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शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

आओ खेलें झूठ सच खेलना भी कोई खेलना है

प्रतियोगिता
झूठ
बोलने
की ही
हो रही है

हर
तरफ
आज
के दिन
पूरे
देश में

किसी
एक झूठे
के
बड़े झूठ
ने ही
जीतना है

झूठों में
सबसे
बड़े झूठे
को
मिलना
है ईनाम
किसी
नामी
बेनामी
झूठे
ने ही
खुश
हो कर
अन्त में
उछलना है
कूदना है

झूठे ने
ही
देना
है 
झूठे
को 
 
सम्मान

सारे झूठे
नियम बन
चुके हैं
झूठे
सब कुछ
झूठ पर
पारित कर
चुके हैं
झूठों की
सभा में

उस पर
जो भी
बोलना है
जहाँ
बोलना है
किसी झूठे
को ही
बोलना है

सामने से
होता हुआ
नजर आ
रहा है जो
कुछ भी
कहीं पर भी
वो सब
बिल्कुल भी
नहीं देखना है
उस पर
कुछ भी नहीं
कुछ बोलना है

झूठ देखने
से नहीं
दिखता है
इसलिये
किसलिये
आँख को
अपनी
किसी
ने क्यों
खोलना है

झूठ के
खेल को
पूरा होने
तक
खेलना है

झूठ ने ही
बस स्वतंत्र
रहना है

झूठ पकड़ने
वालों पर
रखनी हैं
निगाहें

हरकत
करने से
पहले उनको
पकड़ पकड़
उसी समय
झूठों ने
साथ
मिलकर
पेलना है

जिसे
खेलना है
झूठ
उसे ही
झूठ के
खेल पर
करनी है
टीका टिप्पणी
झूठों के
झूठ को
झूठ ने ही
झेलना है

‘उलूक’
तेरे पेट में
होती ही
रहती है
मरोड़
कभी भरे
होने से
कभी
खाली
होने से

लगा क्यों
नहीं लेता
है दाँव
ईनाम
लेने के लिये
झूठ मूठ
में ही
कह कर
बस कि
पूरा कर
दिया तूने
भी कोटा
झूठ
बोलने का

हमेशा सच
बोलना भी
कोई बोलना है ।

चित्र साभार: www.clipartkid.com

बुधवार, 13 अप्रैल 2016

दूर कहीं जा अपने घर से जिसके भी घर जितना चाहे खेल कबड्डी

कौन देख रहा
किस ब्रांड की
किसकी चड्डी
रहने दे खुश रह
दूर कहीं अपने
घर से जाकर
जितना मन चाहे
खेल कबड कबड्डी
अपने घर की
रेलमपेल
खेलने वाले
तेरे ही अपने
उनके खेल
तेरे ही खेल
मत बन
अपने ही
घर के
अपनों के
कबाब की
खुद ही तू हड्डी
दूर कहीं अपने
घर से जाकर
जितना मन चाहे
खेल कबड कबड्डी
खबर छाप
फोटो खींच
दिखा दूर
कहीं जंगल में
जहरीला सांप
घर में बैठा
एक नहीं
हर कोई
लागे जब
अपना ही
मुहँबोला बाप
बातें सुन
घर की घर में
बड्डी बड्डी
मत कर
ताँक झाँक
रहने दे
झपट्टा झपट्टी
मालूम होता
है खुद का
खुद को
सब कुछ
कहाँ से
कितनी
अंदर की
कहाँ से
कहाँ तक
फटी हुई है
अपनी खुद
की ही चड्डी
दूर कहीं अपने घर से
जाकर जितना मन चाहे
खेल कबड कबड्डी
लेकर हड्डी
दूर निकल
कर बहुत
दूर से
नहीं नजर
पड़े जहाँ से
अपने घर की
शराब की भड्डी
इसके उसके
सबके घर में
जा जा कर
झंडे लहराकर
सबको समझा
इसके उसके
घर की
फड्डा फड्डी
दूर कहीं अपने घर से
जाकर जितना मन चाहे
खेल कबड कबड्डी ।

