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बुधवार, 8 मार्च 2017

गीता में कही गयी हैं बातें वही तो हो रही हैं नजर आ रहा है मत कहना ‘उलूक’ पगला रहा है


सीधी बोतल
उल्टी कर
खाली करना
फिर खाली
बोतल में
फूँक मार कर
कुछ भरना


रोज की
आदत हो
गयी है
देखो तो
खाली बोतलें
ही बोतलें
चारों ओर
हो गयी हैं

कुछ बोतलें
सीधी पड़ी
हुई हैं
कुछ उल्टी
सीधी हो
गयी हैं

बहुत कुछ
उल्टा सीधा
हुआ जा
रहा है
बहुत कुछ
सीधा उल्टा
किया जा
रहा है

पूछना
मना है
इस लिये
पूछा ही नहीं
जा रहा है

जो कुछ भी
हो रहा है
स्वत: हो
रहा है
होता चला
जा रहा है

जरूरत ही
नहीं है
किसी को
कुछ
पूछने की

कोई पूछने भी
नहीं आ रहा है

वो उसके लिये
लगा है उधर
गाने बजाने में

इसको इसके
लिये इधर
खुजलाने में
मजा आ रहा है

गधों की दौड़
हो गयी है
सुनाई दे रही है

खबर बहुत
दिनों से
हवा हवा
में है
और
होली भी
आ रही है

गधों में सबसे
अच्छा गधा भी
जल्दी ही
गधों के लिये
भेजा जा रहा है

‘उलूक’
तूने पेड़
पर ही
रहना है
रात गये ही
सुबह की
बात को
कहना है

तुझे
किस बात
का मजा
आ रहा है

खेलता रह
खाली
बोतलों से

गधे
का आना
फिर गधे
का जाना

कृष्ण जी
तक बता
गये हैं
गीता में

गधों के
बीच में
चल रही
उनकी
अपनी
बातें हैं

बोतलों में
फूँकने वाला
क्या फूँक
रहा है
जल्दी ही
होली
से पहले
सबके
सामने से
आ रहा है

किसलिये
छटपटा
रहा है ?

चित्र साभार: Dreamstime.com

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

सीन होता है फिल्म का होता है जिसमें कुछ गधे होते हैं जो सारे घोडो‌ को लाईन में लगा रहे होते हैं

कैसे कहे कोई
होना हमेशा ही
नियम से
ही होता है
अगर होता है
मान भी लिया
होता ही है
तो फिर
समझाइये
गधों में से
सबसे बेकार
का एक गधा
सबसे अच्छे
घोड़े के अस्तबल
में घोड़ो के बीच
घोड़ा बन कर
कैसे अपनी टेड़ी
पूँछ को सीधा
तान कर
खड़ा होता है
बताइये
गधे के अस्तबल
में दिखने के
दिन से ही कैसे
सारे गधों का
अच्छा दिन
कैसे शुरु होता है
हर जगह गधा
और तो और
जहाँ किसी की
जगह नहीं
होती है उस
 जगह पर भी
कोई ना कोई
गधा सो
रहा होता है
गधा गधे के
लिये भाषण
घोड़ो के सामने
दे रहा होता है
किस तरह घोड़ा
गधे की तीमारदारी
में लगा होता है
गधा ना होने
का अफसोस
किसी को
नश्तर चुभो
रहा होता है
कैसे सारे गधे
एक हो कर
नारे लगाना
शुरु हो रहे होते हैं
गधे के सारे
रिश्तेदार घोड़ों
 की जगह पर
नजर आ रहे
हो रहे होते हैं
पूँछ हिला रहे
होते हैं मुस्कुरा
रहे होते हैं
बस अपने होने
का कुछ बताने
से कतरा रहे होते हैं
कैसे एक इलाके
के सारे गधे
घोड़े हैं करके
अखबार के उसी
इलाके के गधों के
द्वारा दिखाये
जा रहे होते हैं
गधों का इलाका
गधे कहीं भी नहीं
नापने जा रहे होते हैं
घोड़े अपने टापों की
आवाज पर मगन
हो कर गा रहे होते हैं
कोई फर्क नहीं
पड़ रहा होता है
उनके घोड़ेपन पर
रोज गधों की दुलत्ती
जो खा रहे होते हैं
फिर भी मुस्कुरा
रहे होते हैं ।

