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बुधवार, 12 अक्तूबर 2016

हत्यारे की जाति का डी एन ए निकाल कर लाने का एक चम्मच कटोरा आज तक कोई वैज्ञानिक क्यों नहीं ले कर आया

शहर के एक
नाले में मिला
एक कंकाल
बेकार हो गया
एक छोटी
सी ही बस
खबर बन पाया
किस जाति
का था खुद
बता ही
नहीं पाया
खुद मरा
या मारा गया
निकल कर
अभी कुछ
भी नहीं आया
किस जाति
के हत्यारे
के हाथों
मुक्ति पाया
हादसा था
या किसी ने
कुछ करवाया
समझ में
समझदारों के
जरा भी नहीं
आ पाया
बड़ी खबर
हो सकती थी
जाति जैसी
एक जरूरी
चीज हाथ में
लग सकती थी
हो नहीं पाया
लाश की जाति
और
हत्यारे की जाति
कितनी जरूरी है
जो आदमी है
वो अभी तक
नहीं समझ पाया
विज्ञान और
वैज्ञानिकों को
कोई क्यों नहीं
इतनी सी बात
समझा पाया
डी एन ए
एक आदमी
का निकाल कर
उसने कितना
बड़ा और बेकार
का लफ़ड़ा
है फैलाया
जाति का
डी एन ए
निकाल कर
लाने वाला
वैज्ञानिक
अभी तक
किसी भी
जाति का
लफ़ड़े को
सुलझाने
के लिये
आगे निकल
कर नहीं आया
‘उलूक’
कर कुछ नया
नोबेल तो
नहीं मिलेगा
देश भक्त
देश प्रेमी
लोग दे देंगे
जरूर
कुछ ना कुछ
हाथ में तेरे
बाद में मत
कहना
किसी से
इतनी सी
छोटी सी
बात को भी
नहीं बताया
समझाया ।

चित्र साभार: Clipart Kid

बुधवार, 31 अगस्त 2016

मरे घर के मरे लोगों की खबर भी होती है मरी मरी पढ़कर मत बहकाकर

अखबार के
मुख्य पृष्ठ पर
दिख रही थी
घिरी हुई
राष्ट्रीय
खबरों से
सुन्दरी का
ताज पहने हुऐ
मेरे ही घर की
मेरी ही
एक खबर

हंस रही थी
बहुत ही
बेशरम होकर
जैसे मुझे
देख कर
पूरा जोर
लगा कर
खिलखिलाकर

कहीं पीछे के
पन्ने के कोने में
छुप रही थी
बलात्कार की
एक खबर
इसी खबर
को सामने
से देख कर
घबराकर
शरमाकर

घर के लोग सभी
घुसे हुऐ थे घर में
अपने अपने
कमरों के अन्दर
हमेशा की तरह
आदतन
इरादातन
कुंडी बाहर से
बंद करवाकर

चहल पहल
रोज की तरह
थी आँगन में
खिलखिलाते
हुऐ खिल रहे
थे घरेलू फूल
खेल रहे थे
खेलने वाले
कबड्डी
जैसे खेलते
आ रहे थे
कई जमाने से
चड्डी चड़ाये हुए
पायजामों के
ऊपर से
जोर लगाकर
हैयशा हैयशा
चिल्ला चिल्ला कर

खबर के
बलात्कार
की खबर
वो भी जिसे
अपने ही घर
के आदमियों
ने अपने
हिसाब से
किया गया
हो कवर
को भी कौन सा
लेना देना था
किसी से घर पर

‘उलूक’
खबर की भी
होती हैं लाशें
कुछ नहीं
बताती हैं
घर की घर में
ही छोड़ जाती हैं
मरी हुई खबर
को देखकर
इतना तो
समझ ही
लिया कर ।

चित्र साभार: worldartsme.com

शुक्रवार, 1 जुलाई 2016

होता है उलूक भी खबर लिये कई दिनों तक जब यूँ ही नदारत हो रहा होता है

होता है

सभी के
साथ होता है

कोई गा देता है
कोई रो देता है
कोई खुद के
खो गये होने के
आभास जैसा
मुँह बनाये लटकाये
शहर की किसी
अंधेरी गली की
ओर घूमने जाने
की बात करते हुए
चौराहे की किसी
पतली गली
की ओर हो
रहा होता है

कोई रख देता है
बोने के लिये बीज
सभी चीजों के
नहीं बनते हैं
जानते हुए
बूझते हुए
पेड़ पौंधे
जिनके

कुछ को
आनन्द आता है
जूझते हुए
हुए के साथ

होने ना होने का
बही खाता बनाये
हर खबर की
कबर खोदने वाला
भी भूल सकता है

खबरें भी लाशें
हो जाती है
सड़ती हैं
फूलती हैं
गलती हैं
पड़ी पड़ी

अखबार
समाचार टी वी
रेडियो पत्रकार
निकल निकल
कर गुजर जाते हैं
उसके अगल बगल से
कुछ उत्साहित
उसे उसी के
होंठों पर बेशरमी
के साथ सरे आम
भीड़ के सामने सामने
चूमते हुए भी

