http://blogsiteslist.com
खराब लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
खराब लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 13 अक्तूबर 2014

कोई नहीं कोई गम नहीं तू भी यहीं और मैं भी यहीं

साल के दसवें
महीने का
तेरहवाँ दिन
तेरहवीं नहीं
हो रही है कहीं
हर चीज
चमगादड़
नहीं होती है
और उल्टी भी
लटकती हुई नहीं
कभी सीधा भी
देख सोच लिया कर
घर से निकलता है
सुबह ऊपर
आसमान में
सूरज नहीं
देख सकता क्या
असीमित उर्जा
का भंडार
सौर उर्जा
घर पर लगवाने
के लिये नहीं
बोल रहा हूँ
सूरज को देखने
भर के लिये ही
तो कह रहा हूँ
क्या पता शाम
होते होते सूरज के
डूबते डूबते
तेरी सोच भी
कुछ ठंडी हो जाये
और घर लौटते लौटते
शाँत हवा के झौकों के
छूने से थोड़ा कुछ
रोमाँस जगे
तेरी सोच का
और लगे तेरे
घर वालों को भी
कहीं कुछ गलत
हो गया है
और गलत होने
की सँभावना
बनी हुई है
अभी भी
जिंदगी के
तीसरे पहर से
चौथे पहर की
तरफ बढ़ते हुऐ
कदमों की
पर होनी तो तेरे
साथ ही होती है
‘उलूक’
जो किसी को
नहीं दिखाई देता
किसी भी कोने से
तेरी आँखे
उसी कोने पर
जा कर रोज
अटकती हैं
फिर भटकती है
और तू चला आता है
एक और पन्ना
खराब करने यहाँ
इस की भी किस्मत
देश की तरह
जगी हुई लगती है ।

चित्र साभार: http://www.gograph.com/

सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

आदत खराब है कह दिया मत कह देना बस समझ लेना

गरीबों पर किया
जायेगा फोकस
एक दैनिक
समाचार पत्र के
मुख्य पृष्ठ पर
छपा आज का
मुख्य समाचार
और साथ में
फोकस करने
कराने वाले
जनता के सेवक
की तस्वीर से
जब हुआ सामना
एक एक करके
घूमने लगे
जनता के सेवक
अपने घर के
मौहल्ले के शहर के
राज्य और देश के
लिये हाथ में
एक एक मोटा लेंस
जिसके एक तरफ
प्रचंड सूरज और
दूसरी तरफ गरीब
फोकस होता हुआ
और उसके बाद
बनता हुआ
धीरे धीरे
कुछ धुआँ
कुछ कुछ धुँधलाते
धुँधलाते कुछ
जब साफ हुआ
कुछ भी नहीं दिखा
समझ में आने लगा
काम हुआ और
साथ ही साथ
तमाम भी हुआ
एक पंथ दो काज
का उदाहरण देना
बहुत आसान हुआ
ना गरीबी रही
ना गरीब रहा
वाकई जनता के
सेवकों की दूरदृष्टि
ने कुछ मन मोहा
दाल चावल सब्जी
मिलने के बाद
भी जिसने उसे
बिल्कुल नहीं छुआ
रख दिया सम्भाल
कर भविष्य के लिये
बस कुछ तड़का ही
अपने काम के
लिये रख लिया
गरीब की गरीबी
पर फोकस करने
का एक आसान
सा रास्ता ही चुना
हींग लगी ना
फिटकरी और
रंग भी चोखा
सामने सामने बना
गरीब पर फोकस
या फोकस पर गरीब
सिक्का ना इधर गिरा
ना उधर ही गिरा
जनता ने ही
जनता के लिये
जनता के द्वारा
सिक्का खड़ा करने
का संकल्प लेने
का रास्ता फिर से
एक बार चुना
कोई भी चुन
कर आये
दिखा साफ साफ
गरीब पर ही
लगना है इस
बार भी चूना
ठीक नहीं हैं
आसार और
गरीब के फिर से
फोकस पर होना ।