चित्र साभार: www.shutterstock.com

मंगलवार, 20 अक्तूबर 2015

बहुत बार मन गधा गधा हो जाता है गधा ही बस अपना सा लगता है और बहुत याद आता है

कई बार लिखते समय
कई संदर्भ में याद
आये हो गधे भाई
बहुत दिन हो गये
मुलाकात किये हुऐ
याद किये हुऐ
बात किये हुऐ
कोई खबर ना
कोई समाचार
आज तुम्हारी याद
फिर से है आई
जब से सुनी है
जानवर के चक्कर में
आदमी की आदमी से
हुई है खूनी
रक्तरंजित हाथापाई
आये भी कोई
खबर कैसे तुम्हारी
ना किसी खबरची ने
ना ही किसी अखबार ने
तुममें कोई दिलचस्पी
आज तक महसूस
ही नहीं हुआ कि
हो कभी दिखाई
मुलाकात होती तो
होती भी कैसे
ना अरहर की दाल
से ही तुम्हें
कुछ लेना देना
ना मुर्गे से ही
होता है तुम्हारा कभी
कुछ सुनना कहना
गाय और भैंस में से
एक भी नहीं कही
जा सकती तुम्हारी
नजदीक की या
बहुत दूर की बहना
बस तालमेल दिखता है
तुम्हारा अगर कहीं तो
सिर्फ और सिर्फ
अपने धोबी से
कुछ गंदे कुछ मैले कुचैले
कुछ साफ सुथरे धुले हुऐ
कपड़ों के थैले से
अब ऐसा भी होना
क्या होना
देश के किसी भी
काम के नहीं
शरम तुम्हें पता नहीं
कभी आई की नहीं आई
घास खाना हिनहिनाना
और बस खड़े खड़े ही सोना
ना खाने के काम के
ना दिखाने के काम के
चुनाव चिन्ह ही बन जायें
ऐसा जैसा भी
तुमसे नहीं है
कभी भी होना
कितना अच्छा है
ना भाई गधे
ना तुम्हें किसी ने पूछना
ना तुम्हें छेड़ने के कारण
किसी पर किसी को
काली स्याही भी कभी
फेंकने के लिये किसी को
ढकोसला कर कर के रोना
आ भी जाया करो
दिखो ना भी कहीं
याद में ही सही
गर्दभ मयी हो गया हो
जहाँ सब कुछ
बचा हुआ ही ना लगे
कि है कहीं कुछ
तुमसे गले मिल कर
ढाड़े मार मार कर
आज तो ‘उलूक’ को
भी है देश के नाम पर
देशभक्ति दिखाने
और ओढ़ने के लिये रोना ।

चित्र साभार: www.cliparthut.com

बुधवार, 27 मई 2015

परेशान हो जाना सवाल देख कर सवाल का जवाब नहीं होता है

हमाम के
अंदर रहता है
अपने खुद के
पहने हुऐ
कपड़ों को
देख कर
परेशान होता है
दो चार जानवरों
के बारे में बात
कर पाता है
जिसमें एक गधा
एक लोमड़ी या
एक कुत्ता होता है
सब होते हैं जहाँ
वहाँ खुद मौजूद
नहीं होता है
इंसानों के बीच
एक गधे को
और गधों के बीच
एक इंसान का रहना
एक अकेले के लिये
अच्छा नहीं होता है
ढू‌ढ लेते हैं अपनी
शक्ल से मिलती
शक्लें लोग हमेशा ही
इस सब के लिये
आईना किसी के
पास होना जरूरी
नहीं होता है
इज्जत उतारने
के लिये कुछ
कह दिया जाये
किसी से
किसी किताब में
कहीं कुछ ऐसा
लिखा भी
नहीं होता है
अपने कपड़े तेरे
खुद के ही हैं
‘उलूक’
नंगों के
बीच जाता है
जिस समय
कुछ देर के लिये
उतार क्यों
नहीं देता है ?

चित्र साभार: imageenvision.com

बुधवार, 22 अप्रैल 2015

काम हो जाना ही चाहिये कैसे होता है इससे क्या होता है

क्या बुराई है
सीखने में कुछ
कलाकारी
जब रहना ही
हो रहा हो
किसी का
कलाकारों के
जमघट में
अपने ही
घर में
बनाये गये
सरकस में
जानवर और
आदमी के
बीच फर्क को
पता करने को
वैसे तो कहीं
कोई लगा
भी होता है
आदमी को
पता भी होता है
ऐसा बहुत
जगह पर
लिखा भी
होता है
जानवर को
होता है
या नहीं
किसी को
पता भी
होता है
या नहीं
पता नहीं
होता है
आदमी को
आता है
गधे को बाप
बना ले जाना
अपना काम
निकालना
ही होता है
इसके लिये
वो बना देता है
किसी शेर को
पूंछ हिलाता
हुआ एक कुत्ता
चाटता हुआ
अपने कटे हुए
नाखूँनों को
निपोरता
हुआ खींसें
घिसे हुऐ तीखे
दातों के साथ
कुतरता हुआ घास
तो भी
क्या होता है
काम को होना
ही चाहिये
काम तो
होता है
आदमी आदमी
रहता है
या फिर एक
जानवर कभी
हो लेता है
‘उलूक’ को नींद
बहुत आती है
रात भर
जागता भी है
दिन दोपहर
ऊँघते ऊँघते
जमहाईयाँ भी
लेता है ।
चित्र साभार: www.englishcentral.com

