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शनिवार, 10 अगस्त 2013

जिन्दगी भी एक प्रतिध्वनी है

जैसे ही निकला
उनके 
मुँह से
कि जिन्दगी 

एक प्रतिध्वनी है
फिर पूछ बैठे
क्या हुआ

इसका अर्थ
समझाओगे

मेरे दिमाग
कि खुराफात

ने कहा
अभी कुछ नहीं

बताता हूँ
आज शाम को

लिखा हुआ
इसी पर आप

कुछ ना
कुछ पाओगे

अब फलसफा है
तो बहुत
ही जानदार

कहा जा
सकता है

कि इसमें तो है
पूरी जिन्दगी के
सारे उतार चड़ाव
उनके हिसाब से
जिन्दगी एक
प्रतिध्वनी है
का मतलब
होता हो शायद
जो लौट के फिर
कभी ना कभी
एक बार जरूर
वापस आता है
टकरा टकरा कर
हर लम्हा जिंदगी
का फिर दुबारा
कहीं ना कहीं
खुद से खुद को
इस तरह मिलाता है
अपने को भूले हुऎ
को क्षण भर को
ही सही कुछ
अपने बारे में
कुछ कुछ याद
सा आ जाता है
नहीं तो सुबह शुरु
हुई जिंदगी को
संवारने में सारा
दिन कोई भी
गुजार ले जाता है
और शाम होते होते
ही पता चलने लग
जाता है कि इस
पूरी कोशिश में
फिर से कोई
कौना जिंदगी का
फटी हूई पैजामे
से निकले घुटनो
की तरह से कहीं
एक नई जगह से
मुँह अपना निकाल
ले जाता है
फिर चिढा़ता है
अब उनके जिंदगी
के इस पहलू पर
जब तक मैं
कुछ सोच भी पाता
क्या किया जाये
मजबूरी है
सोच की भी

कि कौन
सा खयाल

किस की
सोच में आता है

मुझे खुद में वो
बिलाव नजर
आता है
जो
चूहे को सामने से

कुतरते हुऎ
कतरा कतरा

जिंदगी अपने
आप को

बेबस सा
पाता है

पर कर कुछ
नहीं सकता

सिवाय अपने
पंजे के
नाखूनो
को एक खम्बे

को नोच नोच
कर 
घायल
कर जाता है

फिर उसी
रात को

सपने में
उस चूहे
को
अपने
पंजो में दबा

हुआ तड़पता
पाता है

इसी तरह कुछ
गुजर जाती
है 
जिन्दगी 
रोज रोज
के रोज ही
जिन्दगी एक
प्रतिध्वनी है

का मतलब
शायद इन

सपनो का होना
ही हो जाता है
जो पूरे नहीं
कभी हो पाते हैं
लेकिन लौट के
आना 
जिन्दगी 
में एक बार फिर
से उनका बहुत
जरूरी हो जाता है ।

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