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सोमवार, 5 सितंबर 2016

अर्जुन को नहीं छाँट कर आये इस बार गुरु द्रोणाचार्य सुनो तो जरा सा फर्जी ‘उलूक’ की एक और फर्जी बात

जब
लगाये गये
गुरु कुछ
गुरु छाँटने
के काम पर
किसी गुरुकुल
के लिये
दो चार और
गुरुओं के साथ
एक ऐ श्रेणी के
गुरुकुल के
महागुरु
के द्वारा

पता चला
बाद में
अर्जुन पर नहीं
एकलव्य पर
रखकर
आ चुके हैं
गुरु अपना हाथ
विश्वास में लेकर
सारे गुरुओं की
समिति को
अपने साथ

अब जमाना
बदल रहा
हो जब
गुरु भी
बदल जाये
तो कौन सी
है इसमें
नयी बात

एक ही
अगर होता
तो कुछ
नहीं कहता
पर एक
अनार के
लिये सौ
बीमार हो
जाते हों जहाँ
वहाँ यही तो
है होना होता

समस्या बस
यही समझने
की बची
इस सब के बाद
एक लव्य ने
किसे दे दिया
होगा अँगूठा
अपना काट

फिर समझ
में आया
फर्जी गुरु
‘उलूक’ के
भी कुछ

कुछ कुछ
सब कुछ में
से देख कर
जब देख बैठा
एक सफेद
लिफाफा मोटा
भरा भरा
हर गुरु
के हाथ

वाह
एकलव्य
मान गये
तुझे भी
निभाया
तूने इतने
गुरुओं को
अँगूठा काटे
बिना अपना
किस तरह
एक साथ ।

चित्र साभार: www.shutterstock.com

शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

गुरु पूर्णिमा पर प्रणाम गुरुओं को भी घंटालों को भी

कहाँ हो गुरु
दिखाई नहीं
देते हो
आजकल
कहाँ रहते हो
क्या करते हो
कुछ पता
ही नहीं
चल पाता है
बस दिखता है
सामने से कुछ
होता हुआ जब
तब तुम्हारे और
तुम्हारे गुरुभक्त
चेलों के आस पास
होने का अहसास
बहुत ही जल्दी
और
बहुत आसानी
से हो जाता है
एक जमाना था गुरु
जब तुम्हारे लगाये
हुऐ पेड़ सामने से
लगे नजर आते थे
फल नहीं
होते थे कहीं
फूल भी नहीं तुम
किसी को
दिखाते थे
कहीं दूर
बहुत दूर
क्षितिज में
निकलते हुऐ
सूरज का आभास
उसके बिना
निकले हुऐ ही
हो जाता था
आज पता नहीं
समय तेज
चल रहा है
या
तुम्हारा शिष्य ही
कुछ धीमा
हो गया है
दिन ही होता है
और रात का
तारा निकल
बगल में
खड़ा हो कर
जैसे मुस्कुराता है
और
मुँह चिढ़ाता है
गुरु
क्या गुरु मंत्र दिये
तुमने उस समय
लगा था
जग जीत
ही लिया जायेगा
पर आज
जो सब
दिख रहा है
आस पास
उस सब में तो
गुरु से कुछ
भी ढेला भर
नहीं किया जायेगा
तुमने जो
भी सिखाया
जिस की
समझ में आया
उसकी पाँचों
अँगुलियाँ
घी में हैं
जो दिख रहा है
उसका सिर
भी कढ़ाही
में है या नहीं है
ये पता नहीं है
अपना सिर
पकड़ कर
बैठे हुऐ
एक शिष्य को
आगे उससे
कुछ भी नहीं
अब दिख रहा है
जो है सो है
गुरु
गुरु तुम भी रहे
कुछ को
गुरु बनने
तक पहुँचा ही गये
लेकिन लगता है
दिन गुरुओं के
लद गये गुरु
गुरु घंटालों के
बहुत जोर शोर के
साथ जरूर आ गये
जय तो होनी
ही चाहिये गुरु
गुरु की
गुरु गुरु
ही होता है
पर गुरु
अब बिना
घंटाल बने
गुरु से भी
कुछ नहीं होता है ।