शनिवार, 11 अप्रैल 2015

धोबी होने की कोशिश मत कर बाज आ गधा भी नहीं रह पायेगा समझ जा

चल
अपनी सारी
बातें मुझे बता

मेरी बातें
समझ में
तेरे नहीं
आ पायेंगी

ऐसी बातों
को सुनकर
करेगा भी क्या

बैठा रह
घास खा
जुगाली कर
पूँछ हिला

वैसे भी
धोबी और
गधे का
रिश्ता
होता है
एक बहुत
नाजुक रिश्ता

माल मिलेगा
मलाईदार
चिंता मत कर

जम कर
सामान उठा
इधर से
उधर ले जा
जो कहा जाये
कहने से पहले
समझ जा

धोबी क्या
करना
चाह रहा है
उस पर ध्यान
मत लगा

दिये गये
काम को
मन लगा कर
कम से कम
समय में निपटा

पूरा होते
ही खुद
अपनी रस्सी
का फंदा
अपने गले
में लटका

खूँटे से
बंध कर
नियत व्यास
का घेरा बना
चक्कर लगा
घनचक्कर हो जा

दिमाग
की बत्ती
जलाने
की बात
सोच में भी
मत ला

राबर्ट फ्रोस्ट
मत बन
मील के पत्थर
लम्बी दूरी
सोने से पहले
और
उठने के बाद
की लम्बी दौड़
को धोबी की
सोच में रहने दे

गोबर कर
दुल्लती झाड़
धूल उड़ा

धोबी की इच्छा
आकाँक्षाओं को
अपने सपने में
भूल कर भी
मत ला

याद रख
धोबी
होने की
कोशिश
करेगा
गधा भी
नहीं रहेगा
समझ जा ।

चित्र साभार: www.hindukids.org

बुधवार, 8 अप्रैल 2015

सारे जोर लगायेंगे तो मरे हाथी को खड़ा कर ले जायेंग़े

चट्टान पर
बुद्धिमान ने
बनाया
अपना घर
और जोर की
वर्षा आई
बचपन में
सुबह की
स्कूल में की
जाने वाली
प्रार्थना का
एक गीत
याद आ पड़ा
उस समय
जब सामने
से ही अपने
कुछ दूरी पर
जोर के
धमाकों के साथ
फटते पठाकों
की लड़ियों
को घेर कर
उछलता हुआ
एक झुण्ड
दिखा खड़ा
इससे पहले
किसी से कुछ
पूछने की
जरूरत पड़ती
दिमाग के
अंदर का
फितूरी गधा
दौड़ पड़ा
याद आ पड़ी
सुबह सुबह
अखबार के
मुख्य पृष्ठ पर
छपी हुई
ताजी एक खबर
जनता जनार्दन
एक कददू
और कुछ तीर
साथ में अपने
गधे का जनाजा
और उसकी
खुद की ही
अपने लिये
खोदी गई
साफ सुथरी
कबर
सारी खुदाई
एक तरफ
अपना भाई
एक तरफ
जब जब
अपनी सोच
के सोच होने
का वहम
कभी हुआ है
अपना
यही गधा
सीना तान
कर अपनी
सोच के साथ
खड़ा हुआ है
‘उलूक’
इतना कम
नहीं है क्या ?
बनाने दे
दुनियाँ को
रेत के
ताजमहल
पकड़ अपनी
सोच के गधे
की लगाम
और निकल
ले कहीं
तमाशा देखने
के चक्कर में
गधा भी लग
लिया लाईन में
तो कहीं का
नहीं रह जायेगा
अकेला हो
गया तो
चना भी नहीं
फोड़ पायेगा ।
चित्र साभार: imgarcade.com

