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मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

फिर आया घोडे़ गिराने का मौसम

किसने बताया
कहाँ सुन के आया
कि लिखने वाले
ने जो लिखा होता है
उसमें उसकी तस्वीर
और उसका पता होता है
किसने बताया
कहाँ सुन के आया
कि बोलने वाले ने
जो बोला होता है
उससे उसकी सोच
और उसके कर्मो का
लेखा जोखा होता है
बहुत बडे़ बडे़ लोगों
के आसपास मडराने
वालों के भरमाने
पर मत आया कर
थोड़ा गणित ना
सही सामाजिक
साँख्यिकी को ध्यान
में ले आया कर
इस जमाने में
चाँद में पहुँचने
की तमन्ना रखने
वाले लोग ही
सबको घोडे़
दिलवाते हैं
जल्दी पहुँच
जायेगा मंजिल
किस तरह से
ये भी साथ
में समझाते हैं
घोडे़ के आगे
निकलते ही
घोडे़ की पूँछ
में पलीता लगाते हैं
चाँद में पहुँचाने
वाले दलाल को
ये सब घोडे़ की
दौड़ है कह कर
भटकाते हैं
घोडे़ ऎसे पता
नहीं कितने
एक के बाद एक
गिरते चले जाते हैं
समय मिटा देता है
जल्दी ही लोगों
की यादाश्त को
घोडे़ गिराने वाले
फिर कहीं और
लोगों को घोडो़ में
बिठाते हुऎ नजर
फिर से आते है
बैठने वाले ये भी
नहीं समझ पाते हैं
बैठाने वाले खुद
कभी भी कहीं भी
घोडे़ पर बैठे
हुऎ नजर क्यों
नहीं आते हैं ?

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