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गुरुवार, 10 नवंबर 2016

खुद की सोच ही एक वजूका हो जाये खेत के बीच खड़ा हुआ तो फिर किसी और को क्या समझ में आये एक वजूका सोच से बड़ा होता है

क्या बुराई है
हो जाने में
सोच का
खुद की
एक वजूका
और जा कर
खड़े हो लेने
में कहीं भी
किसी जगह
जरूरी नहीं
उस जगह
का एक
खेत ही होना

वजूके
समझते हैं
वजूकों के
तौर तरीके
लगता है
पता नहीं
गलत भी
हो सकता है

वजूके
सोचते हैं
करते हैं
चलते हैं
वजूकों के
इशारों
इशारों पर
कुछ
वजूकी चालें

वजूकों के
पास शतरंज
नहीं होता है

सब सामान्य
होता है
वजूके के लिये
वजूके के द्वारा
वजूके के हित में
जो भी होता है
वजूकों में
सर्वमान्य होता है

वजूके पेड़
नहीं होते हैं
वजूकों का
जंगल होना
भी जरूरी
नहीं होता है

वजूका खेत में
खड़ा कहीं
कहीं दूर से
दिखाई देता है
जिस पर
कोई भी ध्यान
नहीं देता है
चिड़िया कौए
वजूकों पर
बैठ कर
बीट करते हैं
वजूका कुछ
नहीं कहता है

वजूका ही
शायद एक
इन्सान
होता है
सब को
समझ में
नहीं आती
हैं इंसानों
की कही
हुई बातें
इंसानों के
बीच में हमेशा

वजूके कुछ
नहीं कहते हैं
वजूके वजूकों
को समझते हैं
बहुत अच्छी
तरह  से
लेकिन ये
बात अलग है
वजूकों की
भीड़ नहीं
होती है कहीं
वजूके के बाद
 मीलों की
दूरी पर कहीं
किसी खेत में
एक और
वजूका अकेला
खड़ा होता है
‘उलूक’
तेरे करतबों
से दुनियाँ को
क्या लेना देना
हर किसी का
अपना एक
वजूका
पूरे देश में
एक ही
होता है
लेकिन
वजूका
होता है।

 चित्र साभार: Clipartix

मंगलवार, 18 अगस्त 2015

एक रंग से सम्मोहित होते रहने वाले इंद्रधनुष से हमेशा मुँह चुरायेंगे

अपने सुर पर
लगाम लगा
अपनी ढपली
बजाने से अब
बाज भी आ
बजा तो रहा हूँ
मैं भी ढपली
और गा
भी रहा हूँ कुछ
बेराग ही सही
सुनता क्यों नहीं
अब सब
अपनी अपनी
बजाना शुरु
हो जायेंगे तो
समझता क्यों नहीं
काँव काँव
करते कौए
हो जायेंगे
और
साफ सफेद
दूध से धुले हुऐ
कबूतर फिर
मजाक उड़ायेंगे
क्या करेगा
उस समय
अभी नहीं सोचेगा
समय भूल जायेगा
तुझे
और मुझे
फिर
हर खेत में
कबूतरों की
फूल मालाऐं
पहने हुऐ
रंग बिरंगे
पुतले
नजर आयेंगे
पीढ़ियों दर
पीढ़ियों के लिये
पुतलों पर
कमीशन
खा खा कर
कई पीढ़ियों
के लिये
अमर हो जायेंगे
कभी सोचना
भी चाहिये
लाल कपड़ा
दिखा दिखा
कर लोग
क्या बैलों
को हमेशा
इसी तरह
भड़काऐंगे
इसी तरह
बिना सोचे
जमा होते
रहेंगी सोचें
बिना सोचे समझे
किसी एक
रंग के पीछे
बिना रंग के
सफेद रंग
हर गंदगी को
ढक ढका कर
हर बार
की तरह
कोपलों को
फूल बनने
से पहले ही
कहीं पेड़ की
किसी डाल पर
एक बार
फिर से
बार बार
और
हर बार
की तरह ही
भटका कर
ले जायेंगे ।

चित्र साभार: www.allposters.com

शनिवार, 9 अगस्त 2014

बचपन से चलकर यहाँ तक गिनती करते या नहीं भी करते पर पहुँच ही जाते

दिन के आसमान
में उड़ते हुऐ चील
कौओं कबूतरों के झुंड
और रात में
आकाश गंगा के
चारों ओर बिखरे
मोती जैसे तारों की
गिनती करते करते
एक दो तीन से
अस्सी नब्बे होते जाते
कहीं थोड़ा सा भी
ध्यान भटकते
ही गड़बड़ा जाते
गिनती भूलते भूलते
उसी समय लौट आते
उतनी ही उर्जा और
जोश से फिर से
किसी एक जगह से
गिनती करना
शुरु हो जाते
ऐसा एक दो दिन
की बात हो
ऐसा भी नहीं
रोज के पसंदीदा
खेल हो जाते
कोई थकान नहीं
कोई शिकन नहीं
कोई गिला नहीं
किसी से शिकवा नहीं
सारे ही अपने होते
और इसी होते
होते के बीच
झुंड बदल जाते
कब गिनतियाँ
आदमी और
भीड़ हो जाते
ना दिखते कहीं
तारे और चाँद
ना ही चील के
विशाल डैने
ही नजर आते
थकान ही थकान
मकान ही मकान
पेड़ पौँधे दूर दूर
तक नजर नहीं आते
गिला शिकवा
किसी से करे या ना करें
समझना चाह कर
भी नहीं समझ पाते
समझ में आना शुरु
होने लगता यात्रा का
बहुत दूर तक आ जाना
कारवाँ में कारवाँओं
के समाते समाते
होता ही है होता ही है
कोई बड़ी बात फिर
भी नहीं होती इस सब में
कम से कम अपनापन
और अपने अगर
इन सब में कहीं
नहीं खो जाते ।
  