गुरुवार, 12 मार्च 2015

आदमी की खबरों को छोड़ गधे को गधों की खबरों को ही सूँघने से नशा आता है

अब ये तो नहीं पता
कि कैसे हो जाता है
पर सोचा हुआ
कुछ कुछ आगे
आने वाले समय में
ना जाने कैसे
सचमुच ही
सच हो जाता है
गधों के बीच में
रहने वाला गधा
ही होता है
बस यही सच
पता नहीं हमेशा
सोचते समय कैसे
भूला जाता है
गधों का राजा
गधों में से ही एक
अच्छे गधे को
छाँट कर ही
बनाया जाता है
इसमें कोई गलत
बात नहीं ढूँढी
जानी चाहिये
संविधान गधों का
गधों के लिये
ही होता है
गधों के द्वारा
गधों के लिये ही
बनाया जाता है
तरक्की भी गधों
के राज में गधों
को ही दी जाती है
एक छोटी कुर्सी से
छोटे गधे को
बड़ी कुर्सी में
बैठाया जाता है
छोटी कुर्सी के लिये
एक छोटा मगर
पहले से ही
जनप्रिय बनाया और
लाईन पर लगाया
गधा बैठाया जाता है
सब कुछ सामान्य
सी प्रक्रियाऐं ही
तो नजर आती है
बस ये समझ में
नहीं आ पाता है
जब खबर फैलती है
किसी गधे को
कहीं ऊपर बैठाये
जाने की ‘उलूक’
तुझ गधे को पसीना
आना क्यों
शुरु हो जाता है ?

चित्र साभार: www.clipartof.com

गुरुवार, 4 दिसंबर 2014

बिना नोक की कील जैसा लिखा नहीं ठोका जा सकता सोच में कितना भी बड़ा हो हथौड़ा

हो गये होते होते
आठ पूरे और
एक आधा सैकड़ा
कुछ नहीं किया
जा सका
कैकड़े में नहीं
दिखा चुल्लू भर
का भी परिवर्तन
दुनियाँ बदल गई
यहाँ से वहाँ
पहुँच गई
उसे कहाँ बदलना
क्यों बदलना
किसके लिये बदलना
वो नहीं बदलेगा
जिसको रहना
अच्छा लगता
रहा हो हमेशा
से ही एक कैकड़ा
खुद भी टेढ़ा मेढ़ा
सोच भी टेढ़ी मेढ़ी
लिखा लिखाया
कभी नहीं हो पाया
एक सवार
खड़ा रहा पूँछ हिलाता
हुआ सामने से
हमेशा तैयार एक
उसकी खुद की
लेखनी का लंगड़ा घोड़ा
रहा लकीर का फकीर
उस लोटे की माँनिंद
पैंदी उड़ गई हो जिसकी
किसी ने मार कर कोड़ा
उसे बहुत बेदर्दी से हो तोड़ा
बेपेंदी की सोच
कुछ लोटों की लोट पोट
मवाद बनता रहा
बड़ा होता चला गया
जैसे बिना हवा भरे ही
एक पुराना छोटा सा फोड़ा
सजा कर लपेट कर
एक शनील के कपड़े में
बना कर गुलाब
छिड़क कर इत्र
हवा में हवाई फायर कर
धमाके के साथ
एक नयी सोच की
नयी कविता ने
ठुमके लगा ध्यान
अपनी ओर
इस तरह से मोड़ा
उधर का उधर रह गया
इधर का इधर रह गया
जमाने ने मुँह काले
किये हुऐ को ही
ताजो तख्त
नवाज कर छोड़ा
शुक्रिया जनाब
यहाँ तक पहुँचने का
‘उलूक’ जानता है
पर्दे के पीछे से झाँकना
जो शुरु किया था
किसी जमाने में
किसी ने आज तक
उस सीखे सिखाये को
सिखाने के धंधे का
अभी भी बाँधा हुआ है
अपने दीवान खाने पर
अकबर के गधे को
उसकी पीठ पर
लिखकर घोड़ा ।

चित्र साभार: http://www.fotosearch.com/

मंगलवार, 4 नवंबर 2014

आदमी आदमी का हो सके या ना हो सके एक गधा गधे का नजदीकी जरूर हो जाता है



“अंशुमाली रस्तोगी जी” का आज दैनिक हिन्दुस्तान में छपा लेख 
“इतना सधा हूँ कि सचमुच गधा हूँ” 
पढ़ने के बाद । 

अकेले नहीं
होते हैं आप
महसूस 
करते हैं
और कुछ
नहीं कहते हैं
रिश्तेदारियाँ
घर में ही हों
जरूरी 
नहीं होता है
आपका 
हमशक्ल
हमख्याल 
कहीं और
भी होता है