अपनी अपनी ढपली
पीटते सरोकारी लोग
झंडे दर झंडे जलाते
पीटते फटी आवाज
के साथ फटी किस्मत
के कुछ घरेलू बीमार
लोगों की तीमारदारी
के रागों को

शहर भी इन सब
सरोकारों के साथ
जहाँ लूला काना
अंधा हो चुका होता है

सरोकारी ‘उलूक’ भी
अपनी चोंच को
तीखा करता हुआ
एक खबर को
बगल में दबाये हुए
एक कबर को
खोदने में
कई दिनों से
लगा होता है

सब को सब
मालूम सब को
सब पता होता है
मातम होना है

पर मातम होने
तक का इंतजार
किसी को भी
नहीं होता है
ना खून होता है
ना आँसू होते हैं
ना ही कोई
होता है जो
जार जार रोता है ।

चित्र साभार: www.123rf.com

बुधवार, 16 मार्च 2016

जब जनाजे से मजा नहीं आता है दोबारा निकाला जाता है

लाश को कब्र से
निकाल कर
फिर से नहला
धुला कर
नये कपड़े पहना कर
आज एक बार फिर से
जनाजा निकाला गया
सारे लोग जो लाश के
दूर दूर तक रिश्तेदार
नहीं थे फिर से
इक्ट्ठा हुऐ
एक कुत्ते को
मारा गया था
शेर मारने की
खबर फैलाई गई थी
कुछ दिन पहले
मजा नहीं आया था
इसलिये फिर से
कब्र खोदी गई
कुत्ते की लाश
निकाल कर शेर के
कपड़े पहनाये गये
जनाजा निकाला गया
एक बार फिर से
सारे कुत्ते
जनाजे में आये
खबर कल के सारे
अखबारों में आयेगी
चिंता ना करें
समझ में अगर
नहीं आये कुछ
ये पहला मौका
नहीं है जब
कबर खोद कर
लाश को अखबार
की खबर और फोटो
के हिसाब से
दफनाया और
फिर से दफनाया
जाता है
कल का अखबार
देखियेगा
खबर देखियेगा
सच को लपेटना
किसको कितना
आता है
ठंड रक्खा कर
'उलूक' तुझे
बहुत कुछ
सीखना है अभी
आज बस ये सीख
दफनाये गये
एक झूठ को
फिर से निकाल
कर कैसे
भुनाया जाता है ।

http://www.fotosearch.com/

रविवार, 17 जनवरी 2016

लोगों की लोगों द्वारा लोगों के लिये

अब्राहम लिंकन
लोगों के लिये
बोल गये थे
लोगों की
समझ में
आज तक बात
नहीं घुस पाई है
धूर्तों की जय हो
नियम कानून
बना संवार कर
अपने साम्राज्य
की ईंटे क्या
चमकाई हैं
धूर्तों की महासभा
में फिर एक बार
धूर्तों ने अपनी
ताकत दिखलाई है
धूर्तों की, धूर्तों द्वारा,
धूर्तों के लिए
लाग़ू होता है
लोग की जगह
होना भी चाहिये
कोई बुराई नहीं है
खबर भी आई है
नियमावली नई
बनवाई है
बात धूर्तों के खुद
के अधिकारों की है
खुजली हो जाने
वालों को खुजली
होती ही है
होती आई है
कोई नई बात नहीं है
कई बार खुजलाई है
खुजलाने की आदत
पड़ ही चुकी है
अच्छा महसूस होता है
दवाई भी इसीलिये
नहीं कोई कभी खाई है
बैचेनी सी महसूस
होने लगती है हमेशा
पता चलता है जब
कई दिनों से उनकी
कोई खबर शहर के
पन्ने में अखबार
के नहीं आई है
‘उलूक’ तू लोगों में
वैसे भी नहीं
गिना जाता है
और धूर्तों से तेरा
हमेशा का छत्तीस
का नाता है

तुझे भी हर बात पर
खुजलाने के अलावा
और क्या आता है 

खुजला ले तमन्ना
से जी भर कर
यहाँ खुजली करने
की किसी को भी
दूर दूर तक कहीं 

नहीं 
कोई मनाही  है ।

चित्र साभार: www.clipartsheep.com

सोमवार, 2 नवंबर 2015

खाली सफेद पन्ना अखबार का कुछ ज्यादा ही पढ़ा जा रहा था

कुछ ज्यादा
ही हलचल
दिखाई
दे रही थी
अखबार के
अपने पन्ने पर

संदेश भी
मिल रहे थे
एक नहीं
ढेर सारे
और
बहुत सारे
क्या
हुआ होगा
समझ में
नहीं आ
पा रहा था

पृष्ठ पर
आने जाने
वालों पर
नजर रखने
वाला
सूचकाँक
भी ऊपर
बहुत ऊपर
को चढ़ता
हुआ नजर
आ रहा था

