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शनिवार, 1 नवंबर 2014

अपनी मूर्खता पर भी होता है फख्र कभी जब कहीं कुछ इस तरह का लिखा हुआ मिलता है

बहुत अच्छा लगा
कुछ सुकून सा मिला
वैचारिक रूप से मूर्ख
और वैचारिक रूप
से दिवालिया
किसी ने जब
किसी के लिये
कहीं पर प्रयोग किया
कुछ बातें कहीं से
शुरु होती हैं
किसी बात को लेकर
और फिर
बातों बातों में ही
बात का अपहरण
कर ले जाती हैं
ये एक बहुत बड़ी
कलाकारी होती है
सबकी समझ
में नहीं आती है
और जो
समझ लेता है
खुद अपनी ही
सोच के जाल
में फंसता है
आज के दिन
अपने ही आसपास
टटोल कर तो देखिये
फटी हुई जेब
की तरह
ज्यादातर का
दिमाग चलता है
सारी सोच
फटे छेदों से
निकल कर
गिर चुकी होती है
चलते चलते
और जो
निकलता है कुछ
वो कुछ भी नहीं
से निकलता है
पता नहीं ये कोई
पुरानी खानदानी
बीमारी के
लक्षण होते हैं
या किसी जमाने
में आते पहुँचते
हर रास्ता
इसी तरह संकरा
और झाड़ झंकार
से भरा भरा सा
हो निकलता है
आदत हो जाती है
आने जाने वाले को
कोई कांटा सिर पर
तो कोई पैर के नीचे से
अपने अपने हिस्से का
माँस नोच निकलता है
खून निकलने की
परवाह किसी को
भी नहीं होती है
हर किसी को
किसी और का खून
निकलता देख कर
बहुत चैन मिलता है
कहना किसी को
कुछ नहीं होता है
हर मूर्ख के विचार में
दिवालियापन
होता ही है जो
इफरात से झलकता है
‘उलूक’ वैचारिक
रूप से मूर्ख और
वैचारिक रूप से
दिवालिया हो चुका
तू ही अकेला
शायद अपनी सोच की
इस तारीफ को
लिखा हुआ कहीं पर
पढ़ कर खुश होता हुआ
सीटी बजाता
दूसरी ओर को कहीं
दौड़ निकलता है ।

चित्र साभार: imgarcade.com

शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

इस देश में जो शरमाता है वही बेशरम कहलायेगा

पता था ईमानदार
बनकर सरकार
नहीं चला पायेगा
भ्रष्टाचार से चलते
हों जहाँ घर तक
उस देश में कैसे
तुझे ज्यादा दिन
तक मौज मनाने
का आसान मौका
दे दिया जायेगा
अच्छा किया जो
इस्तीफा दे दिया
अब सारे ईमानदारी
के ठेकेदारों के
नाम से दुबारा
टेंडर खुलवाया जायेगा
आम आदमी की टोपी
और आम आदमी का
गाना गा कर आंखिर
कितनी दूर तक
कोई चल पायेगा
बहुत अच्छा किया
जो भी किया
चल सड़क पर आजा
फिर से कुछ नये
क्राँतिकारी गीत सुनायेगा
मीडिया फिर से
टी आर पी के जुगाड़
के लिये तेरी कुछ
नई कहाँनियाँ कुछ
नये नाटक बनायेगा
इस देश में बस
वही टिक पायेगा
जो मुँह में राम
बगल में छुरी दबायेगा
हर मौहल्ले में
जिस देश की
होती है पुराने
चोरों की बहुत
सी गलियाँ
वहाँ किसी भी
नये प्रयोग करने
वाले को इसी तरह
लात मार मार कर
भगा दिया जायेगा
उसके बाद भगाने
वालों का जत्था ही
लगा कर राम और
रहीम के मुखौटे
बेवकूफ जनता को
ईमानदारी से वोट
देने के लिये उकसायेगा
अच्छा किया तूने
बहुत अच्छा किया
पर क्या तू फिर से
गधे की सवारी करने
के लिये दुबारा
गधों के दरबार में
कभी और किसी
दिन हाजिरी लगायेगा
हो सकता है
कुछ तरस खा कर
अगली बार गधा
तुझे हल्की दुलत्ती
लगा कर ही
खुश हो जायेगा
कर फिर कुछ कर
हमारे पास भी
कोई काम
धाम नहीं है
फिर से कुछ
बकवास करने
का एक मौका
हमारे हाथ में
तब भी आ जायेगा ।

रविवार, 10 नवंबर 2013

सोच तो होती ही है सोच

अपनी अपनी
होती है सोच

सुबह होते
अंगडाई सी
लेती है सोच

सुबह की
चाय के कप
से निकलती
भाप होती
है सोच

दूध की
दुकान की
लाईन में
हो रही
भगदड़
से उलझ रही
होती है सोच

दैनिक
समाचार
पत्रों के प्रिय
हनुमानों की
हनुमान
चालीसा
पढ़ रही
होती
है सोच

काम पर
जाने के
उतावले पन
में कहीं
खो रही
होती है सोच

दिन
होते होते
पता नहीं क्यों
बावली हो रही
होती है सोच

कहां कहां
भटक रही
होती है
बताने
की बात
जैसी नहीं हो
रही होती है सोच

शाम
होते होते
जैसे कहीं
कुछ खुश
कहीं
कुछ उदास
कहीं
कुछ थकी
कहीं
कुछ निराश
हो रही
होती है सोच

जब घर
को वापस सी
लौट रही
होती है सोच

रात
होते होते
ये भी होता है
जैसे किसी की
किसी से
घबरा रही
होती है सोच

कौन
बताता है
अगर बौरा रही
होती है सोच

सुकून
का पल
बस वही होता है

जब यूं ही
उंघते उंघते
सो जा रही
होती है सोच

पता किसे
कहाँ होता है
सपनों में क्या
आज की रात
दिखा रही है सोच

मुझे
अपनी समझ
में कभी भी
नहीं आती

क्या
तुझे समझ
में कुछ आ
रही है सोच ।

मंगलवार, 24 सितंबर 2013

मर गयी बीमार नहीं थी बहुत खुश हो गयी थी

एक लड़की
हमेशा बहुत
खुश दिखती थी
शादी के सोलह
साल बाद
उम्मीद होने
से उसकी
खुशी दुगुनी
हो गयी थी
इंतजार की
घड़ियां कुछ
लम्बी जरूर
हो गयी थी
मगर होते
होते बहुत
छोटी हो
गयी थी
दो दिन
पहले
ही उससे
राह चलते
मुलाकात
भी हो
गई थी
कल हुई
थी सर्जरी
जो आजकल
के जमाने में
आम बात
हो गयी थी
बेटा हुआ
था और
खुशी की
बरसात
हो गयी थी
बस एक दिन
के बाद की
खबर आम
हो गई थी
खुशी खुशी
वो इस दुनिया
से ही विदा
हो गई थी
डाक्टर ने
बताया
इतना खुश
हो गई थी
कि हमेशा
के लिये ही
सो गई थी
पहली बार
ही ऐसी बात
कुछ सुनी थी
मेरे लिये नयी
बस नयी सी थी
बीमारी से नहीं
खुशी से
हो गई थी
एक खुश
मिजाज लड़की
इतना खुश
हो गयी थी
मौत के साथ
खुशी खुशी
विदा हो गयी थी ।

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