आपका
बहुत
नजदीकी
रिश्तेदार
भी होता है

बस
आपको ही
पता नहीं
होता है

एक नहीं
कई बार
बहुत
सी बात
यूँ ही
कहने से
रह जाती हैं

सोच की
अंधेरी
कोठरी में
जैसे कहीं
खो जाती हैं

सुनने
समझने
वाला कोई
कहीं नहीं
होता है

कहने
वाला कहे
भी किससे

कितना
अकेला
अकेला
कभी कभी
एक अकेला
होता है

और
ऐसे में
कभी
अंजाने में
कहीं से
किसी की
एक चिट्ठी
आ जाती है

जिसमें
लिखी हुई
बातें दिल
को गदगद
कर जाती हैं

कहीं पर
कोई और
भी है
अपना जैसा
अपना
अपना सा

सुन कर
आखों में
कुछ नमी
छा जाती है

‘अंशुमाली’
 कहता है
कोई उसे
गधा कहे
तो अब
सहजता
से लेता है

बहुत दिनों
के बाद
गधे की याद
‘उलूक’ को भी
आ जाती है

गधा
सच में
महान है
ये बात
एक बार
फिर से
समझाती है

खुद के
गधे से
होने से
कोई
अकेला नहीं
हो जाता है

और
भी कई
होते हैं गधे
इधर उधर भी
कई कई
जगहों पर

सुनकर ही
दिल खुश
हो जाता है

बहुतों
के बीच
एक गधा
यहाँ देखा
जाता है

इसका
मतलब
ये नहीं
होता है
कि
दूसरा गधा
दूसरी जगह
कहीं नहीं
पाया जाता है ।

चित्र साभार: www.gograph.com

शनिवार, 20 सितंबर 2014

खाना पीना और सोना ही बस जरूरी होता है

रजिस्टर में जैसे
करने हों उपस्थिति
के हस्ताक्षर और
डालना हो समय
और दिँनाक भी
लिखने का मतलब
बस इतना ही
नहीं होता है
हाँ कभी कभी
अवकाश सरकारी
भी होता है
सरकारी ना सही
गैर सरकारी
भी होता है
बहुत से कारण
भी होते हैं
बहुत से लोग
कभी भी कुछ भी
नहीं लिखते हैं
किसने कह दिया
लिखना बहुत ही
जरूरी होता है
दवाईयाँ भी होती हैं
मरीज भी होता है
मर्ज भी होता है
मौत भी होती है
जिंदा दिखता भी है
और मरा हुआ
भी होता है
सोच में रोक टोक
नहीं होती है
सोचने वाला ही
घोड़ा होता है
उसके हाथ में ही
चाबुक होता है
लगाम भी वही
लगाता है
किसी और को
कुछ भी पता
नहीं होता है
किसी के सोच का
यही सरपट
दौड़ने वाला घोड़ा
किसी के लिये
बस एक धोबी का
लद्दू गधा होता है
और गधे को कैसे
पाला जाता है
उस पर बहुत कुछ
बताने के लिये
उसके पास
बहुत कुछ होता है
ऐसे सभी घुड़सवारों
का अपना एक
गिरोह होता है
जिनके पास
ना तो घोड़ा होता है
ना कोई गधा होता है
इन सब का काम
सोच के घोड़े दौड़ाने
वालों के घोड़ों को
उनकी सोच में ही
दौड़ा दौड़ा कर
बेदम कर गिरा
देना होता है
और इस
सब के लिये
उनके पास
सोच में दौड़ते घोड़ों
को गिराने का
हथौड़ा होता है
‘उलूक’ तू जाने
तेरी सोच जाने
पता नहीं किस
डाक्टर ने कह दिया
है तुझसे कि
ऊल जलूल भी हो
सोच में कुछ भी
तब भी लिखना
जरूरी होता है ।

चित्र साभार: http://www.briskpost.com/

मंगलवार, 12 अगस्त 2014

गधा घोड़ा नहीं हो सकता कभी तो क्या गधा होने का ही फायदा उठा

लिखने लिखाने के
राज किसी को
कभी मत बता
जब कुछ भी
समझ में ना आये
लिखना शुरु हो जा
घोड़ों के अस्तबल
में रहने में कोई
बुराई नहीं होती
जरा भी मत शरमा
कोई खुद ही समझ ले
तो समझ ले
गधे होने की बात
को जितना भी
छिपा सकता है छिपा
कभी कान को
ऊपर की ओर उठा
कभी पूँछ को
आगे पीछे घुमा
चाबुकों की फटकारों
को वहाँ सुनने से
परहेज ना कर
यहाँ आकर आवाज की
नकल की जितनी भी
फोटो कापी चाहे बना
घोड़े जिन रास्तों से
कभी नहीं जाते
उन रास्तों पर
अपने ठिकाने बना
घोड़ो की बात पूरी नहीं
तो आधी ही बता
जितना कुछ भी
लिख सकता है
लिखता चला जा
उन्हें कौन सा
पढ़ना है कुछ भी
यहाँ आकर
इस बात का फायदा उठा
सब कुछ लिख भी गया
तब भी कहीं कुछ
नहीं है कहीं होना
घोड़ों को लेखनी
की लंगड़ी लगा
बौद्धिक अत्याचार
के बदले का इसी
को हथियार बना
घोड़ों की दौड़ को
बस किनारे से
देखता चला जा
बस समझने की
थोड़ा कोशिश कर
फिर सारा हाल
लिख लिख कर
यहाँ आ कर सुना
वहाँ भी कुछ नहीं
होना है तेरा
यहाँ भी कुछ
नहीं है होना
गधा होने का
सुकून मना
घोड़ों के अस्तबल
का हाल लिख लिख
कर दुनियाँ को सुना
गधा होने की बात
अपने मन ही मन
में चाहे गुनगुना।