और
ये सब
शुरु हुआ था
जिस दिन से
खबरें छपना
थोड़ा कम होते
कुछ दिन के
लिये बंद
हुआ था

ऐसा नहीं था
कि खबरें नहीं
बन रही थी

लूट मार हमेशा
की तरह धड़ल्ले
से चल रही थी
शरीफ लुटेरे
शराफत से रोज
की तरफ काम
पर आ जा रहे थे

लूटना नहीं
सीख पाये
बेवकूफ
रोज मर्रा
की तरह
तिरछी
नजर से
घृणा के
साथ देखे
जा रहे थे

गुण्डों की
शिक्षा दीक्षा
जोर शोर से
औने पौने
कोने काने
में चलाई
जा रही थी

पढ़ाई लिखाई
की चारपाई
टूटने के
कगार पर
चर्र मर्र
करती हुई
चरमरा रही थी

‘उलूक’
काँणी आँख से
रोज की तरह
बदबूदार
हवा को
पचा रहा था
देख रहा था
देखना ही था
आने जाने के
रास्तों पर
काले फूल
गिरा रहा था

कहूँ ना कहूँ
बहुत कह
चुका हूँ
सभी
कुछ कहा
एक ही
तरह का
कब तक
कहा जाये
सोच सोच
कर कलम
कभी
सफेद पानी में
कभी
काली स्याही में
डुबा रहा था

एक दिन
दो दिन
तीन दिन
छोड़ कर
कुछ नहीं
लिखकर
अच्छा कुछ
देखने
अच्छा कुछ
लिखने
का सपना
बना रहा था

कुछ नहीं
होना था
सब कुछ
वही रहना था
फिर लिखना
शुरु
किया भी
दिखा भी
अपनी सूरत
का जैसा ही
जमाने से
लिखा गया
आज भी
वैसा ही कुछ
कूड़ा कूड़ा
सा ही
लिखा जा
रहा था

जो है सो है
बस यही पहेली
बनी रही थी
देखने पढ़ने
वाला खाली
सफेद पन्ने को
इतने दिन
बीच में
किसलिये
देखने के लिये
आ रहा था ।

चित्र साभार: www.clker.com

शनिवार, 3 अक्तूबर 2015

लिखना सीख ले अब भी लिखने लिखाने वालों के साथ रहकर कभी खबरें ढूँढने की आदत ही छूट जायेगी

वैसे कभी सोचता
क्यों नहीं कुछ
लिख लेना सीख
लेने के बारे में भी
बहुत सी समस्याँऐं
हल हो जायेंगी
रोज एक ना एक
कहीं नहीं छपने
वाली खबर को
लेकर उसकी कबर
खोदने की आदत
क्या पता इसी
में छूट जायेगी
पढ़ना समझना
तो लगा रहता है
अपनी अपनी
समझ के
हिसाब से ही
समझने ना
समझने वाले
की समझ में
घुसेगी या
बिना घुसे ही
फिसल जायेगी
लिखने लिखाने
वालों की खबरें ही
कही जाती हैं खबरें
लिखना लिखाना
आ जायेगा अगर
खबरों में से एक
खबर तेरी भी शायद
कोई खबर हो जायेगी
समझ में आयेगा
तेरे तब ही शायद
‘उलूक’
पढ़े लिखे खबर वालों
को सुनाना खबर
अनपढ़ की बचकानी
हरकत ही कही जायेगी
खबर अब भी होती
है हवा में लहराती हुई
खबर तब भी होगी
कहीं ना कहीं लहरायेगी
पढ़े लिखे होने के बाद
नजर ही नहीं आयेगी
चैन तेरे लिये भी होगा
कुछ बैचेनी रोज का रोज
बेकार की खबरों को
पढ़ने और झेलने
वालों की भी जायेगी ।

चित्र साभार: www.clipartsheep.com

शुक्रवार, 18 सितंबर 2015

भाई कोई खबर नहीं है खबर गई हुई है

सारे के सारे
खबरची
अपनी अपनी
खबरों के साथ
सुना गया है
टहलने चले गये हैं
पक्की खबर नहीं है
क्योंकि किसी को
कोई भी खबर बना
कर नहीं दे गये हैं
खबर दे जाते तब भी
कुछ होने जाने
वाला नहीं था
परेशानी बस
इतनी सी है
कि समझ में
नहीं आ पा रहा है
इस बार ऐसा
कैसे हो गया
खबर दे ही
नहीं गये हैं
खबर अपने
साथ ही ले गये हैं
अब ले गये हैं तो
कैसे पता चले
खबर की खबर
क्या बनाई गई है
कैसे बनाई गई है
किस ने लिखाई है
किस से लिखवाई गई है
किसका नाम
कहाँ पर लिखा है
किस खबरची को
नुकसान हुआ है
और किस खबरची को
फायदा पहुँचा है
बड़ी बैचेनी हो गई है
जैसे एक दुधारू भैंस
दुहने से पहले खो गई है
‘उलूक’ सोच में हैं तब से
खाली दिमाग को
अपने हिला रहा है
समझ में कभी भी
नहीं आ पाया जिसके
सोच रहा है
कुछ आ रहा है
कुछ आ रहा है
बहुत अच्छा हुआ
खबर चली गई है
और खबरची के
साथ ही गई है
खबर आ
भी जाती है
तब भी कहाँ
समझ में
आ पाती है
खबर कैसी
भी हो माहौल तो
वही बनाती है ।

