीं करते हैं
इसीलिये फल भी
काम करने से पहले ही
संरक्षित रखते हैं
मेरे जैसे गीता
ज्ञान से मरहूम
काम गलत है या सही
सोचने में ही रह जाते हैं
काम होता नहीं है
तो फल हाथ में
आना तो दूर
दूर से भी नहीं
दिख पाते हैं
गीता को इसीलिये
आज बाहर निकलवा
कर ला रहा हूँ
कल से करूँगा
पढ़ना शुरू
आज तो धूप में
बस सुखा रहा हूँ ।

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