मंगलवार, 8 जुलाई 2014

मुक्ति के मार्ग चाहने वाले के हिसाब से नहीं होते हैं

एक दिन के
पूरे होने से
जिंदगी बढ़ी
या कम हुई
ऊपर वाले के
यहाँ आवेदन
करने के
हिसाब से तो
अनुभव में
इजाफा
हुआ ही कहेंगे
नीचे वालों के
हिसाब से
देखा जाये
तो जगह
खाली होने के
चाँस बढ़ने
से दिन
कम ही होंगे
गणित जोड़
घटाने का
गणित के
नियमों के
हिसाब से
नहीं होगा
अपनी सुविधा
के हिसाब
से होगा
जो कुछ
भी होगा
या होना होगा
वैसे भी दिन
गिनने वाले
कम ही होते हैं
बाकी सारे
हिसाब किताब
के ऊपर
टाट रखकर
बैठे होते हैं
फर्क किसे
पड़ता है
थोड़ा भी
उनके हिसाब
किताब में
दिन आधे या
पूरे होते हैं
बाकी सभी
के लिये
मुक्ति के
कहीं भी
कोई भी मार्ग
कहीं भी
नहीं होते हैं
सब मिलकर
काँव काँव
कर लेते हैं
एक ही
आवाज में
मजे की बात
है ना ‘उलूक’
जो कौए भी
नहीं होते हैं ।

सोमवार, 16 जुलाई 2012

बस इधर और उधर

इधर जा
उधर जा
देखना मत
झांक आ

कहीं रूखा है
कहीं सूखा है
कहीं झरने हैं
कहीं बादल हैं
कोई खुश है
कोई बिदका है
जैसा भी है
कुछ लिखता है

इधर जा
उधर जा
झांक मत
देख आ

किसी का
अपना है
किसी का
सपना है
वो बनाता है
ये ढूँढ लाता है
उसकी आदत है
इधर जाता है
उधर जाता है
इसका लाता है
उसको दिखाता है
अपनी प्रोफाइल पर
कौए उड़ाता है

इधर जा
उधर जा
झाँक मत
देख मत

अपना खाना
अपना पीना
सब कुछ रख
फेंक मत
कैलेण्डर ला
दीवार पर लगा
अपनी तारीख
किसी को
ना बता
जाली चढ़ा
शीशे लगा
कुछ दिखे
बाहर से
काला भूरा
पेंट लगा

इधर जा
उधर जा
रुक जा
चुप हो जा
फालतू
ना सुना ।

गुरुवार, 31 मई 2012

निठल्ले का सपना

कौआ अगर
नीला होता
तो क्या होता
कबूतर भी
पीला होता
तो क्या होता
काले हैं कौए
अभी भी
कुछ नया कहाँ
कर पा रहे हैं
कबूतर भी
तो चिट्ठियों 

को नहीं ले
जा रहे हैं
एक निठल्ला
इनको कबसे
गिनता हुवा
आ रहा है
मन की कूँची
से अलग
अलग रंगों
में रंगे
जा रहा है
सुरीली आवाज
में उसकी जैसे
ही एक गीत
बनाता है
कौआ
काँव काँव
कर चिल्ला
जाता है
निठल्ला
कुढ़ता है
थोड़ी देर
मायूस हो
जाता है
जैसे किसी
को साँप
सूँघ जाता है
दुबारा कोशिश
करने का मन
बनाता है
कौए को छोड़
कबूतर पर
ध्यान अपना
लगाता है
धीरे धीरे तार
से तार जोड़ता
चला जाता है
लगता है जैसे
ही उसे कुछ
बन गयी
हो बात
एक सफेद
कबूतर
उसके सर
के ऊपर से
काँव काँव कर
आसमान में
उड़ जाता है।

शुक्रवार, 11 मई 2012

धैर्य मित्र धैर्य

आज प्रात:उठने
से ही विचार
आ रहा था
श्रीमती जी पर
कुछ लिखने का
दिल चाह रहा था
सोच बैठा पूरे दिन
इधर उधर कहीं
भी नहीं देखूंगा
कुछ अच्छा सा
उन पर लिख कर
शाम को दे दूंगा
घर से विद्यालय तक
अच्छी बातें सोचता रहा
कूड़ा दिखा भी तो
उसमें बस फूल
ही ढूंढता रहा
पर कौए की
किस्मत मे कहां
मोर का पंख आता है
वैसे लगा भी ले अगर
तो वह मोर
नहीं हो जाता है
कितना भी सीधा
देखने की कोशिश करे
भैंगे को किनारे में
हो रहा सब नजर
आ ही जाता है
उधर मेरा एक साथी
रोता हुआ सा कहीं
से आ रहा था
एक महिला साथी से
बुरी तरह डांट
उसने अभी अभी
खायी है सबको
आके बता रहा था
ऎसा पता चला
कि महिला को
महिला पर ही
गुस्सा आ रहा था
मेरे को तो भाई जी
पर बहुत तरस
आ रहा था
इसी उधेड़बुन में
घर वापस आया
तो श्रीमती जी 
मैने अपनी भुलायी
कलम निकाली मगर
श्रीमती तो दूर दूर
तक कहीं भी
नजर नहीं आयी
दिमाग ने बस एक
निरीह मित्र को
किसी से मार
खाते हुवे जैसी
छवि एक दिखाई
योजना आज की
मैंने खटाई में डुबायी
कोई बात नहीं
कुम्भ जो क्या है
फिर कभी मना लूंगा
अपनी ही है श्रीमती
उसपर कविता एक
किसी और दिन
चलो बना लूंगा।

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