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गुरुवार, 8 अगस्त 2013

पता है तुम टीम बनाने वालों में आते हो देश प्रेमियों में भी पहले गिने जाते हो

अब जब वो कहता है
देश प्रेम फैल रहा है
कुर्बान देश पर होने
के लिये हर कोई
अपने अंदर ही अंदर
भड़की हुई आग में
बुरी तरह जल रहा है
इधर मुझे ही फुर्सत
नहीं है अपने कुऎं में
बैठ कर टर्राने से
मेरी तरह और भी
हैं कुछ मेंढक जो
टर्राते टर्राते हो
चुके हैं दीवाने से
अब कैसे कह दूँ
मुझे देश से
प्रेम नहीं है
थोडी़ बहुत लूट
खसोट बेईमानी
अपने इलाके में
कर ले जाने से
कोई देश का
दुश्मन जो क्या
हो जाता है
जब भी कभी देश
की बात पर जुलूस
निकाला जाता है
हर कोई उस
जुलूस में आगे
आगे दिखाई तो
देना चाहता है
इससे अधिक देश
उससे और
क्या चाहता है
वैसे भी देश के
लिये काम करना
अकेले कहाँ
हो पाता है
टीम वर्क हो
तो सब कुछ ही
बहुत आसानी से
हो जाता है
बस केवल सीमा
पर कोई गोली
नहीं खाना चाहता है
इसलिये वहाँ के लिये
टीम बनाने की इच्छा
कोई नहीं दिखाता है
कहता है देश का
सवाल है इसलिये
ऎसा काम हमेशा
सामने वाले को ही
दिया जाता है
बाकी टीम में कोई
कहीं रखा जाये
इस बात का
देश प्रेम से
कहाँ कोई नाता है
इसीलिये हर सरदार
अपनी टीम अपने
हिसाब से बनाता है
काम किसी को
कुछ आता हो
उससे क्या कुछ
कहीं हो जाता है
ज्यादा काम समझने
वाला वैसे भी
टीम के सरदार के
लिये एक सरदर्द
हो जाता है
देश का झंडा बस
होना चाहिये कुछ
मजबूत से हाथो में
उसके नीचे कौन
क्या कर रहा है
उससे कहाँ कौन सा
फर्क पड़ जाता है
इतना क्या कम
नहीं होता है कि
जब सीमा पर
कोई देश प्रेमी
मारा जाता है
देश का देश प्रेमी
उसके देश प्रेम से
भावुक हो जाता है
उसकी फोटो में
फूल माला भी
तो चढा़ता है
अब छोटी मोटी
चोरियां अगर हो
भी जाती हैं
किसी से अपने
आस पास कहीं
इससे देश प्रेम क्या
कम हो जाता है
होता होगा हो
ही रहा होगा
मेरे देश में देश
प्रेम जागरण
मुझे तो अपने
कुएं में टर्राने
में बहुत ही
मजा आता है ।

बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

मुख्य पृष्ठ का मुख्य समाचार हल्द्वानी शहर में घुसा तेंदुआ कह रहा है आज हर अखबार

अखबारों ने सारे
आज मुख्य पृष्ठ पर
जंगल का तेंदुआ
शहर के बीच
में घुसा हुआ
एक दिखाया
जंगल के ठेकेदारों
को बुलवा कर
पिंजरे में उस
बेचारे को
जबरदस्ती कर
फिर फंसवाया
लिखा था
फिर से जंगल में
लेजाकर
छोड़ दिया जायेगा
बहुत सारे
तेंदुओं से
मिल लिया है
यहाँ आकर
दुबारा से
हिम्मत करके भी
यहाँ कभी ही
शायद आयेगा
उसे कहाँ पता था
जंगल के तेंदुऎ
धोखेबाजी करके
यहाँ रोज ही
फसाये जाते हैं
शहर में भी
तो हैं तेंदुऎ
जो रोज अखबार
में दिखाये जाते हैं
पर तेंदुऎं है
करके कभी
बताये तक
नहीं जाते हैं
पिंजरे उनके लिये
कहीं भी कभी भी
नहीं लगाये जाते हैं
शिकार घेर घेर कर
उनके लिये ले जाये
जरूर जाते हैं
कुछ बेवकूफ खुद
बा खुद उनकी
माँद में जा कर
घुस जाते हैं
शिकार हो जाते हैं
और मुस्कुराते हैं
कुछ इलाके
कुछ तेंदुओं
के लिये
छोड़ दिये
जाते हैं
एक इलाके
के तेंदुऎ
दूसरे के इलाके
की तरफ आँख
भी नहीं उठाते हैं
सारे तेंदुऎ
नोचते हैं
भरे हुए पेटों से
जो कुछ भी
नोच पाते हैं
खुले आम
शहर के बीच
सड़क
चलती जनता
को भी वो
जरूर ही
नजर आते हैं
नोच खसोट करते
हुऎ ये सारे तेंदुऎ
अखबार में भी
दिखाये जाते हैं
पर ये भी तेंदुऎ हैं
करके कभी भी
किसी को बताये
तक नहीं जाते हैं ।

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