बुधवार, 25 सितंबर 2013

अपने कैलेंडर में देख अपनी तारीख उसके कैलेंडर में कुछ नया नहीं होने वाला है

रोज एक कैलेंडर
नई तारीख का
ला कर यहां लटका
देने से क्या कुछ
नया होने वाला है
सब अपने अपने
कैलेंडर और तारीख
लेकर अपने साथ
चलने लगे हैं आजकल
उस जगह पर तेरे
कैलेंडर को कौन देखेने
आने वाला है
अब तू कहेगा तुझे
एक आदत हो गई है
अच्छी हो या खराब
किसी को इससे
कौन सा फर्क जो
पड़ने वाला है
परेशानी इस बात
की भी नहीं है
कहीं कोई कह रहा हो
दीवार पर नये साल पर
नया रंग होने वाला है
जगह खाली पड़ी है
और बहुत पड़ी है
इधर से लेकर उधर तक
जहां जो मन करे जब करे
लटकाता कोई दूर तक
अगर चले भी जाने वाला है
सबके पास हैं बहुत हैं
हर कोई कुछ ना कुछ
कहीं ना कहीं पर
ला ला कर
लटकाने वाला है
फुरसत नहीं है किसी को
जब जरा सा भी कहीं
देखने कोई किसी और का
कैलेंडर फिर क्यों कहीं
को जाने वाला है
अपनी तारीख भी तो
उसी दिन की होती है
जिस दिन का वो एक
कैलेंडर ला कर यहां
लटकाने वाला है
मुझे है मतलब पर
बस उसी से है जो
मेरे कैलेंडर की तारीख
देख कर अपना दिन
शुरु करने वाला है |

शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

आदत अगर हो खराब तो हो ही जाती है बकवास

मैने तो सोचा था
आज तू नहीं आयेगा
थक गया होगा
आराम करने को
कहीं दूर चला जायेगा
चार सौ पन्ने
भर तो चुका है
अपनी बकवासों से
कुछ रह नहीं गया
होगा बकाया तेरे पास
शायद तुझसे अब कुछ
नया नहीं कहा जायेगा
ऎसा कहाँ हो पाता है
जब कोई कुछ भी
कभी भी कहीं भी
लिखना शुरु जाता है
कहीं ना कहीं से
कुछ ना कुछ
खोद के लिखने के
लिये ले आता है
अब इतना बड़ा देश है
तरह तरह की भाषाऎं
हैं और हैं बोलियाँ
हर गली मोहल्ले के
अपने तीज त्योहार
हर गाँव हर शहर की
अपनी अपनी होती हैं
रंगबिरंगी टोलियाँ
कोई देश की बात को
बडे़ अखबार तक
पहुँचा ले जाता है
सारे अखबारों का
मुख्य पृष्ठ उस दिन
उसी खबर से
पट जाता है
पता कहाँ कोई
कर पाता है कि
खबर वाकई में
कोई एक सही ले
कर यहाँ आता है
सुना जाता है
इधर के सबसे
बडे़ नेता को कोई
बंदर कह जाता है
बंदर की टीम का
कोई एक सिकंदर
खुंदक में किसी
को फंसाने के लिये
सुंदर सा प्लाट
बना ले जाता है
उधर का बड़ा नेता
बंदर बंदर सुन कर
डमरू बजाना
शुरु हो जाता है
साक्षात शिव का 
रुप हो जाता है
तांडव करना
शुरु हो जाता है
अब ये तो बडे़
मंच की बड़ी बड़ी
रामलीलाऎं होती है
हम जैसे कूप मंडूकों
से इस लेवल तक
कहाँ पहुँचा जाता है
हमारी नजर तो
बडे़ लोगों के
छोटे छोटे चाहने
वालों तक ही
पहुंच पाती है
उनकी हरकतों को
देख कर ही हमारी
इच्छाऎं सब हरी
हो जाती हैं
किसी का लंगोट
किसी की टोपी के
धूप में सूखते सूखते
हो गये दर्शन की सोच
ही हमें मोक्ष दिलाने
के लिये काफी
हो जाती हैं
सबको पता है
ये छोटी छोटी
नालियाँ ही मिलकर
एक बड़ा नाला
और बडे़ बडे़
नाले मिलकर ही
देश को डुबोने
के लिये गड्ढा
तैय्यार करवाती हैं
कीचड़ भरे इन्ही
गड्ढों के ऊपर
फहरा रहे झकाझक
झंडों पर ही लेकिन
सबकी नजर जाकर
टिक जाती है
सपने बडे़ हो जाते हैं
कुछ सो जाते हैं
कुछ खो जाते हैं
झंडे इधर से
उधर हो जाते हैं
नालियाँ उसी जगह
बहती रह जाती हैं
उसमें सोये हुऎ
मच्छर मक्खी
फिर से भिनभिनाना
शुरु हो जाते हैं
ऎसे में जो
सो नहीं पाते
जो खो नहीं जाते
वो भी क्या करें
अपनी अपनी
बकवासों को लेकर
लिखना पढ़ना
शुरु हो जाते हैं ।

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...