चित्र साभार: blogs.articulate.com


शुक्रवार, 22 मई 2015

समय समय के साथ किताबों के जिल्द बदलता रहा

गुरु लोगों ने
कोशिश की
और सिखाया भी
किताबों में
लिखा हुआ काला
चौक से काले
श्यामपट पर
श्वेत चमकते
अक्षरों को उकेरते
हुऐ धैर्य के साथ
कच्चा दिमाग भी
उतारता चला गया
समय के साथ
शब्द दर शब्द
चलचित्र की भांति
मन के कोमल
परदे पर सभी कुछ
कुछ भरा कुछ छलका
जैसे अमृत क्षीरसागर
में लेता हुआ हिलोरें
देखता हुआ विष्णु
की नागशैय्या पर
होले होले डोलती काया
ये शुरुआत थी
कालचक्र घूमा और
सीखने वाला खुद
गुरु हो चला
श्यामपट बदल कर
श्वेत हो चले
अक्षर रंगीन
इंद्रधनुषी सतरंगी
हवा में तरंगों में
जैसे तैरते उतराते
तस्वीरों में बैठ
उड़ उड़ कर आते
समझाने सिखाने का
सामान बदल गया
विष्णु क्षीरसागर
अमृत सब अपनी
जगह पर सब
उसी तरह से रहा
कुछ कहीं नहीं गया
सीखने वाला भी
पता नहीं कितना कुछ
सीखता चला गया
उम्र गुजरी समझ में
जो आना शुरु हुआ
वो कहीं भी कभी भी
किसी ने नहीं कहा
‘उलूक’ खून चूसने
वाले कीड़े की दोस्ती
दूध देने वाली एक
गाय के बीच
साथ  रहते रहते
एक ही बर्तन में
हरी घास खाने
खिलाने का सपना
सोच में पता नहीं
कब कहाँ और
कैसे घुस गया
लफड़ा हो गया
सुलझने के बजाय
उलझता ही रहा
प्रात: स्कूल भी
उसी प्रकार खुला
स्कूल की घंटी
सुबह बजी और
शाम को छुट्टी
के बाद स्कूल बंद
भी रोज की भांति
उसी तरह से ही
आज के दिन
भी होता रहा ।

चित्र साभार: www.pinterest.com

रविवार, 15 सितंबर 2013

गर्व से कहो फर्जी हैं


देश में फर्जी लोगों
की कमी नहीं है ये
मैं नहीं कह रहा हूं
आज के हिंदुस्तान के
मुख्य पृष्ठ में छपा है
और इस बात को
देश का सुप्रीम कोर्ट
सुना है कह रहा है
फर्जी डाक्टर
फर्जी पुलिस
फर्जी पायलट
जैसे और कई
खुशी हुई बस
ये देख कर
फर्जी मास्टर कहीं
भी नहीं लिखा है
मजे की बात देखिये
कोर्ट को जैसे बहुत
गर्व हो रहा है कि
इन फर्जी लोगों के
कारण ही तो
देश सही ढंग से
चल रहा है
कोर्ट मानता है
हजारों फर्जी वकील
रोज वहां आ रहे हैं
अच्छा काम कर रहे हैं
समय पर लोगों को
न्याय दिलवा रहे हैं
ऐसे में आप लोग
क्यों परेशान इतना
हो जा रहे हैं
क्यों फर्जी पायलटों की
बात हमें बता रहे हैं
एक दो हवाई जहाज
अगर वो कहीं
गिरा रहे हैं तो
कौन सा देश के लिये
खतरा हो जा रहे हैं
थोड़े कुछ अगर मर
भी जा रहे हैं
तो देश की जनसंख्या
कम करने में अपना
योगदान कर जा रहे हैं
देख क्यों नहीं रहे हैं
बहुत से ऐसे लोग
देश को तक चला रहे हैं
इतना बड़ा देश
हवा में उड़ रहा है
कई साल हो गये
इसे उड़ते उड़ते
आज तक तो कहीं
भी नहीं गिरा है
फिर काहे में कोर्ट
का समय आप
लोग खा रहे हैं
फर्जी होना ही
आज के समय में
बहुत जरूरी हो गया है
जो नहीं हुआ है
उसने कुछ भी नहीं
अभी तक किया है
सही समय पर
सही निर्णय जो
लोग ले पा रहे हैं
किसी ना किसी
फर्जी को अपना
गुरु बना रहे हैं
और जो लोग फर्जी
नहीं हो पा रहे हैं
देश के नाम पर
कलंक एक हो
जा रहे हैं
ना ही अपना भला
कर पा रहे हैं
ना ही किसी के
काम आ पा रहे हैं
आपको शरम भी
नहीं आ रही है
ऐसे में भी एक
फर्जी के ऊपर
मुकदमा ठोकने
कोर्ट की शरण में
आ जा रहे हैं ।

