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मंगलवार, 6 मई 2014

जिसको काम आता है उसको ही दिया जाता है

अपनी प्रकृति
के हिसाब से
हर किसी को
अपने लिये
काम ढूँढ लेना
बहुत अच्छी
तरह आता है
एक कबूतर
होने से
क्या होता है
चालाक हो अगर
कौओं को सिखाने
के लिये भी
भेजा जाता है
भीड़ के लिये
हो जाता है
एक बहुत
बड़ा जलसा
थोड़े से गिद्धों को
पता होता है
मरा हुआ घोड़ा
किस जगह
पाया जाता है
बहुत अच्छी
बात है अगर
कोई काली स्याही
अंगुली में
अपनी लगाता है
गर्व करता है
इतराता हुआ
फोटो भी कई
खिंचाता है
चीटिंयों की
कतार चल
रही होती है
एक तरफ को
भेड़ो का रेहड़
अपने हिसाब से
पहाड़ पर
चढ़ना चाहता है
एक खूबसूरत
ख्वाब कुछ दिनों
के लिये ही सही
फिल्म की तरह
दिखाया जाता है
देवता लोग
नहीं बैठते हैं
मंदिर मस्जिद
गुरुद्वारे में
हर कोई भक्तों से
मिलने बाहर को
आ जाता है
भक्तों की हो रही
होती है पूजा
न्यूनतम साझा
कार्यक्रम के बारे में
किसी को भी कुछ
नहीं बताया जाता है
चार दिन शादी ब्याह
के बजते ढोल नगाड़ों
के साथ कितना
भी थिरक लो
उसके बाद दूल्हा
अकेले दुल्हन के
साथ जाता है
तुझे क्या करना है
इन सब बातों से
बेवकूफ ‘उलूक’
तेरे पास कोई
काम धाम
तो है नहीं
मुँह उठाये
कुछ भी
लिखने को
चला आता है ।

बुधवार, 12 मार्च 2014

तेरा जैसा उल्लू भी तो कोई कहीं नहीं होता

अब भी
समय है
समझ क्यों
नहीं लेता
रोज देखता
रोज सुनता है
तुझे यकीं
क्यों नहीं होता
ये जमाना
निकल गया है
बहुत ही आगे
तुझे ही रहना था
बेशरम इतने पीछे
कहीं पिछली गली
से ही कभी चुपचाप
कहीं को भी
निकल लिया होता
बहुत बबाल करता है
यहाँ भी और वहाँ भी
तरह तरह की
तेरी शिकायतों के
पुलिंदे में भी
कभी कोई छेद
क्यों नहीं होता
सीखने वाले हमेशा
लगे होते हैं
सिखाने वालों
के आगे पीछे
कभी तो सोचा कर
तेरे से सीखने
वाला कोई भी
तेरे आस पास
क्यों नहीं होता
बहुत से अपने को
अब सफेद कबूतर
मानने लगे हैं
सारे कौओं को
पता है ये सब
काले कौओ के
बीच में रहकर
काँव काँव करना
बस एक तुझसे
ही क्यों नहीं होता
पूँछ उठा के देखने
का जमाना ही
नहीं रहा अब तो
एक तू ही पूँछ
की बात हमेशा
पूछता रहता है
पूँछ हिलाना
अब सामने सामने
कहीं नहीं होता
गालियाँ खा रहे हैं
सरे आम सभी कुत्ते
आदमी से बड़ा कुत्ता
कहीं भी नहीं होता
कभी तो सुन
लिया कर दिल
की भी "उलूक"
दिमाग में बहुत कुछ
होने से कुछ नहीं होता ।

बुधवार, 15 जनवरी 2014

मकर संक्रांति दूसरी किस्त में देखिये क्या क्या हुआ

जिस बात के होने
का अंदेशा था वही
और बस वही
होता हुआ दिखा
सुबह सुबह की छोड़िये
शाम तक भी कौऐ ने
मैं आ गया हूँ नहीं कहा
वैसे तो पता था
यही होना है
कौआ पिछले कई सालों से
कहाँ मिल पा रहा है
और जरूरी नहीं है
जो एक बार हुआ हो
वही कई कई बार
होना ही होना होता हो
पर्दा उठा हो
नाटक एक हुआ हो
जली हुई मोमबत्तियाँ
अपने हाथों में लेकर
एक लड़की के लिये
जैसे कभी शहर
पागल हो गया हो
सफेद टोपियाँ ही टोपियाँ
गली गली में हल्ला गुल्ला
चोर चोर की जगह
मोर मोर हो गया हो
पर्दा जब गिर गया हो
उसके बाद किसे
को पता नहीं चला हो
क्या क्या नहीं हो गया हो
जिंदा मीट के एक
सफेद पोश व्यापारी का
रंगे हाथों पकड़ा जाना
उसी छोटे से शहर के लिये
इस बार एक छोटी
सी खबर हो गया हो
शोर शराबा टोपी मोमबत्ती
का टाईम ठंडे बस्ते
में जा कर सो गया हो
इतना काफी नहीं है क्या
समझने के लिये
क्या पता कौआ भी अब
कौआ ही ना रह गया हो
एक मुर्गा या कबूतर
जैसा कुछ हो गया हो
ऐसा होना गिना जाता होगा
किसी जमाने में
अचम्भे जैसा होने में
अब कुछ भी कैसा भी
कहीं भी हो जाना
एक नार्मल बात हो गया हो
कौआ बहुत ज्यादा
समझदार हो गया हो
लोकल मुद्दों पर प्रतिक्रिया
नहीं देकर राष्ट्रीय धारा में
गोते लगाना सीख ही गया हो
इसलिये मकर संक्रांति को
आना उसने छोड़ ही दिया हो !