सोमवार, 21 जुलाई 2014

प्रतियोगिता के लिये नहीं बस दौड़ने के लिये दौड़ रहा होता है

चले जा रहे हैं
दौड़ लगा रहे हैं
भाग रहे हैं

कहाँ के लिये

किसलिये
कहाँ जा
कर पहुँचेंगे


अब ऐसे ही

कैसे बता देंगे

दौड़ने तो दो

सब ही तो
दौड़ रहे हैं

बता थोड़े रहे हैं

मुल्ला की दौड़

मस्जिद तक होती है
पंडित जी की दौड़
मंदिर तक होने की
बात ना कही गई है
ना ही कहीं लिखी गई है

सुबह सुबह कसरत

के लिये दौड़ना
नाश्ता पानी कर के
दफ्तर को दौड़ना
दफ्तर से घर को
वापस दौड़ना भी
कहीं दौड़ने में आता है

असली दौड़ तो

दिमाग से होती है
उसी दौड़ के लिये
हर कोई दिमागी
घोड़ों को दौड़ाता है

अब बात उठती है

घोड़े दिखते
तो नहीं हैं

दौड़ते हुऐ बाहर
आस पास किसी
के भी कहीं भी

शायद दिमाग में

ही चले जाते होंगे

दिमाग में कैसे

चले जाते होंगे
कितनी जगह
होती होगी वहाँ

जिसमें घोड़े जैसी

एक बड़ी चीज को
दौड़ाते होंगे

‘उलूक’ को सब का

तो नहीं पता होता है

उसके दिमाग में तो

उसका गधा ही हमेशा
उसके लिये
दौड़ रहा होता है

कहाँ जाना है

कहाँ पहुँचना है से
उसको कोई मतलब
ही नहीं होता है

उसका दौड़ना बस

गोल चक्करों में
हो रहा होता है

एक जगह से रोज

शुरु हो रहा होता है
घूमते घामते
उसी जगह फिर से
शाम तक पहुँच
ही रहा होता है

घोड़े दौड़ाने वाले

जरूर पहुँच
रहे होते हैं
रोज
कहीं ना कहीं


वो अलग बात है

लेकिन
‘उलूक’ का गधा

कहाँ पहुँच गया है
हर कोई
अपने अपने

घोड़ों से जरूर
पूछ रहा होता है

रविवार, 15 दिसंबर 2013

मुझ गधे को छोड़ हर गधा एक घोड़ा होता है

कोई भी समझदार
पुराना हो जाने पर
कभी भी भरोसा
नहीं करता है
इसी लिये हमेशा
लम्बी रेस का
एक घोड़ा होता है
पुराना होने से
बचने का तरीका
भी बहुत ही
आसान होता है
परसों तक माना कि
बना रहा कहीं एक
मकान होता है
आज के दिन एक
बहुत माना हुआ
बड़ा किसान होता है
किसी को नजर भर
अपने को देखने का
मौका नहीं देता है
जब तक समझने
में आता है किसी को
जरा सा भी कुछ कुछ
आज के काम को छोड़
कल के किसी दूसरे
काम को पकड़ लेता है
एक ही काम से
चिपके रहने वाला
उसके हिसाब से
एक गधा होता है
धोबी दर धोबी के
हाथों में होते होते
पुराने से पुराना
होता ही रहता है
धोबी बदल देने
वाला गधा ही बस
खुश्किस्मत होता है
होता होगा गधा कभी
किसी जमाने में
पर आज के जमाने
का सबसे मजबूत
घोड़ा बस वही होता है
रोज का रोज एक
नये काम को नये
सिरे से जो कर लेता है
किसी के पास इतना
बड़ा दिमाग ही
कहाँ होता है जो
ऐसों के किये गये
काम को समझ लेता है
एक ही आयाम में
जिंदगी काटने वालों
के लिये वही तो
एक बहुआयामी
व्यक्तित्व होता है
जिसने कुछ भी
कभी भी कहीं भी
पूरा ही नहीं
किया होता है ।