रविवार, 25 अगस्त 2013

सीधा साधा एक लड़का था कभी मेरे स्कूल में भी पढ़ता था

पक्ष की कर 
नहीं तो विपक्ष
की ही कर
सरकार की कर
नहीं तो उसके
ही किसी एक
अखबार की कर
बात करनी है
तुझे अगर कुछ
तो इनमें से किसी
एक के ही
कारोबार की कर
किसने कहा था
गाँव के स्कूल को
छोड़ के बड़े
शहर के बड़े
स्कूल में चला जा
चला भी गया था
तो किसने कहा था
गाँव की ढपली वहाँ
जा कर बजा जा
अब भुगत
घर की पुलिस नहीं
बड़े शहर की
पुलिस ने भी नहीं
देश की पुलिस ने
पकड़ कर अंदर
तुझे करा दिया
सारे के सारे
अखबारों में फोटो
छाप के तुझे एक
माओवादी बता दिया
समझा ही नहीं
इतने साल मेरे
स्कूल में रहकर भी
अरे कांग्रेसी
ही हो जाता
नहीं हो पा
रहा था तो
भाजपा में
ही चला जाता
अब ना
इधर का रहा
ना उधर का रहा
बिना बात के
अंदर को जा रहा 
इधर होता
या उधर होता
कभी तो
तेरे पास भी
कोई पोर्टफोलियो
एक जरूर होता
अभी भी समय है
सुधर जा
अधिसंख्यक
चल रहे हैं
जिन रास्तों पर
उन रास्तों में
चलना शुरु हो जा
जो नियम ज्यादा
लोगों की जेब में
देखे जाते हैं
वो ही भगवान जी
तक के द्वारा भी
फौलो किये जाते हैं
इसकी भी हाँ
में हाँ मिला
उसकी भी हाँ
में हाँ मिला
अब जेल भी
चला गया
और बोलेगा
तमगा भी
कोई नहीं
मिलेगा
पक्ष या
विपक्ष के
लिये जेल 

जाता तो
राजनीतिक कैदी
एक हो जाता
क्या पता 

किसी दिन
कोई मंत्री संत्री
बनने का मौका भी
जेल के सार्टिफिकेट
से तू पा जाता
मेरे स्कूल में इतने
साल तू पढ़ा पर
हेम तूने गुरुओं से
इतना भी नहीं सीखा । 


शुक्रवार, 7 जून 2013

क्या आपने देखी है/सोची है भीड़

भीड़ देखना
भीड़ सोचना
भीड़ में से
गुजरते हुऎ भी
भीड़ नहीं होना
बहुत दिन तक
नहीं हो पाता है
हर किसी के
सामने कभी
ना कभी
कहीं ना कहीं
भीड़ होने
का मौका
जरूर आता है
कमजोर दिल
भीड़ को देख
कर अलग
हो जाता है
भीड़ को दूर
से देखता
जाता है
मजबूत दिल
भीड़ से नहीं
डरता है कभी
भीड़ देखते ही
भीड़ हो जाता है
भीड़ कभी
चीटियों की
कतार नहीं होती
भीड़ कभी
बीमार नहीं होती
भीड़ में से
गुजरते हुऎ
भीड़ में
समा जाना
ऎसे ही
नहीं आ पाता है
भीड़ का भी
एक गुरु
होता है
भीड़ बनाना
भीड़ में समाना
बस वो ही
सिखाता है
भीड़ेंं तो बनती
चली जाती हैं
भीडे़ंं सोचती
भी नहीं हैं कभी
गुरु लेकिन
सीढ़ियाँ चढ़ता
चला जाता है
भीड़ फिर कहीं
भीड़ बनाती है
गुरू कब भीड़
से अलग हो गया
भीड़ की भेड़ को
कहाँ समझ में
आ पाता है ।

गुरुवार, 15 मार्च 2012

अपना कल याद नहीं

वो कल नंगा
हो गया था
आज उसे
कुछ याद नहीं
हंस रहा है
आज सुबह से
सामने खड़े हुवे
नंगो को
देख देख कर
बिना कपड़ों के
भूखे की रोटी
छीन कर खाने
मरीज की
दवा बेच कर
उसे ऊपर पहुंचाने
में माहिर होने के
आरोपों के मेडल
छाती से चिपकाये
आज भौंक रहा है
सुबह से उन्ही
भाई भतीजों पर
जिनको आज उसने
इस लायक बना के
यहां तक आने के
लिये तैयार किया है
कि उससे दो कदम
आगे पहुंचने वाले
उसके शागिर्द
काट खा रहे हैं
एक दूसरे को
खुले आम
कर रहे हैं वो काम
जो उसने भी किया
चुटकी मैं पटक दिया
अपने सॉथी को
बिना भनक लगे
सुना था देख भी लिया
गुरू सब
दाँव सिखाता है
एक को छोड़ कर
अपने बचाव के लिये।

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