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गुरुवार, 28 अगस्त 2014

आज ही के दिन क्रोध दिवस मनाया जाता है

अपनी कायरता
के सारे सच
हर किसी को
पता होते हैं
जरूरत नहीं
पड़ती है जिसकी
कभी किसी
सामने वाले को
समझाने की
सामने वाला भी
कहाँ चाहता है
खोलना अपनी
राज की पर्तों को
कौन हमेशा शांति
में डूबा रह पाता है
अच्छा रहता है
ढका रहे जब तक
चल सके सब कुछ
अपना अपना
अपने अपने
अंदर ही अंदर
पर हर कोई जरूर
एक सिकंदर
होना चाहता है
डर से मरने
से अच्छा
क्रोध बना या
दिखा कर
उसकी ढाल से
अपने को
बचाना चाहता है
सच में कहा गया है
और सच ही
कहा गया है
क्रोध वाकई में
कपटवेश में
एक डर है
अपने ही अंदर
का एक डर
जो डर के ही
वश में होकर
बाहर आकर
लड़ नहीं पाता है
वैसे भी कमजोर
कहाँ लड़ते हैं
वो तो रोज मरते हैं
रोज एक नई मौत
मरना कोई भी
नहीं चाहता है
केवल मौत के
नाम पर
डर डर कर
डर को भगाना
चाहता है
इसी कशमकश में
किसी ना किसी
तरह का एक क्रोध
बना कर उसे
अपना नेता
बना ले जाता है
वो और उसके
अंदर का देश
देश की तरह
आजाद हो जाता है
अंदर होता है
बहुत कुछ
जो बस उसके
डर को पता होता है
और बाहर बस
क्रोध ही आ पाता है
जो अपने झूठ को
छिपाने का एक
बहुत सस्ता सा
हथियार हो जाता है
बहुत सी जगह
बहुत साफ
नजर आता है
बहुत सी काली
चीजों को बहुत बार
झक सफेद चीजों से
ढक दिया जाता है ।

चित्र गूगल से साभार ।

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