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गुरुवार, 23 अक्तूबर 2014

जलते हुऐ दिये को पड़ गये कुछ सोच देख कर बहुत सारी अपने आस पास एक दिन रोशनियाँ

एक किनारे में
खड़ा एक भीड़ के
देखता हुआ
अपनी ही जैसे
एक नहीं कई
प्रतिलिपियाँ
और आस पास ही
उसी क्षण कहीं
खुल रही हों कई
सालों से बंद
पड़ी कुछ
खिड़कियाँ
कुछ कुछ सपने
जैसे ही कुछ
कुछ सामने
से ही उड़ती
हुई रंगबिरंगी
तितलियाँ
रोज तो दिखते
नहीं कभी
इस तरह के
दृश्य सामने से
एक सच की तरह
चिकोटी काट कर
हाथ में ही अपने
खुद के देख
रही थी उंगलिया
इसी तरह खड़ा
सोच में पड़ा
बहुत देर से
समझने के लिये
आखिर क्यों
हूँ यहाँ
किसलिये
किसके लिये
पूछ बैठा यूँ ही
बगल के ही
किसी से
अपने ही जैसे से
मुस्कुराहट
चेहरे पर लिये
बिखरते हुऐ
हँसी जैसे मोती
बिखर रहे हों
कहीं से कहीं
अरे सच में नहीं
जानते क्या
खुद को भी नहीं
पहचानते क्या
हम ही तो दिये हैं
 रोशनी के लिये हैं
आओ चले साथ
साथ एक ही दिन
यूँ ही जलें साथ
साथ एक ही दिन
रोशन करें
सारे जहाँ को
बाँटते चलें
जरूरत की सबको
सबके लिये
कुछ रोशनियाँ
कहाँ खुलती हैं रोज
खुली हैं आज
चारों ही तरफ
कुछ बंद खिड़कियाँ
दिये हैं हम
दिये हो तुम
दिये के खुद के लिये
जरूरी भी नहीं
होती हैं रोशनियाँ ।

चित्र साभार: www.dreamstime.com

बुधवार, 23 जुलाई 2014

क्योंकि खिड़कियाँ मेरे शहर के पुराने मकानों में अब लोग नई लगा रहे थे

अपने बच्चों को
समझाने में लगे हुऐ
एक माँ बाप
उनको उनसे उनकी
दिमाग की खिड़की
खोलने को कहते हुऐ
जोर लगा कर
कुछ समझा रहे थे
लग नहीं रहा था
कुछ ऐसा जैसे
बच्चे कुछ सुनना
भी चाह रहे थे
माँ बाप बच्चों की
तरफ देख कर
कुछ बोल रहे थे
बच्चे अपने घर के
पड़ोस के मकान
की खिड़कियों की
तरफ देख कर
मुस्कुरा रहे थे
खिड़कियों के बारे में
शायद माँ बाप से
ज्यादा पता था उनको
घर से लेकर स्कूल तक
जाते जाते रोज
ना जाने कितनी
खिड़कियों को खुलते
बंद होते देखते
हुऐ आ रहे थे
समझ रहे थे
स्कूल में गुरु लोग
खिड़कियों को
खोलने की विधि का
प्रयोग प्रयोगशाला
में करवाना चाह रहे थे
उसी बात को लेकर
घर के लोग
घर पर भी खिड़कियों
की बात कर कर के
दिमाग खा रहे थे
सोच रहे थे समझ रहे थे
हिसाब किताब भी
थोड़ा बहुत लगा रहे थे
पुराने मकानो की
खिड़कियों की तुलना
नये मकानो की
खिड़कियों से
किये जा रहे थे
माँ बाप की चिंताओं
को जायज मान ले रहे थे
देख रहे थे समझ रहे थे
पुरानी खिड़कियों के
कब्जे जंग खा रहे थे
खुलते जरूर थे
रोज ना भी सही
कभी कभी भी लेकिन
आवाजें तरह तरह की
खुलने बंद होने
पर बना रहे थे
खिड़कियाँ दरवाजे
समय के साथ
पुराने लोगों के
पुराने हो जा रहे थे
शायद इसी लिये
सभी लोग नयी
पौँध से उनकी
अपनी अपनी
खिड़कियों को खोल
कर रखने की अपेक्षा
किये जा रहे थे
‘उलूक’ की समझ में
नहीं आ रहा था कुछ भी
उसे उसके पुराने मकान
के खंडहर में खिड़की या
दरवाजे नजर ही
नहीं आ रहे थे ।

बुधवार, 23 सितंबर 2009

करवट

अचानक
उन टूटी
खिड़कियों
का उतरा
रंग चमकने
लगा

शायद
जिंदगी ने
अंगड़ाई ली

शमशान की
खामोशी नहीं
शहनाईयां
बज रही हैं
आज

फिर से
आबाद
होने
को है
उसका
घरौंदा

कल तक
रोटी कपडे़
के लिये
मोहताज
हाथों में
दिखने
लगी हैं
चमकती
चूड़ियां

जुल्फें
संवरी हुवी
होंठो पे
लाली भी है

लेकिन
कहीं ना
कहीं
कुछ
छूटा
हुवा
सा
लगता है

चेहरे पे
जो नूर था
रंगत थी
आंखों में

आज वो
उतरा हुवा सा
ना जाने
क्यों लगता है

बच्चों के
चीखने
की आवाज
अब नहीं आती

बूड़े माँ बाप
के चेहरों पे
खामोशी सी
छाई है

शायद किसी
आधीं ने उड़ा
दिया सब कुछ

अपनी जगह पर
ही है हर
एक चीज
हमेशा की तरह

पर कुछ तो
हुआ है
ना जाने

जो महसूस तो
होता है
पर दिखता नहीं है 

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