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बुधवार, 1 जुलाई 2015

किसको क्या लगता है लगता होगा लगता रहे सोचने से अच्छा है कर लेना

अच्छा होता है
कुछ लिख लिखा
कर बंद कर देना
किताब के
पन्नों को
हो सके तो
चिपका देना
या सिल लेना
सुई तागे से
चारों तरफ से
ताकि खुलें
नहीं पन्ने
शब्दों को हवा
पानी लगना
अच्छा नहीं होता
बरसात में वैसे भी
नमी ज्यादा
होने से सील
जाती हैं चीजें
खत्म हो जाता
है शब्दों का
कुरकुरापन
गीले भीगे हुऐ
शब्द गीले
कागजों से
चिपके हुऐ
आकर्षित नहीं
करते किसी को
क्या देखने
क्या समझने
किसी के लिखे
हुऐ शब्द
शब्द तो
शब्द होते हैं
शब्दकोष में
बहुत होते हैं
इसके शब्द इसके
उसके शब्द उसके
करता रहे कोई
अपने हिसाब से
आगे पीछे
बनाता रहे
आँगन मकान
चिड़िया तूफान
दूसरों के शब्दों
से बनी इमारत
देख कर रहना
वैसे भी सीखा
नहीं जाता
अपने अपने मकान
खुद ही बनाना
खुद उसमें रहना
खुद सजाना
सँवारना अच्छा है
सबकी अपनी
किताब अपने ही
गोंद से चिपकी हुई
अपने पास ही
रहनी चाहिये
खुले पन्ने हवा में
फड़फड़ाते आवाज
करते हुऐ अच्छे
नहीं समझे जाते हैं
ऐसा पढ़ाया तो
नहीं गया है यहाँ
इस जगह पर
पर ऐसा ही जैसा
कुछ महसूस होता है
सही है या गलत
पता नहीं है अभी
पहली बार ही कहा है
किसी और को भी
ऐसा लगता है
चिपकी किताबों के
चिपके पन्नों को
गिनता भी तो
कोई नहीं है यहाँ।

चित्र साभार: www.canstockphoto.com

गुरुवार, 22 मार्च 2012

चेहरे

चेहरे दर चेहरे
कुछ लाल होते हैं
कुछ होते हैं हरे
कुछ बदलते हैं
मौसम के साथ
बारिश में
होते हैं गीले
धूप में हो
जाते हैं पीले
चेहरे चेहरे
देखते हैं
छिपते हुवे
चेहरे
पिटते हुवे
चेहरे
चेहरों को
कोई फर्क
पढ़ना मुझे
नजर नहीं
आता है
मेरा चेहरा
वैसे भी
चेहरों को
नहीं भाता है
चेहरा शीशा
हो जाता है
चेहरा चेहरे को
देखता तो है
चेहरे में चेहरा
दिखाई दे जाता है
चेहरे को चेहरा
नजर नहीं आता है
चेहरा अपना
चेहरा देख कर
ही मुस्कुराता है
खुश हो जाता है
सबके अपने
अपने चेहरे
हो जाते हैं
चेहरे किसी
के चेहरे को
देखना ही
कहाँ चाहते हैं
चेहरे बदल
रहे हैं रंग
किसी को
दिखाई नहीं देते
चेहरे चेहरे को
देखते जा रहे हैं
चेहरे अपनी
घुटन मिटा रहे हैं
चेहरे चेहरे को
नहीं देख पा रहे हैं
चेहरे पकड़े
नहीं जा रहे हैं
चेहरे चेहरे
को भुना रहे हैं
चेहरे दर चेहरे
कुछ लाल होते हैं
कुछ होते हैं हरे
कुछ बदलते हैं
मौसम के साथ
बारिश में
होते हैं गीले
धूप में हो
जाते हैं पीले।

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