मंगलवार, 22 अक्तूबर 2013

कौन जानता है किस समय गिनती करना बबाल हो जाये

गिनती करना
जरूरी नहीं हैं
सबको ही आ जाये
कबूतर और कौऐ
गिनने को अगर
किसी से कह
ही दिया जाये
कौन सा बड़ा
गुनाह हो गया
अगर एक कौआ
कबूतर हो जाये
या एक कबूतर की
गिनती कौओं
मे हो जाये
कितने ही कबूतर
कितने ही कौऔं को
रोज ही जो देखता
रहता हो आकाश में
इधर से उधर उड़ते हुऐ
उससे कितने आये
कितने गये पूछना ही
एक गुनाह हो जाये
सबको सब कुछ
आना भी तो
जरूरी नहीं
गणित पढ़ने
पढ़ाने वाला भी
हो सकता है कभी
गिनती करना
भूल जाये
अब कोई
किसी और ज्ञान
का ज्ञानी हो
उससे गिनती
करने को कहा
ही क्यों जाये
बस सिर्फ एक बात
समझ में इस सब
में नहीं आ पाये
वेतन की तारीख
और
वेतन के नोटों की
संख्या में गलती
अंधा भी हो चाहे
भूल कर भी
ना कर पाये
ज्ञानी छोड़िये
अनपढ़ तक
का सारा
हिसाब किताब
साफ साफ
नासमझ के
समझ में
भी आ जाये !

गुरुवार, 31 मई 2012

निठल्ले का सपना

कौआ अगर
नीला होता
तो क्या होता
कबूतर भी
पीला होता
तो क्या होता
काले हैं कौए
अभी भी
कुछ नया कहाँ
कर पा रहे हैं
कबूतर भी
तो चिट्ठियों 

को नहीं ले
जा रहे हैं
एक निठल्ला
इनको कबसे
गिनता हुवा
आ रहा है
मन की कूँची
से अलग
अलग रंगों
में रंगे
जा रहा है
सुरीली आवाज
में उसकी जैसे
ही एक गीत
बनाता है
कौआ
काँव काँव
कर चिल्ला
जाता है
निठल्ला
कुढ़ता है
थोड़ी देर
मायूस हो
जाता है
जैसे किसी
को साँप
सूँघ जाता है
दुबारा कोशिश
करने का मन
बनाता है
कौए को छोड़
कबूतर पर
ध्यान अपना
लगाता है
धीरे धीरे तार
से तार जोड़ता
चला जाता है
लगता है जैसे
ही उसे कुछ
बन गयी
हो बात
एक सफेद
कबूतर
उसके सर
के ऊपर से
काँव काँव कर
आसमान में
उड़ जाता है।

शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

झपट लपक ले पकड़

जमाना वाकई में
बड़ी तेजी से
बदलता जा रहा है
कौआ कबूतर को
राजनीति सिखा रहा है
कबूतर अब चिट्ठियाँ
नहीं पहुंचाया करता है
कौवा भी कबूतर को
खाया नहीं करता है
कौवा उल्लुओं का
शिकार करने की नयी
जुगत बना रहा है
कौवा कबूतर भेज
कर उल्लूओं को
फंसा रहा है
ये पक्षियों को
क्या होता
जा रहा है
पारिस्थितिकी
को क्यों इस तरह
बिगाड़ा जा रहा है
"आदमी की
संगत का असर 

पक्षियों का
राजनीतिक सफर"
मूँछ मे ताव देता
एक प्रोफेसर
टेढ़े टेढ़े मुंह से
हंसता हुवा
यू जी सी की
संस्तुति हेतु
एक करोड़
की परियोजना
बना रहा है।

रविवार, 13 सितंबर 2009

सत्ता

बरसो के कौओं
के राज से
उकताकर
कबूतरो ने
सत्ता
सम्भाली
और
अब
वे भी
बहुत अच्छा
कांव कांव
करने लगे हैं।

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