चित्र साभार: www.pinterest.com

मंगलवार, 8 सितंबर 2015

समाचार बड़े का कहीं बड़ा कहीं थोड़ा छोटा सा होता है

बकरे और मुर्गे
चैंन की साँस
खींच कर
ले रहे हैं
सारे नहीं देश
में बस एक दो
जगह पर कहीं
वहीं मारिया जी की
पदोन्नति हो गई है
शीना बोरा को
आरूषि नहीं बनने दूँगा
उनसे कहा गया
उनके लिये लगता है 
फलीभूत हो गया है
मृतक की आत्मा ने
खुश हो कर
सरकार से उनको
अपने केस को छोड़
आगे बढ़ाने के लिये
कुछ कुछ बहुत
अच्छा कह दिया है
हेम मिश्रा बेल पर
बाहर आ गया है
सरकार का कोई
आदमी आकर इस
बात को यहाँ
नहीं बता गया है
खुद ही बाहर आया है
खुद ही आकर उसने
खुद ही फैला दिया है
बड़े फ्रेम की बडी खबरें
और उसके
फ्रेम की
दरारों से 
निकलती
छोटी खुरचने
रोज ही होती हैं
ऐसे में ही होता है और
बहुत अच्छा होता है
अपने छोटे फ्रेम के
बड़े लोगों की छोटी
छोटी जेबकतरई
उठाइगीरी के बीच
से उठा कर कुछ
छोटा छोटा चुरा
कर कुछ यहाँ
ले आना होता है
फिर उसे जी भर
कर अपने ही कैनवास
में बेफिक्र सजाना होता है
बड़े हम्माम से अच्छा
छोटे तंग गोसलखाने का
अपना मजा अपना
ही आनन्द होता है

उलूक करता रहता है
हमेशा कुछ ना कुछ
नौटंकी कुछ कलाकारी
कुछ बाजीगरी
उसकी रात की दुनियाँ
में इन्ही सब फुलझड़ियों
का उजाला होता है  ।

चित्र साभार:
earthend-newbeginning.com

सोमवार, 7 सितंबर 2015

खबर है खबर रहे प्रश्न ना बने ऐसा कि कोई हल करने के लिये भी कहे

क्या है ये एक डेढ़
पन्ने के अखबार
के लिये रोज एक
तुड़ी मुड़ी सिलवटें
पड़ी हुई खबर
उसे भी खींच तान
कर लम्बा कर जैसे
नंगे के खुद अपनी
खुली टाँगों के
ना ढक पाने की
जद्दोजहद में
खींचते खींचते
उधड़ती हुई बनियाँन
के लटके हुऐ चीथड़े
आगे पीछे ऊपर नीचे
और इन सब के बीच में
खबरची भी जैसे
लटका हुआ कहीं
क्या किया जा सकता है
रोज का रोज रोज की
एक चिट्ठी बिना पते की
एक सफेद सादे पन्ने
के साथ उत्तर की
अभिलाषा में बिना टिकट
लैटर बाक्स में डाल कर
आने का अपना मजा है
पोस्टमैन कौन सा
गिनती करता है
किसी दिन एक कम
किसी दिन दो ज्यादा
खबर ताजा हो या बासी
खबर दिमाग लगाने
के लिये नहीं पढ़ने सुनने
सुनाने भर के लिये होती है
कागज में छपी हो तो
उसका भी लिफाफा
बना दिया जाता है कभी
चिट्ठी में घूमती तो रहती है
कई कई दिनों तक
वैसे भी बिना पते के
लिफाफे को किसने
खोलना है किसने पढ़ना है
पढ़ भी लिया तो कौन सा
किसी खबर का जवाब
देना जरूरी होता है
कहाँ किसी किताब में
लिखा हुआ होता है
लगा रह ‘उलूक’
तुझे भी कौन सा
अखबार बेचना है
खबर देख और
ला कर रख दे
रोज एक कम से कम
एक नहीं तो कभी
आधी ही सही
कहो कैसी कही ?

