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सोमवार, 21 अक्तूबर 2013

तैंतीस करोड़ देवताओं को क्यों गिनने जाता है

तैंतीस करोड़ देवताओं
की बात जब भी होती है
दिमाग घूम जाता है
बारह पंद्रह देवताओं से
घर का मंदिर भर जाता है
कुछ पूजे जाते हैं
कुछ के नाम को भी
याद नहीं रखा जाता है
क्यों होते होंगे
इतने ज्यादा देवता
इस बात में जरूर कोई
गूढ़ रहस्य होता होगा
ऐसा कभी कभी
लगने लग जाता है
पूजा अर्चना का सही
अर्थ भी उस समय
साफ साफ पता
लग जाता है
जब कोई भी देवता
कहीं भी काम करते हुऐ
नजर नहीं आता हैं
ना तो उससे काम करने
को कहा जाता है
ना ही किसी देवता को
कोई कामचोर कहने की
हिम्मत कर पाता है
काम बिगाड़
ना दे कोई देवता
इसीलिये डर के मारे
पूजा जरूर जाता है
अपने आस पास
देवताओं को छोड़
हर किसी के पास
कुछ ना कुछ काम
नजर आता है
खुश्किस्मत
भारत देश में
हर देवता
देवताओं की संख्या
बढ़ाने में जोर शोर से
लगा हुआ नजर आता है
देवता क्यों होते होंगे
करोड़ से भी ज्यादा
अपने आसपास
के देवताओं
को देख कर
अच्छी तरह
समझ में
आ जाता है
देवता होना ही
अपने आप में
सब कुछ हो जाता है
एक देवता
दूसरे को भी
अपना जैसा
ही देवता
बनाना चाहता है
अपने पास ही हैं
सारे तैंतीस
करोड़ देवता
फिर किसलिये
मंदिर मंदिर
भटकते हुऐ गिनती
करना चाहता है ।

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