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शनिवार, 24 जनवरी 2015

आदमी होने से अच्छा आदमी दिखने के जमाने हो गये हैं

आदमी होने
का वहम हुऐ
एक या दो
दिन हुऐ हों
ऐसा भी नहीं है
ये बात हुऐ तो
एक दो नहीं
कई कई
जमाने
हो गये हैं
पता मुझको
ही है ऐसा
भी नहीं है
पता उसको
भी है वो बस
कहता नहीं है
आदमी होने के
अब फायदे
कुछ भी नहीं
रह गये हैं
आदमी दिखने
के बहुत ज्यादा
नंबर हो गये हैं
दिखने से आदमी
दिखने में ही
अब भलाई है
आदमी दिखने
वाले आदमी
अब ज्यादा ही
हो गये है
आम कौन है
और खास
कौन है आदमी
हर किसी के
सारे खास
आदमी आम
आदमी हो गये हैं
हर कोई आदमी
की बात करने
में डूबा हुआ है
आज बहुत
गहराई से
आदमी था
ही नहीं कहीं
बस वहम था
एक जमाने से
इस वहम को
पालते पालते
हुऐ ही कई
जमाने हो गये हैं ।

चित्र साभार: www.picthepix.com

सोमवार, 23 दिसंबर 2013

आम में खास खास में आम समझ में नहीं आ पा रहा है

आज का नुस्खा
दिमाग में आम
को घुमा रहा है
आम की सोचना
शुरु करते ही
खास सामने से
आता हुआ नजर
आ जा रहा है
कल जब से
शहर वालों को
खबर मिली कि
आम आज जमघट
बस आमों में आम
का लगा रहा है
आम के कुछ खासों
को बोलने समझाने
दिखाने का एक मंच
दिया जा रहा है
खासों के खासों का
जमघट भी जगह
जगह दिख जा रहा है
जोर से बोलता हुआ
खासों का एक खास
आम को देखते ही
फुसफुसाना शुरु
हो जा रहा है
आम के खासों में
खासों का आम भी
नजर आ रहा है
टोपी सफेद कुर्ता सफेद
पायजामा सफेद झंडा
तिरंगा हाथ में एक
नजर आ रहा है
वंदे भी है मातरम भी है
अंतर बस टोपी में
लिखे हुऐ से ही
हो जा रहा है
“उलूक” तो बस
इतना पता करना
चाह रहा है
खास कभी भी
नहीं हो पाया जो
उसे क्या आम में
अब गिना जा रहा है ।

गुरुवार, 15 अगस्त 2013

सर्वगुण संपन्न की मोहर लगवा कोई नहीं देखेगा हरा है या भगवा

क्रिकेट हो 
फुटबाल हो
बैडमिंटन हो
या किसी
और तरीके
का खेल हो
साँस्कृतिक
कार्यक्रमों
की पेलम
पेल हो
टीका हो
या चंदन हो
नेता जी का
अभिनन्दन हो
सभी जगह पर
'सर्वगुण संपन्न'
की मोहर माथे
पर लगे हुओं
को ही मौका
दिया जाता है
आता है या
नहीं आता है
ये सोचा ही
नहीं जाता है  
ये मोहर भी
कोई विश्वासपात्र
ही बना पाता है
कुछ खास
जगहों पर
खास चेहरों के
सिर पर
ही सेहरा
बाँधा जाता है
खासियत की
परिभाषा में
जाति धर्म
राजनीतिक कर्म
तक कहीं टांग नहीं
अपनी अढा़ता है
सामने वाला कुछ
कर पाता है या
नहीं कर पाता है
ये सवाल तो
उसी समय गौंण
हो जाता है
जिस समय से
किसी को
बेवकूफों की श्रेणी
में डालकर सीलबंद
हमेशा के लिये
करने का ठान
लिया जाता है
यही सबको
बताया
भी जाता है
इसी बात को
फैलाया भी
जाता है
पूरी तरह से
मैदान से
किसी का
डब्बा गोल
करने का
जब सोच ही
लिया जाता है
क्या करें ये सब
मजबूरी में ही
किया जाता है
एक जवान होते हुऎ
शेर को देखकर ही
तो जंगल के सारे
कमजोर कुत्तो से
एक हुआ जाता है
बेवकूफ की मोहर
लगा वही शख्स
रक्तदान के कार्यक्रम
की जिम्मेदारी
जरूर पा जाता है
सबसे पहले अपना
रक्त देने से भी
नहीं कतराता है
समझदारों में से
एक समझदार
उसी रक्त का मूल्य
अपनी जेब में
रखकर कहीं पीछे
के दरवाजे से
निकल जाता है
सफलता के ये
सारे पाठों को
जो आत्मसात नहीं
कर पाता है
भगवान भी उसके
लिये कुछ नहीं
कर पाता है ।

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