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गुरुवार, 30 अप्रैल 2015

रास्ते का खोना या खोना किसी का रास्ते में

किसी जमाने में
रोज आते थे
और बहुत आते थे
अब नहीं आते
और जरा सा
भी नहीं आते
रास्ते इस शहर के
कुछ बोलते नहीं
जो बोलते हैं कुछ
वो कुछ बताते ही नहीं
उस जमाने में
किस लिये आये
किसी ने
पूछा ही नहीं
इस जमाने में
कैसे पूछे कोई
वो अब
मिलता ही नहीं
रास्ते वही
भीड़ वही
शोर वही
आने जाने वालों में
कोई नया दिख रहा हो
ऐसा जैसा भी नहीं
सब आ जा रहे हैं
उसी तरह से
उन्हीं रास्तों पर
बस एक उसके
रास्ते का किसी को
कुछ पता ही नहीं
क्या खोया वो
या उसका रास्ता
किससे पूछे
कहाँ जा कर कोई
भरोसा उठ गया
‘उलूक’ जमाने का
उससे भी और
उसके रास्तों से भी
पहली बार
सुना जब से
रास्ते को ही
साथ लेकर अपने
कहीं खो गया कोई ।

चित्र साभार: www.clipartpanda.com

रविवार, 21 दिसंबर 2014

खुद को ढूँढने के लिये खोना जरूरी है

एक नहीं
कई बार
होता है
आभास
भटकने का

समझ में
भी आता
है बहुत


साफ साफ
दिखता
भी है


जैसे

साफ
निर्मल
पानी में
अपना
अक्स ही
इनकार
करता हुआ
खुद ही का
प्रतिबिम्ब
होने से

बस
थोड़े से
लालच
के कारण
जिसे
स्वीकार
करना
मुश्किल
होता है
और
हमेशा
की तरह
कोशिश
व्यर्थ
चली
जाती है

बेचने की
एक
सत्य को
पता होने
के
बावजूद भी
कि
सत्य कभी
भी नहीं
बिका है

बिकता
हमेशा
झूठ ही
रहा है
और
वो भी
कम कम
नहीं
हमेशा ही
बहुत ऊँचे
दामों में
बिना किसी
बाजार
और
दुकान में
सजे हुऐ

जिसे खरीदते
समय किसी
को भी कभी
थोड़ी सी भी
झिझक
नहीं होती है

सोच और
कलम के
लिये कभी
कहीं कोई
बाजार
ना हुआ है
ना कभी होगा

फिर भी
गुजरते हुऐ
बाजारों के बीच
लटके हुऐ
झूठे इनामों
सम्मानों
दुकानों की
चकाचौंध

और

ठेकेदारों की
निविदाओं के
लिये लगाई
जा रही
बोलियों से
जब भी
कलम लेखन
और
लेखक का ध्यान
भटकता है

थोड़ी देर के
लिये ही सही
सत्य नंगा
हो जाता है

खुद का खुद
के लिये
खुद के ही
सामने

और

रास्ता
दिखना
शुरु हो
जाता है
तेज रोशनी
से चौधिया
के अंधी
हो गई
आँखो
को भी ।


चित्र साभार: www.gograph.com

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