सोमवार, 12 अगस्त 2013

भाई आज फिर तेरी याद आई

गधों में से चुना
जाना है एक गधा
चुनने के बाद
कहा जायेगा उसे
गधों में सबसे
गधा गधा
इस काम को
अंजाम देने के
लिये लाया जाना है
आसपास का नहीं
कहीं बहुत दूर
का एक गधा
गधों के माफिया
ने चुना है
सुना एक धोबी
का गधा
जब बहुत से
गधे खेतों में
घूमते चरते
दिख रहे हैं
रस्सी भी नहीं हैं
पड़ी गले में
फुरसत में
मटरगश्ती भी
मिल कर वो
कर रहे हैं
समझ में नहीं
ये आया गधे
धोबी के गधे से
अपना काम
निकलवाने के लिये
क्यों मर रहे हैं
मुझ गधे के दिमाग ने
मेरा साथ ही
नहीं निभाया
इस बात का राज
मुझे गूगल ने
भी नहीं बताया
थक हार कर
मैंने अपने एक
साथी को अपनी
उलझन को बताया
सुनते ही चुटकी
में यूँ ही उसने
इस बात को कुछ
ऎसे समझाया
बोला चूहों को
जब बांधनी होती है
किसी बिल्ली के
गले में घंटी
बहुत मुश्किल
से किसी एक
चतुर चूहे के
नाम पर है
राय बनती
काम होने में
भी रिस्क बहुत
है हो जाता
कभी कभी चतुर
चूहा इसमें शहीद
भी है हो जाता
अब अगर पहले
से ही घंटी बंधी
बिल्ली किसी के
पास हो जाये
तो बिना मरे भी
चूहों का काम
आसान हो जाये
इसी सोच से धोबी
के गधे पर दाँव
गधों ने लगाया होगा
गधे का नहीं सोचा होगा
धोबी पटा पटाया होगा
गधों को जब अपना
काम करवाना होगा
धोबी को बस एक
पैगाम पहुँचाना होगा
धोबी बस गले की
रस्सी को हिलायेगा
गधा गधों के सोचे हुऎ
गधे के नाम पर
ही मुहर लगायेगा
लिख दिया है
ताकि सनद रहे
क्या फर्क पड़ना है
क्योंकि एक गधे की
लिखी हुई बात को
बस गधा ही केवल
एक समझ पायेगा
उसे तो चरनी है
लेकिन बस घास
वो फाल्तू में यहाँ
काहे को आयेगा
गधों के लिये एक
गधे के द्वारा कही
गई बात गधों को
कोई भी जा
के नहीं सुनाऎगा ।

शनिवार, 1 जून 2013

स्वायत्तता

हमेशा की तरह
आज भी आया हूँ
फिर से एक
बेवकूफी भरा
सवाल लाया हूँ
स्वायत्तता और
स्वायत्तशाशी
संस्थान में मौज
मारता रहा हूँ
पर होती क्या है
अभी तक खुद भी
नहीं समझ पाया हूँ
सरकार
सी बी आई को
स्वायत्तता
देने जा रही है
सुनकर अपनी
आँख थोड़ा सा
खोल पाया हूँ
विकीपीडिया
स्वायत्तता
का मतलब
समझाती है
अपने नियम
खुद बनाना
और उससे
किसी सिस्टम
को चलाना
होता है
ऎसा कुछ
समझाती है
इसलिये
स्वायत्तशाशी
संस्थानों में
कोई बाहर
का नियम नहीं
चल पाता है
क्योंकि हर कोई
अपनी सुविधा से
अपना एक नियम
अपने लिये बनाता है
आजादी अगर
देखनी हो
तो किसी भी
स्वायत्तशाशी
संस्थान में
चले जाईये
वहाँ हाजिरी
लगना लगाना
बेवकूफी
समझा जाता है
जब मन
आये आइये
जब मन ना हो
कहीं भी घूमने
चले जाइये
छुट्टी की अर्जी
भेजने की
जहमत भी
मत उठाइये
नौकरी पा
जाने के बाद
काम करने
को किसी से
भूल में भी ना
कह ले जाइये
स्वायत्तता
में रहकर जो
काम कर
रहा होता है
वो एक
गधा होता है
उस गधे
को छोड़ कर
बाकी हर कोई
स्वायत्त होता है
देश की सरकार
और सरकारी
दफ्तरों में सरकार
स्वायत्तता क्यों
नहीं बाट
ले जा रही है
सब जगह
अपने नियम
खुद बनाने
वाले पेड़
क्यों नहीं
उगा रही है
सारे झगडे़
स्वायत्तता
मिलते ही
निपटते
चले जायेंगे
सब लोग जब
अपने अपने
नियम खुद
बनाते चले जायेंगे
कोई किसी
से कुछ भी
नहीं कहीं
कह पायेगा
जो कहेगा
वो अपनी मौत
खुद ही अपने
लिये बुलायेगा
स्वायत्तता वैसे
तो समझ में
नहीं भी कभी
आ पाती है
देश को तो
एक सरकार
ही मगर
चलाये जाती है
उसे स्वायत्त
नहीं सरकारी
ही हमेशा से
कहा जाता है
ज्यादातर
सरकार सबको
सरकारी ही रहने
देना चाहती है
बस जिसे बर्बाद
करना होता है
उसे ही स्वायत्तता
देना चाहती है ।

