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सोमवार, 27 अप्रैल 2015

बचपन का खिलौना भी कभी बड़ा और जवान होता है एक खिलाड़ी जानता है इस बात को उसे पता होता है

जब तक पहचान
नहीं पाता है
खिलौनों को
खेल लेता है किसी
के भी खिलौने से
किसी के भी साथ
कहीं भी किसी
भी समय
समय के साथ ही
आने शुरु होते हैं
समझ में खिलौने
और खेल भी
खेलना खेल को
खिलौने के साथ
होना शुरु होता है
तब आनंददायक
और भी
कौन चाहता है
खेलना वही खेल
उसी खिलौने से
पर किसी और के
ना खेल ही
चाहता है बदलना
ना खिलौना ही
ना ही नियम
खेल के
इमानदारी
के साथ ही
पर खेल
होना होता है
उसके ही
खिलौने से
खेलना होता
है खेल को
उसके साथ ही
तब खेल खेलने
में उसे कोई
एतराज नहीं
होता है
खेल होता
चला जाता है
उस समय तक
जब तक खेल में
खिलौना होता है
और उसी का होता है ।

चित्र साभार: johancaneel.blogspot.com

शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

खिलौना सोच

कुछ लोग बडे़
तो हो जाते हैं
पर खिलौनों से
खेलने के अपने
बचपन के दिन
नहीं भूल पाते हैं
खिलौनों में चाभी
भर कर भालू
को नचाना
बार्बी डौल में
बैटरी डाल कर
बटन दबाना
आँखे मटकाती
गुड़िया देख कर
खुश हो जाना
उनकी सोच से
निकल ही
नहीं पाता है
सामने किसी के
आते ही उनको
अपना बचपन
याद आ जाता है
खिलौना प्रेम पुन:
एक बार और
जागृत हो जाता है
खिलौनों की तरह
करता रहे कोई
उनके आगे या पीछे
कहीं भी कभी भी
तब तक वो
दिखाते हैं ऎसा
जैसे उनको कुछ
मजा नहीं आता है
जरा सा खिलौनापन
को छोड़ कर कोई
अगर कुछ अलग
करना चाहता है
तुरंत उनको समझ
में आ जाता है
अब उनका खिलौना
उनके हाथ से
निकल जाता है
सोच कर कि अब
आगे तो नहीं
कोई उनसे कहीं
बढ़ जाता है
फटाफट वो कुछ
ऎसा काम ढूँढ कर
ले आते है
खिलौने तो क्या
अच्छे भले आदमी
जो नहीं कर पाते है
फिर तो जब
उनका खिलौना
आदमी वाला काम
नहीं कर पाता है
तो वो ऎसा
दिखाते है
जैसा कि
खिलौने तो
उनको बिल्कुल
भी पसंद
नहीं आते हैं ।

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