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मंगलवार, 3 अप्रैल 2012

अतिथि देवो भव :

क्या हुवा  
भाई
काहे  

बौरा रहे हो
खच्चड़  

हो गया
किसे  

सुना रहे हो?

साहब को
खच्चर
कैसे
बता रहे हो?

परीक्षक
तो आते
ही रहते हैं
परीक्षा
भी हर
साल की
तरह ही
तो करा
रहे हो

अब चार
सितारे
ही तो
दिये गये हैं
यूजीसी/नाक
के द्वारा आपको

फिर पाँच
सितारा
फैसिलिटी
अतिथि गृह में
क्यों चाह रहे हो

माना की
अतिथि का
सत्कार करना
हमारा धर्म है
पर उसे भी
क्या नहीं
करना चाहिये
कुछ कर्म है

आते ही
शुरु हो
जाता है
चाय चाय
चिल्लाता है
पत्ती दूध
अपने साथ
लेकर
क्यों नहीं
वो आता है

कुछ 

देर बाद
चादर
को लेकर
चिल्लायेगा
हल्की तो
होती है
अपने साथ
फिर भी
लेकर
नहीं आयेगा

नाश्ता
खाना पानी
पर ध्यान
फिर लगायेगा
पढ़ाई लिखाई
की बात
करने के
लिये आया है
वो क्या उसका चाचा
करके यहाँ जायेगा

अरे
पूरा देश जब
भगवान के
भरोसे
चलाया
जा रहा है
तो आप
लोगों का
विश्वास
उसपर से
क्यों उठा
जा रहा है

भगवान के
मंदिर वंदिर
घुमा के
ले आओ
विद्यालय
अतिथि गृह को
ताजमहल होटल
बनाने के सपने
मत बनाओ

जाओ
ठंडे हो
जाओ
दिमाग
मत खाओ।

सोमवार, 30 जनवरी 2012

चुनाव पूर्व संध्या

एक बार फिर
कल चांद सितारों
की तमन्ना बोने
देखें कितने लोग
अपने कोटरों से
निकल कर आते हैं
अपने अपने घोड़ो
पर दांव लगाने
कहाँ कहाँ से
कूद फांद लगाते हैं
लम्बी दौड़ का
एक घोड़ा कोई
चलेगा खच्चर से
भी बनाने
कोई तगड़े घोड़े
को पीछे भी
खिसकायेगा
अपने अपने
घोड़ों की इस
रेस में इस
बार दुवा
करियेगा
असली दौड़
का घोड़ा
घोड़ों से ही
ना उलझ पायेगा
मेरे देश को चाहिये
जो दिशा उसे
देने के लिये
वो ही सबसे
आघे निकल जायेगा
बरसों से बोती
आ रही है जो
चांद और सितारे
इस धरती की
अबोध संताने
घोड़ा अपने
लिये ही केवल
नहीं जुटायेगा
चांद सितारे
तोड़ कर ना
भी ला पाये
कोई बात नहीं
उनकी रोशनी
ही काफी होगी
उससे एक
मुस्कान हर
चेहरे पर
देने पाँच सालों
मे कम से कम
कुछ बार
जरूर आ जायेगा।

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