मंगलवार, 9 अक्तूबर 2012

भाई फिर तेरी याद आई

गधे ने किसी
गधे को गधा
कह कर आज
तक नहीं बुलाया
आदमी कौन से
सुर्खाब के पर 

अपने लगा
कर है आया
बता दे कुछ
जरा सा भी
किसी धोबी के
दुख: को थोड़ा
सा भी वो कम
कभी हो कर पाया
किस अधिकार से
जिसको भी चाहे
गधा कहता हुआ
चलता है
चला
आज तक आया
गधों के झुंड
देखिये किस
शान से दौड़ते
जंगलों में
चले जाते हैं
बस अपनी
अपनी गधी
या बच्चों की
बात ही बस
नहीं सोच
पाते हैं
जान दे कर
जंगल के राजा
शेर की जान
तक बचाते हैं
बस घास को
भोजन के रूप
में ही  खाते हैं
घास की ढेरी
बना के कल
के लिये भी
नहीं वो बचाते हैं
सुधर जायें अब
लोग जो यूँ ही
गधे को बदनाम
किये जाते हैं
आदमी के कर्मों
क्यों अब तक
नहीं शर्माते हैं
गधा है कहने
की जगह अब
आदमी हो गया है
कहना शुरू क्यों
नहीं हो जाते हैं
गधे भी वाकई में
गधे ही रह जाते हैं
कोई आंदोलन
कोई सत्याग्रह
इस उत्पीड़न के
खिलाफ क्यों
नहीं चलाते हैं ।

सोमवार, 4 जून 2012

गधा बना दो भगवान

आज गधों पर
कुछ लिखने का
मन कर रहा है
पर बहन जी का
बहुत डर लग रहा है
उल्लू बिल्ली मुर्गी
पर लिखते हो कहकर
नाराजगी एक दिन
वो जता रही थी
इसीलिये हमारी
हिम्मत यहाँ आकर
बोल ही जा रही थी
गधे वैसे तो बहुत
काम के आदमी
हमेशा से बताये
जाते रहे हैं
इसीलिये धोबी
के खानदान के
साथ अभी तक
चलते आ रहे हैँ
आदमी जब एक
गधा हो जाता है
तो लगता है जैसे
कोई गाली खाता है
क्या करें गधे टाईप
के आदमियों के बीच
में जब कोई फंस
ही कहीं जाता है
तो गधा हूँ
इसीलिये तो यहाँ हूँ
कहता है और
मुस्कुराता है
गधों के किये
गये कामों पर
टल्लियाँ लगाता
चला जाता है
ना कुछ कर पाता है
ना ही कुछ कह पाता है
बस गधों की किस्मत
से खार खाता है
अगले जनम मोहे
गधा ही कीजो
कि बिनती हाथ जोड़
प्रभू के द्वार पर लगाता है।

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

गधा

गधा धोबी को छोड़
कौन पालना है चाहता
पर कभी अनायास मुझे
जरूर है याद दिलाता
बच्चा गधा गधे का बच्चा
भोला होता है और सच्चा
जवान तगड़ा
कुवाँरा गधा
बेरोजगार गधा
रोजगार में गधा
मुहब्बत की खोज में
खो जाता है गधा
मुहब्बत मिल गयी अगर
पागल हो जाता है गधा
गधे को देख देख
खुश हो जाता गधा
गधे से ही फिर कभी
दुखी हो जाता गधा
शादी शुदा परिवार
का मारा गधा
बीबी बच्चों के दुलार
का मारा गधा
हर तरफ गधों की
भरमार से
घबराता गधा
ढेंचू ढेंचू
आवाज करना
चाह कर भी ना
कर पाता गधा
घर के दरवाजे पर
गधों का नाम
खुदवाता गधा
हरेक बात पर
सर हिलाता गधा
समझ लेता
है सबकुछ
गधों को
समझाता गधा
पागलों का
सरदार भी
कहलाता गधा
गधों का सरदार
भी हो जाता
वो ही गधा
गधों के प्रकार
बताता गधा
अपने को गधों से
बाहर पाता गधा
गधों के प्रतिशत का
हिसाब लगाता गधा
वोट देने हर बार
हो आता गधा
अपने गधे को
जिता नहीं पाता गधा
गधों की सरकार
कभी नहीं बना
पाता गधा
गधे का गधा
ही रह जाता गधा ।

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