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शुक्रवार, 17 अक्तूबर 2014

जब नहीं दिखता है एक ‘ब्लागर’ कभी दूसरे ‘ब्लागर’ को बहुत दिनों तक

होता कुछ नहीं है वैसे
जब नहीं दिखता है
एक ब्लागर को
एक दूसरा ब्लागर यहाँ
जो दिखा करता था
कभी रोज ही
आता और जाता हुआ
यहाँ से वहाँ
और वहाँ से यहाँ
आना और जाना
तो चलता रहता है
इसका और उसके
शब्दों का वहाँ से यहाँ
और यहाँ से वहाँ
एक रोज आता जाता है
एक कभी आता है
एक कभी जाता है
रोज आने जाने
वाले को रोज
आने जाने वालों से
कोई परेशानी
नहीं होती है
परेशानी तब होती है
जब एक रोज
आने जाने वाला
अपने अगल बगल से
रोज आते जाते हुऐ को
बहुत दिनों से
आता हुआ नहीं
देख पाता है
दिन गुजरते हैं
रास्ते में कहीं पर
एक पुराना दिखता है
कहीं एक पुराने
के साथ एक
नया बिकता है
कहीं दो नयों के संग
एक पुराना दिखता है
ढूँढना चाहने वाले
ढूँढते भी हैं
एक का निशान
दूसरे के घर मिलता है
दूसरा किसी तीसरे
के घर कुछ ना कुछ
छोड़ कर चलता बनता है
अब लिखने लिखाने
की दुनियाँ है
यहाँ रोज एक नया
रिवाज कोई ना कोई
कहीं ना कहीं सिलता है
बहुत से नये दरवाजे
बंद होने से शुरु होते हैं
कहीं बहुत पुराना
दरवाजा भी
बहुत दिनों के
बाद खुलता है
याद आती है कभी
किसी की
दिखा करता था
अपने ही आस पास
रोज ही कहीं ना कहीं
बहुत दिनों से
कोई खबर ना कोई
पता मिलता है
देखिये और
ढूँढिये तो कहीं
कहाँ हैं जनाब
आजकल आप
आप ही को
ढूँढने के लिये
‘उलूक’ संदेश
एक लेकर कुछ यूँ
शब्दों के बियाबान
में निकलता है
होता कुछ नहीं है
वैसे जब कई कई
दिनों तक भी
एक ब्लागर को
एक दूसरे ब्लागर
का पता नहीं
भी चलता है ।

चित्र साभार: http://dlisted.com/

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