चित्र साभार: www.clipartsheep.com

शुक्रवार, 5 जून 2015

सब कुछ सीधा सीधा हो हमेशा ऐसा कैसे हो

रख दे अपना
दिल खोल कर
अपने सामने से
और पढ़ ले
हनुमान चालीसा
किसी को भी
तेरे दिल से
क्या लेना देना
सबके पास
अपना एक
दिल होता है
हाँ हो सकता है
हनुमान जी
के नाम पर
कुछ लोग रुक जायें
ये बात अलग है
कि हनुमान जी
किस के लिये
क्या कर सकते हैं
हो सकता है
हनुमान जी के लिये
भी प्रश्न कठिन हो जाये
उन्हें भी आगे कहीं
राम चंद्र जी के पास
पूछ्ने के लिये
जाना पड़ जाये
इसीलिये हमेशा
राय दी जाती है
खबर के चक्कर में
पड़ना ठीक नहीं है
खबर बनाने वाले
की मशीन खबर वाले
के हाथ में नहीं होती है
खबर की भी
एक नब्ज होती है
एक घड़ी होती है
जो टिक टिक
नहीं करती है
हनुमान जी ने
उस जमाने में घड़ी
देखी भी नहीं होगी
देखी होती तो
तुलसीदास जी की
किताब में कहीं ना कहीं
लिखी जरूर होती
इसलिये ठंड रख
गरम मत हो
खा पी और सो
खबर को अखबार
में रहने दे
अपने दिल को उठा
और वापिस दिल
की जगह में फिर से बो
हनुमान जी की भी
जय हो जय हो जय हो ।

चित्र साभार: beritapost.info

गुरुवार, 14 मई 2015

समझदार एक जगह टिक कर अपनी दुकान नहीं लगा रहा है

किसलिये
हुआ जाये
एक अखबार
क्यों सुनाई
जाये खबरें
रोज वही
जमी जमाई दो चार
क्यों बताई
जाये शहर
की बातें
शहर वालों को हर बार
क्यों ना
कुछ दिन
शहर से
हो लिया जाये फरार
वो भी यही
करता है
करता आ
रहा है
यहाँ जब
कुछ कहीं
नहीं कर
पा रहा है
कभी इस शहर
तो कभी उस शहर
चला जा रहा है
घर की खबर
घर वाले सुन
और सुना रहे हैं
वो अपनी खबरों
को इधर उधर
फैला रहा है
सीखना चाहिये
इस सब में भी
बहुत कुछ है
सीखने के लिये ‘उलूक’
बस एक तुझी से
कुछ नहीं हो पा रहा है
यहाँ बहुत
हो गया है
अब तेरी
खबरों का ढेर
कभी तू भी
उसकी तरह
अपनी खबरों
को लेकर
कुछ दिन
देशाटन
करने को
क्यों नहीं
चला जा रहा है ।

चित्र साभार: www.fotosearch.com

रविवार, 12 अप्रैल 2015

जय हो जय हो कह कह कर कोई जय जय कार कर रहा था

पहले दिन की खबर
बकाया चित्र के साथ थी
पकड़ा गया था एक
सरकारी चिकित्सक
लेते हुऐ शुल्क मरीज से
मात्र साढ़े तीन सौ रुपिये
सतर्क सतर्कता विभाग के
सतर्क दल के द्वारा
सतर्कता अधिकारी था
मूँछों में ताव दे रहा था
पैसे कम थे पर खबर
एक बड़ी दे रहा था
दूसरे दिन वही
चिकित्सक था
लोगों की भी‌ड़ से
घिरा हुआ था
अखबार में चित्र
बदल चुका था
चिकित्सक था मगर
मालायें पहना हुआ था
न्यायधिकारी से
डाँठ खा कर
सतर्कता अधिकारी
खिसियानी हँसी कहीं
कोने में रो रहा था
ऐसा भी अखबार
ही कह रहा था
दो दिन की एक
ही खबर थी
लिखे लिखाये में
कुछ इधर का
उधर हो रहा था
कुछ उधर का
इधर हो रहा था
‘उलूक’ इस सब पर
अपनी कानी आँख से
रात के अंधेरे में
नजर रख रहा था
उसे गर्व हो रहा था
कौम में उसकी
जो भी जो कुछ
कर रहा था
बहुत सतर्क हो
कर कर रहा था
सतर्कता से
करने के कारण
साढ़े तीन सौ का
साढ़े तीन सौ गुना
इधर का उधर
कर रहा था
चित्र, अखबार,
उसके लोगों का
खबर के साथ
खबरची हमेशा
भर रहा था
सतर्क सतर्कता
विभाग के
सतर्क दल का
सतर्क अधिकारी
पढ़ाना लिखाना
सिखाने वालों के
पढ़ने पढ़ाने को
दुआ सलाम
कर रहा था
पढ़ने पढ़ाने के
कई फायदे में से
असली फायदे का
पता चल रहा था
कोई पाँव छू रहा था
कोई प्रणाम कर रहा था
ऊपर वाले का गुणगाँन
विदेश में जा जा कर
देश का प्रधान कर रहा था ।