चित्र साभार: www.vidhyalya.in

मंगलवार, 15 मार्च 2016

जमूरे सारे कुछ जमूरों को छोड़ कर मदारी के इशारे पर मदारी मदारी खेलने निकल कर चले

कुछ जमूरे मिलें
शागिर्दी के लिये

तमन्ना है जिंदगी
में एक बार
बस
एक ही बार

मदारी होने का
ज्यादा नहीं
एक ही मिले
मौका तो मिले

जमूरा बना रह
जाये कोई
ताजिंदगी
निकलते चलें
इधर से भी
और
उधर से भी

कब कौन
बन जाये
मदारी
सामने सामने
कैसे किस
तरीके से
कभी तो
ये राज
थोड़ा सा
ही सही
कुछ तो खुले

नहीं दिखा
एक भी
मदारी
सोचता
हुआ सा
भी कभी

उसका
कोई जमूरा
उसके बराबर
आ कर
खड़ा हो कर
उसके जैसा
ही नहीं
कभी भी कुछ
छोटा मोटा
सा भी
मदारी की
तरह का कहीं
गलती से भी
कभी कहीं
जा कर बने

मदारी हों
जमूरे हों
जमूरे मदारी
के ही हो
मदारी जमूरों
के ही हो
दोनो ही रहें

एक दूजे
के लिये
ही बने
होते हैं
दोनो ही रहें
दोनों ही बनें
एक दूसरे
के साथ
रह कर
चलायें
सरकस
कहीं का
भी हो

सरकस चलें
चलते रहें
बिना मदारी का
हो जाये ‘उलूक’
जैसा जमूरा
ना बन पाये
मदारी भी कभी

खबर
जब मिले

जमूरे कुछ
जमूरों को
छोड़ सारे
जमूरों के
साथ मिल
मदारी के लिये

एक बार
फिर
मिल जुल
कर सभी
कुछ सुना है
बहुत कुछ
करने को
हाथ में
लेकर हाथ
ये चले
और
वो चले ।

चित्र साभार: www.garylellis.org

मंगलवार, 27 अक्तूबर 2015

आ जाओ अलीबाबा फिर एक बार खेलने के लिये चोर चोर

रोज जब चोरों से
सामना होता है
अलीबाबा तुम
बहुत याद आते हो
सारे चोर खुश
नजर आते हैं
जब भी चोर चोर
खेल रहे होते हैं
और जोर जोर से
चोर चोर चिल्लाते हैं
चोर अब चालीस
ही नहीं होते हैं
मरजीना अब
नाचती भी नहीं है
अशर्फियाँ तोलने
के तराजू और
अशर्फियाँ भी
अब नहीं होते हैं
खुल जा सिमसिम
अभी भी कह रहे हैं
लोग खड़े हैं चट्टानों
के सामने से
इंतजार में खुलने के
किसी दरवाजे के
अलीबाबा बस एक
तुम हो कि दिखाई
ही नहीं देते हो
आ भी जाओ
इससे पहले हर कोई
निशान लगाने लगे
दरवाजे दरवाजे
इस देश में और
पैदा होना शुरु हों
गलतफहमियाँ
लुटने शुरु हों
घर घर में ही
घर घर के लोग
डर अंदर के फैलने
लगें बाहर की तरफ
मिट्टी घास और पेड़
पानी बादल और
काले सफेद धुऐं में भी
रहम करो ले आओ
कुछ ऐसा जो ले पाये
जगह खुल जा
सिमसिम की
और पिघलना शुरु
हो जायें चट्टाने
बहने लगे वो सब
जो मिटा दे सारे
निशान और पहचान
सारी कायनात
एक हो जाये और
समा जाये सब कुछ
कुछ कुछ ही में
आ भी जाओ
अलीबाबा
इस से पहले की
देर हो जाये और
‘उलूक’ को नींद
आ जाये एक नये
सूरज उगने के समय ।

