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शुक्रवार, 8 मई 2015

एक सीधे साधे को किनारे से ही कहीं को निकल लेना होता है

धुरी से खिसकना
एक घूमते
हुऐ लट्टू का
नजर आता है
बहुत साफ
उसके लड़खड़ाना
शुरु करते ही
घूमते घूमते
एक पन्ने पर
लिखी एक इबारत
लट्टू नहीं होती है
ना ही बता सकती है
खिसकना किसी का
उसका अपनी धुरी से
दिशा देने के लिये
किसी को दिशा हीन
होना बहुत
जरूरी होता है
बिना खोये खुद को
कैसे ढूँढ लेना है
बहुत अच्छी तरह से
तभी पता होता है
शब्द अपने आप में
भटके हुऐ नहीं होते हैं
भटकते भटकते ही
इस बात को
समझना होता है
भटक जाता है
मुसाफिर सीधे
रास्ते में
एक दिशा में ही
चलते रहने वाला
सबसे अच्छा
भटकने के लिये
खुद को भटकाने
वालों के भटकाने
के लिये छोड़
देना होता है
लिखा हुआ किसी
का कहीं कोई
लट्टू नहीं होता है
घूमता हुआ भी
लगता है तो भी
उसकी धुरी को
बिल्कुल भी नहीं
देखना होता है
सीधे सीधे एक
सीधी बात को
सीधे रास्ते से
किसी को समझाने
के दिन लद
गये है ‘उलूक’
भटकाने वाली
गहरी तेज बहाव
की बातों की लहरों
को दिखाने वाले
को ही आज के
जमाने को दिशायें
दिखाने के लिये
कहना होता है ।

चित्र साभार: forbarewalls.com

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