चित्र साभार: www.clipartheaven.com

बुधवार, 8 अप्रैल 2015

सारे जोर लगायेंगे तो मरे हाथी को खड़ा कर ले जायेंग़े

चट्टान पर
बुद्धिमान ने
बनाया
अपना घर
और जोर की
वर्षा आई
बचपन में
सुबह की
स्कूल में की
जाने वाली
प्रार्थना का
एक गीत
याद आ पड़ा
उस समय
जब सामने
से ही अपने
कुछ दूरी पर
जोर के
धमाकों के साथ
फटते पठाकों
की लड़ियों
को घेर कर
उछलता हुआ
एक झुण्ड
दिखा खड़ा
इससे पहले
किसी से कुछ
पूछने की
जरूरत पड़ती
दिमाग के
अंदर का
फितूरी गधा
दौड़ पड़ा
याद आ पड़ी
सुबह सुबह
अखबार के
मुख्य पृष्ठ पर
छपी हुई
ताजी एक खबर
जनता जनार्दन
एक कददू
और कुछ तीर
साथ में अपने
गधे का जनाजा
और उसकी
खुद की ही
अपने लिये
खोदी गई
साफ सुथरी
कबर
सारी खुदाई
एक तरफ
अपना भाई
एक तरफ
जब जब
अपनी सोच
के सोच होने
का वहम
कभी हुआ है
अपना
यही गधा
सीना तान
कर अपनी
सोच के साथ
खड़ा हुआ है
‘उलूक’
इतना कम
नहीं है क्या ?
बनाने दे
दुनियाँ को
रेत के
ताजमहल
पकड़ अपनी
सोच के गधे
की लगाम
और निकल
ले कहीं
तमाशा देखने
के चक्कर में
गधा भी लग
लिया लाईन में
तो कहीं का
नहीं रह जायेगा
अकेला हो
गया तो
चना भी नहीं
फोड़ पायेगा ।
चित्र साभार: imgarcade.com

गुरुवार, 12 मार्च 2015

आदमी की खबरों को छोड़ गधे को गधों की खबरों को ही सूँघने से नशा आता है

अब ये तो नहीं पता
कि कैसे हो जाता है
पर सोचा हुआ
कुछ कुछ आगे
आने वाले समय में
ना जाने कैसे
सचमुच ही
सच हो जाता है
गधों के बीच में
रहने वाला गधा
ही होता है
बस यही सच
पता नहीं हमेशा
सोचते समय कैसे
भूला जाता है
गधों का राजा
गधों में से ही एक
अच्छे गधे को
छाँट कर ही
बनाया जाता है
इसमें कोई गलत
बात नहीं ढूँढी
जानी चाहिये
संविधान गधों का
गधों के लिये
ही होता है
गधों के द्वारा
गधों के लिये ही
बनाया जाता है
तरक्की भी गधों
के राज में गधों
को ही दी जाती है
एक छोटी कुर्सी से
छोटे गधे को
बड़ी कुर्सी में
बैठाया जाता है
छोटी कुर्सी के लिये
एक छोटा मगर
पहले से ही
जनप्रिय बनाया और
लाईन पर लगाया
गधा बैठाया जाता है
सब कुछ सामान्य
सी प्रक्रियाऐं ही
तो नजर आती है
बस ये समझ में
नहीं आ पाता है
जब खबर फैलती है
किसी गधे को
कहीं ऊपर बैठाये
जाने की ‘उलूक’
तुझ गधे को पसीना
आना क्यों
शुरु हो जाता है ?

चित्र साभार: www.clipartof.com

सोमवार, 2 फ़रवरी 2015

पकी पकाई खबर है बस धनिया काट कर ऊपर से सजाया है

बच्चों की जेल
से बच्चे फरार
हो गये हैं
ऐसा खबरची
खबर ले कर
आज आया है
देख लेना चाहिये
कहीं उसी झाडू‌
वाले ने फर्जी
मतदान करने
तो नहीं बुलाया है
अपनी जेब पर
चेन लगाकर
बाहर और अंदर
दोनो तरफ से
बंद करवाया है
उसकी खुली जेब
से झाँक रहे नोटों
पर कहानी बना
कर चटपटी
एक लाया है
सवा करोड़
चिट्ठियों में कहाँ
कुछ खर्च होता है
बहुत सस्ते कागज
में सरकारी
छापे खाने में
श्रमदान
करने वाले
कर्मचारियों
को काम पर
लगा कर
छपवाया है
बहुत कुछ
किया है
बहुत कुछ
करवाया है
दिखाना जरूरी
नहीं होता है
इसलिये कुछ
कहीं नहीं
दिखाया है
आदमी छोड़िये
भैंसे भी कायल
हो चुकी हैं
बड़ी बात है
बिना लाठी
हाथ में लिये
भैंस को अपना
बनाया है
जादू है जादूगर है
जादूगरी है
तिलिस्म है
छोड़ कर जाने
वाले इतिहास
हो गये हैं
हर किसी को
इधर से हो या
उधर से हो
अपने में घुलाया
और मिलाया है
मिर्ची तुमको
भी लगती है
इस तरह की
बातें पढ़कर
कोई नई
बात नहीं है
मिर्ची हमें
भी लगती है
अच्छी बातों का
अच्छा प्रचार
पढ़कर
अच्छे लोगों
का बोलबाला है
बुरों को लिखने
लिखाने का
रोग लगवाया है
क्या करें आदतन
मजबूर हैं
देखते हैं रोज
अपने आस पास
के घुन लगे हुऐ
गेहूँ के बीजों को
यहाँ उगना मुश्किल
होता है जिनका
रेगिस्तान में
उसी तरह के बीजों
से कैसे हरा पौँधा
उगता हुआ दिखाया है
‘उलूक’ पीटता रहता है
फटे हुऐ ढोलों को
गली मुहल्ले के
मुहानों पर
कई सालों से
कौओं ने कबूतरों से
सभी जलसों में
देश प्रेम का भजन
गिद्धों के सम्मान
में बजवाया है ।