चित्र साभार: www.bpiindia.com

सोमवार, 8 जून 2015

परेशानी तब होती है जब बंदर मदारी मदारी खेलना शुरु हो जाता है

मदारी को इतना
मजा आता है
जैसे एक पूरी
बोतल का नशा
हो जाता है
जब वो अपने
बंदर को सामने
वाले के सिर पर
चढ़ कर
जनता के बीच में
उसकी टोपी
उतरवाना सिखाता है
बालों पर लटक
कर नीचे उतरना
कंधे पर चढ़ कर
कानों में खों खों करना
देखते ही मदारी के
चेहरे की रंगत में
रंग आ जाता है
जब पाला पोसा हुआ
बंदर खीसें निपोरते हुऐ
गंजे के सिर में
तबला बजाता है
मदारी खुद सीखता
भी है सिखाना
अपने ही आसपास से
सब कुछ देख देख कर
बड़े मदारी की हरकतों को
कैसे बंदरों के कंधों में
हाथ रख रख कर
अपने लिये बड़ा मदारी
बंदरों से अपने सारे
काम निकलवाता है
काम निकलते ही
बंदरों को भगाने के लिये
दूसरे पाले हुऐ बंदरों से
हाँका लगवाता है
सब से ज्यादा मजा तो
आइंस्टाइन को आता है
सामने के चौखट पर
खड़े होकर जब वो खुद
एक प्रेक्षक बन जाता है
'जय हो सापेक्षता के
सिद्धाँत की' उस समय
अनायास ही जबान से
निकल जाता है जब
एक मदारी के सर पर ही
उसका सिखाया पाल पोसा
चढ़ाया हुआ बंदर
उसके ही बाल नोचता
नजर आता है ।



चित्र साभार: jebrail.blogfa.com

सोमवार, 27 अप्रैल 2015

बचपन का खिलौना भी कभी बड़ा और जवान होता है एक खिलाड़ी जानता है इस बात को उसे पता होता है

जब तक पहचान
नहीं पाता है
खिलौनों को
खेल लेता है किसी
के भी खिलौने से
किसी के भी साथ
कहीं भी किसी
भी समय
समय के साथ ही
आने शुरु होते हैं
समझ में खिलौने
और खेल भी
खेलना खेल को
खिलौने के साथ
होना शुरु होता है
तब आनंददायक
और भी
कौन चाहता है
खेलना वही खेल
उसी खिलौने से
पर किसी और के
ना खेल ही
चाहता है बदलना
ना खिलौना ही
ना ही नियम
खेल के
इमानदारी
के साथ ही
पर खेल
होना होता है
उसके ही
खिलौने से
खेलना होता
है खेल को
उसके साथ ही
तब खेल खेलने
में उसे कोई
एतराज नहीं
होता है
खेल होता
चला जाता है
उस समय तक
जब तक खेल में
खिलौना होता है
और उसी का होता है ।

चित्र साभार: johancaneel.blogspot.com

सोमवार, 3 मार्च 2014

आदमी खेलता है आदमी आदमी आदमी के साथ मिलकर

हाड़ माँस और
लाल रक्त
आदमी का जैसा
ही होता है आदमी
कोशिश करता है
घेरने की एक
आदमी को ही
मिलकर एक
आदमी के साथ
आखेट करने वाले
के निशाने पर
होता है उस
समय भी
एक आदमी
बहुत सी मौतें
स्वाभाविक
होती हैं जिनमें
आदमी की
मृत्यू होती है
मरने वाला भी
आदमी होता है
मारने वाला भी
आदमी होता है
मर जाना यानि
मुक्त हो जाना
मोक्ष पा जाना
छुटकारा मिल जाना
आदमी को एक
आदमी से ही
इतना आसान
नहीं होता है
जितना कहने
सुनने और लिखने
में लगता है
आदमी का सबसे
प्रिय खेल भी
यही होता है
जंगल के शेर
के शिकार में
वो नशा कभी
नहीं होता है
जैसा आदमी के
शिकार में आदमी
के साथ मिलकर
एक आदमी ही
आदमी को घेरेते
चले जाता है
आदमी को भी
पता होता है
घेरेने वाला भी
अपना ही होता है
धागे भी बहुत
पक्के होते हैं
जाल कसता
चला जाता है
आदमी बस
कसमसाता है
पकड़ मजबूत
होते चली जाती है
आदमी के पंजे में
एक आदमी
आ जाता है
मरता कहीं भी
कोई नहीं है
पकड़ने वाला
मारना ही
नहीं चाहता है
फाँसी देने से
बेहतर उम्र कैद
को माना जाता है
क्या क्या नहीं
करता है आदमी
आदमी के साथ
बस बचा हुआ
कुछ है तो
आदमी की नींद
का एक सपना
जो उसका अपना
कहलाता है
आदमी का मकसद
होता है जिसे
अपनी मुट्ठी
में करना
बस यहीं पर
आदमी आदमी
से मात
खा जाता है
आदमी आदमी
के साथ मिलकर
आदमी को
कभी मोक्ष
नहीं दे पाता है ।

मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

उलूक एक बस्ती उजाड़ने में बता तेरा क्या रोल होता है

परिपक्व यानी
पका हुआ फल
सुना है मीठा
बहुत होता है
सुनी सुनाई नहीं
परखी हुई बात है
हमेशा तो नहीं
पर कई बार
अपने लिये निर्णयों
पर ही शक बहुत
होने लगता है
मेरा निर्णय
उसका निर्णय
तेरा निर्णय
सब गडमगड
गलत और सही
कहीं किसी किताब
में लिखा ही
नहीं होता है
एक सूखी हुई
नदी के रास्ते के
पत्थरों को वाकई
बहुत घमंड होता है
अपनी मजबूती पर
आपदा के समय
ही पता लगता है
पेंदी और बेपेंदी
की चट्टाने कौन सी
पड़ी रहती है
और कौन सी
चल देती है
पानी के प्रवाह
के साथ बिना
शिकायत के
जीवन हर किसी
के लिये अलग 
पहलू एक होता है
किताबें सिद्धांत
समझने वालों
के लिये होती हैं
पर कोशिश
सब करते हैं
लागू करने की
किसी से हो
ही जाता है और
कोई ऐसी की
तैसी कर लेता है
“उलूक”
तुझे पता है
कितना गोबर
भरा है तेरे भेजे में
फिर भी नहीं
समझ में आता है
तू किस बात के
पंगे ले लेता है
ओलम्पियाड सारी
जिंदगी में दिखेंगे
तुझे हरे लाल
और पीले काले
क्यों फजीहत
करवाता है अपनी
हर बार फेल होता है
मकड़ी सात बार
में चढ़ गई थी
दीवार कभी एक
कहानी रही है
बहुत पुरानी
लोगों के लिये
पता कहाँ
चल पाता है
क्या रोजमर्रा
का जैसा काम
और क्या
कभी कभी का
एक खेल होता है ।

मंगलवार, 19 जून 2012

पति पर सट्टा

घर की लड़की
बहन या पुत्री
के लिये पति
एक सर्वश्रेष्ठ
ही ढूँढा जाता है
ठोक बजा कर
उसे हर कोण से
देखा परखा जाता है
जीवन संगिनी बना
कर फिर उसे प्यार
से सहेज कर भेजा
ससुराल को जाता है
यहाँ पर लेकिन
पति की खोज
एक पूरा खेल
वो भी उल्टा
नजर आता है
पहले तो हर
पाँच साल में
एक पति को
अवकाश दे
दिया जाता है
अगले पति की
खोज में नया
फिर बाजार
सजाया जाता है
पहली बार
इस बार तो
गजब सुना है
पाँच सौ करोड़
का सट्टा भी
खेला जाता है
काम का है या
बेकार का है
बिल्कुल भी
नहीं देखा जाता है
कभी कभी इस
जुए में जोकर
भी एक मौका
पा जाता है
इस बार महसूस
पता नहीं क्यों हो
रहा है कहीं कोई
उपर की मंजिल
खाली तो मौका
नहीं पा जाता है
मालूम सबको है
पर देखना भी है
ऎ राष्ट्र कि इस
बार तू किस
बेवकूफ को
वरमाला इनके
इशारों पर
पहनाता है ।

गुरुवार, 12 जनवरी 2012

मतदान दूर है

शतरंंज खेलना
हर किसी को
यहाँ कहाँ आता है
फिर भी कोशिश कर
वो एक बिसात
बिछाता है।
काले या सफेद नहीं
मोहरों को दोनो
ओर से चलाता है
हारना नहीं चाहता है
जीतने वाले को
अपना बताता है।
खेल देखने वालों को
कभी भी पता
नहीं चल पाता है
वो कब इधर और
कब उधर पाला
बदल चला जाता है।
लेकिन किस्मत और
उपर वाले के खेल
को कौन भांप
कभी पाता है
जब अचानक
बिसात का एक
मोहरा अपनी
चाल खुद ब खुद
चलता चला
जाता है
बहुत लम्बा
कितना भी
लम्बा खेल
खेलने वाला
क्यों न हो
अपनी ही
चाल में एक बार
कभी कभी
फंस ही जाता है।

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