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रविवार, 27 अप्रैल 2014

कुछ दिन के लिये ही मान ले हाथ में है और एक कीमती खिलौना है

आज को भी
कल के लिये
एक कहानी
ही होना है
ना उसमें कोई
राम होना है
ना किसी रावण
को होना है
हनुमान दिख रहे
चारों तरफ पर
उन्हे भी कौन सा
एक हनुमान
ही होना है
राम की एक
तस्वीर होनी है
बंदरों के बीच
घमासान होना है
ना कौरव
को होना है
ना पाँडव
को होना है
शतरंज की बड़ी
बिसात होनी है
सेना को बस
एक लाईन में
खड़ा होना है
ना तलवार
होनी है
ना कोई
वार होना है
अंगुली स्याही
से धोनी है
बस एक काला
निशान होना है
बड़े मोहरों
को दिखना है
बिसात के
बाहर होना है
इसे उसके लिये
वहाँ कुछ कहना है
उसको इसके लिये
यहाँ कुछ कहना है
रावण को लंका
में ही रहना है
राम को अयोध्या
में ही कहना है
आस पास का
रोज का सब ही
एक सा तो रोना है
‘उलूक’ दुखी इतना
भी नहीं होना है
जो कुछ आ जाये
खाली दिमाग में
यहाँ लिख लिखा
के डुबोना है ।

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