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शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017

एक और साल अपना दिसम्बर लिये सामने से नजर आता है

कितना
कुछ
यूँ ही छूट
जाता है

समय पर
लिखा ही
नहीं जाता है

चलते चलते
सड़क पर
अचानक
कुछ पक
पका जाता है

कहाँ रखो
सम्भाल कर

कलम कापी
रखने का
जमाना
याद आता है

लकीरें खींचना
आने ना आने
का सवाल
कहाँ उठता है

लकीरें खींचने
वाला शिद्दत
के साथ
हर पेड़ की
छाल पर
उसी की
शक्ल खोद
जाता है

किसी के
यहाँ भी होने
और उसी के
वहाँ भी होने
से ही जिसके
होने का मुरीद
जमाना हुआ
जाता है

जानते बूझते
हुऐ उसे
पूजा जाता है
किसी को वो
कहीं भी नजर
नहीं आता है

किसी का यहाँ
भी नहीं होना
और उसी का
वहाँ भी नहीं होना
उसके पूज्य होने
का प्रमाण
हो जाता है

दुर्भाग्य होता
है उसका जो
यहाँ का यहाँ
और
उसका भी
जो वहाँ का वहाँ
रहने की सोच से
बाहर  ही नहीं
निकल पाता है

दुनियाँ ऐसे
आने जाने
वालों के
पद चिन्हों
को ढूँढती है
जिन पर
चल देने वाला
बहुत दूर तक
कहीं पहुँचा
दिया जाता है

इधर से जाने
उधर से आने
उधर से जाने
इधर से आने
वालों को

खड़े खड़े
दूर से
आते जाते हुऐ

देखते रहने
वाले ‘उलूक’
की बक बक
चलती चली
जाती है

फिर से एक
और साल
इसी तरह
इसी सब में
निकलने के लिये
दिसम्बर का
महीना सामने
लिये खड़ा
हो जाता है ।

चित्र साभार: Can Stock Photo

शुक्रवार, 29 मई 2015

कुछ नहीं कहना है कह कर क्या कुछ होना है पढ़ लेना बस मानकर इतना कि ये रोज का ही इसका रोना है

किसी दिन बहुत
हो जाता है जमा
कहने के लिये यहाँ
क्या कहा जाये
क्या नहीं
आग लिखी जाये
या लिखी जाये चिंगारी
या बस कुछ धुऐं में से
थोड़ा सा कुछ धुआँ
अरे गुस्सा थूक
क्यों नहीं देता है
खोद लेता है क्यों नहीं
कहीं भी एक नया कुआँ
उसकी तरह कभी
नहीं था तू
ना कभी हो पायेगा
उसको खेलना आता है
बहुत अच्छी तरह
रोज एक नया जुआँ
झूठ की पोटली है
बहुत मजबूत है
ओढ़ना आता है उसे
सच और दिखाना
सच्चाई और झौंकना
आँखों में धूल मिलाकर
अपनी मक्कारी का धुआँ
सब पहचानते हैं उसे
रहते हैं साथ उसके
पूछो कभी कुछ उसके
बारे में यूँ ही तो
कहते कुछ नहीं
उठा के पूँछ कर
देते हैं बस हुआँ हुआँ ।



चित्र साभार: imgkid.com

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