चित्र साभार: homedesignsimple.info

गुरुवार, 8 जनवरी 2015

खबरची और खबर कर ना कुछ गठजोड़

जरूरत है एक
खबरची की
जो बना सके
एक खबर
मेरे लिये
और बंटवा दे
हर उस पन्ने
पर लिख कर
जो देश के
ज्यादातर
समझदार
लोगों तक
पहुँचता हो
खबर ऐसी
होनी चाहिये
जिसके बारे में
किसी को कुछ
पता नहीं हो
और जिसके होने
की संभावना
कम से कम हो
शर्त है मैं खबर
का राकेट छोड़ूंगा
हवा में और वो
उड़ कर गायब
हो जायेगा
खबर खबरची
फैलायेगा
फायदा
जितना भी
होगा राकेट
के धुऐं का
पचास पचास
फीसदी पी
लिया जायेगा
कोई नहीं पूछता
है खबर के बारे में
ज्यादा से ज्यादा
क्या होगा
बहस का एक
मुद्दा हो जायेगा
वैसे भी ऐसी चीज
जिसके बारे में
किसी को कुछ
मालूम नहीं होता है
वो ऐसी खबर के
बारे में पूछ कर
अज्ञानी होने का
बिल्ला अपने
माथे पर क्यों
लगायेगा
इसमें कौन सी
गलत बात है
अगर एक
बुद्धिजीवी
दूध देने वाले
कुत्तों का कारखाना
बनाने की बात
कहीं कह जायेगा
कुछ भी होना
संभव होता है
वकत्वय अखबार
से होते हुऐ
पाठक तक तो
कम से कम
चला जायेगा
कारखाना बनेगा
या नहीं बनेगा
किसको सोचना है
कबाड़ी अखबार
की रद्दी ले जायेगा
हो सकता है
आ जाये सामने से
फिर खबरची की
खबर भविष्य में
कहीं सब्जी की
दुकान में सामने से
जब सब्जी वाला
खबर के अखबार से
बने लिफाफे में
आलू या टमाटर
डाल कर हाथ
में थमायेगा
जरूरत है एक
खबरची की
जो मेरे झंडे को
लेकर एवरेस्ट पर
जा कर चढ़ जायेगा
ज्यादा कुछ
नहीं करेगा
बस झंडे को
एक एक घंटे के
अंतर पर
हिलायेगा ।

चित्र साभार: funny-pictures.picphotos.net

रविवार, 2 नवंबर 2014

रात में अपना अखबार छाप सुबह उठ और खुद ही ले बाँच

बहुत अच्छा है
तुझे भी पता है
तू कितना सच्चा है
अपने घर पर कर
जो कुछ भी
करना चाहता है
कर सकता है
अखबार छाप
रात को निकाल
सुबह सवेरे पढ़ डाल
रेडियो स्टेशन बना
खबर नौ बजे सुबह
और नौ बजे
रात को भी सुना
टी वी भी दिखा
सकता है
अपनी खबर को
अपने हिसाब से
काली सफेद या
ईस्टमैन कलर
में दिखा सकता है
बाहर तो सब
सरकार का है
उसके काम हैं
बाकी बचा
सब कुछ
उसके रेडियो
उसके टी वी
उसके और उसी का
अखबार उसी के
हिसाब से ही
बता सकता है
सरकार के आदमी
जगह जगह पर
लगे हुऐ हैं
सब के पास
छोटे बड़े कई तरह
के बिल्ले इफरात
में पड़े हुऐ हैं
किसी की पैंट
किसी की कमीज
पर सिले हुऐं है
थोड़े बहुत
बहुत ज्यादा बड़े
की कैटेगरी में आते हैं
उनके माथे पर
लिखा होता है
उनकी ही तरह के
बाकी लोग बहुत
दूर से भी बिना
दूरबीन के भी
पढ़ ले जाते हैं
ताली बजाने वालों
को ताली बजानी
आती है
ऊपर की मंजिल
खाली होने के
बावजूद छोटी सी
बात कहीं से भी
अंदर नहीं घुस पाती है
ताली बजाने से
काम निकल जाता है
सुबह की खबर में
क्या आता है और
क्या बताया जाता है
ताली बजाने के बाद
की बातों से किसी
को भी इस सब से
मतलब नहीं रह जाता है
‘उलूक’ अभी भी
सीख ले अपनी खबर
अपना अखबार
अपना समाचार
ही अपना हो पाता है
बाकी सब माया मोह है
फालतू में क्यों
हर खबर में तू
अपनी टाँग अढ़ाता है ।

चित्र साभार: clipartcana.com

शुक्रवार, 31 अक्तूबर 2014

विवेकानन्द जी आपसे कहना जरूरी है बधाई हो उस समय जब आपकी सात लाख की मूर्ति हमने अपने खेत में आज ही लगाई हो

अखबार खरीद कर
रोज घर लाने की
आदत पता नहीं
किस दिन तक
यूँ ही आदत
में शामिल रहेगी
पहले दिन से ही
पता रहती है जबकि
कल किसकी कबर
की खबर और
किस की खबर
की कबर बनेगी
मालूम रहता है
आधा सच हमेशा
आधे पन्ने में
लिख दिया जाता है
वैसे भी पूरी बात
बता देने से
बात में मजा भी
कहाँ रह जाता है
एक पूरी कहानी
होती है
एक मंदिर होता है
और वो किसी
एक देवता के
लिये ही होता है
देवता की खबर
बन चुकी होती है
देवता हनीमून से
नहीं लौटा होता है
मंदिर की भव्यता
के चर्चे से भरें होंगे
अखबार ये बात
अखबार खरीदने
वाले को पता होता है
मंदिर बनने की जगह
टाट से घिरी होती है
और एक पुराना
कैलैण्डर वहाँ
जरूर टंका होता है
वक्तव्य दर वक्तव्य
मंदिर के बारे में भी
और देवता
के बारे में भी
उनके होते हैं
जिनका देवताओं
पर विश्वास कभी
भी नहीं होता है
रसीदें अखबार में
नहीं होती हैं
भुगतान किस को
किया गया है
बताना नहीं होता है
किस की
निविदा होती है
किस को
भुगतान होता है
किस का
कमीशन होता है
किस ने
देखना होता है
कुत्तों की
जीभें होती हैं
बिल्लियों का
रोना होता है
‘उलूक’
तेरी किस्मत है
तुझे तो हमेशा
ही गलियों में
मुहँ छिपा कर
रोना होता है |

चित्र साभार : http://marialombardic.blogspot.com/

शनिवार, 27 सितंबर 2014

छोटी चोरी करने के फायदों का पता आज जरूर हो रहा है

चोर होने की
औकात है नहीं
डाकू होने की
सोच रहा है
तू जैसा है
वैसा ही ठीक है
तेरे कुछ भी
हो जाने से
यहाँ कुछ नया
जैसा नहीं
हो रहा है
थाना खोल ले
घर के किसी
भी कोने में
और सोच ले
कुर्सी पर बैठा
एक थानेदार
मेज पर अपना
सिर टिका कर
सो रहा है
देख नहीं रहा है
दूरदर्शन आज का
कुछ अनहोनी सी
खबर कह रहा है
चार साल के लिये
अंदर हो जाने वाली है
और ऊपर से सौ करोड़
जमा करने का आदेश
भी न्यायालय उसको
साथ में दे रहा है
बेचारी को बहुत
महँगा पड़ रहा है
दोस्त देश के
बाहर गया हुआ भी
दो शब्द साँत्वना के
नहीं कह रहा है
समझ में ये नहीं
आ पा रहा है कि
पुराना घास खा
गया घाघ
अभी तक अंदर है
या बाहर कहीं
किसी जगह अब
मौज में सो रहा है
खबर ही नहीं
आती है उसकी
कुछ भी मालूम
नहीं हो रहा है
आज कुछ कुछ
कोहरे के पीछे
का मंजर थोड़ा सा
कुछ साफ जैसा
हो रहा है
बहुत समझदार है
मध्यम वर्गीय चोर
मेरे आस पास का
ये आज ही सालों साल
सोचने के बाद भी
बिना सोचे बस
आज और आज
ही पता हो रहा है
हाथ लम्बे होने
के बाद भी
लम्बे हाथ मारने
का खतरा कोई
फिर भी क्यों
नहीं ले रहा है
बस थोड़ा थोड़ा
खुरच कर दीवार
का रंग रोगन
अपने आने वाले
भविष्य की संतानों
के लिये बनने वाले
सपने के ताजमहल
की पुताई का
मजबूत जुगाड़
ही तो हो रहा है
‘उलूक’ बैचेन है
आज जो भी
हो रहा है
किसी के साथ
इस तरह का
बहुत अच्छा जैसा
तो नहीं हो रहा है
थोड़ी थोड़ी करती
रोज कुछ करती
हमारी तरह करती
तो पकड़ी भी
नहीं जाती
शाबाशियाँ भी कई
सारी मिलती
जनता रोज का रोज
ताली भी साथ में बजाती
सबकी नहीं भी होती तो भी
दो चार शातिरों की फोटो
खबर के साथ अखबार में
रोज ही किसी कालम में
नजर आ ही जाती
दूध छोड़ कर बस
मलाई चोर कर खाने का
बिल्कुल भी अफसोस
आज बिल्कुल भी
नहीं हो रहा है ।

चित्र साभार: http://www.canstockphoto.com/

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