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बुधवार, 21 मार्च 2012

गौरेया का दिन

बहुत
कम जगह
सुना है
अब वो 

पायी
जाती हैं
लेकिन
गौरेया 

बिना नागा
सुबह यहाँ 

जरूर
आती हैंं

खेत की
झाड़ियों 
में
हो कर इकट्ठा 

हल्ला मचाती
चहचहाती हैं

दाना पाने
की उम्मीद में
फिर आंगन
में आकर
सब बैठ
जाती हैं

एक लड़की
जो करती है
उनकी
रखवाली
सुबह
सवेरे ही
उठ के
आती है
झाडू़
लगाती है
आंगन में
उनके लिये

खुश हो कर
वो चावल
के दाने
भी फैलाती है

कोने कोने
के घौंसलों
में 
आजकल

उनके
बच्चों की
चीं चीं की
आवाज
कानों
में घंटी
बजाये
जाती है

दाना ले
जा कर
गौरेया
उनको
खिलाये
जाती हैं

बिल्लियाँ
मेरे पड़ौस
की रहती हैं
उनकी ताक में
बिल्लियों
को लड़की
झाडू़ फेंक
कर भगाये
जाती है

बाज
होता है
बिल्ली से
फुर्तीला
कभी एक
दो को
ले कर
ऊड़ ही
जाता है

लड़की
उदास
हो जाती है
उस दिन
लेकिन
फिर से
अपने
काम पर
हमेशा
की तरह
तैनात
हो जाती है

गौरेया
से है
उसका
बहुत याराना
चावल
ना मिले तो
लड़की के
कंधों पर
आकर
चढ़ जाती हैं

छोटी सी
गौरेया
का दिन
है आज
देखा था
अखबार में
छपा था
दिन पर दिन
कम होते
जाती हैं

घर पर
हमारे बहुत
हो गयी हैं
जो
चहचहाती हैं
रोज
आती है
दाना
ले जाती हैं
फुर्र से
उड़ जाती हैं ।

बुधवार, 7 दिसंबर 2011

गौरैया

गौरैया
रोज की
तरह आज
सुबह चावल
के चार दाने
खा के उड़ गयी
गौरैया
रोज आती है
एक मुट्टी चावल
से बस चार दाने
ही उठाती है
पता नहीं क्यों
गौरेया
सपने नहीं देखती
होगी शायद
आदमी
चावल के बोरों
की गिनती करते
हुवे कभी नहीं थकता
चार मुट्ठी चावल
उसकी किस्मत
में होना जरूरी
तो नहीं फिर भी
अधिकतर
होते ही हैं
उसे मालूम है
अच्छी तरह
जाते जाते
सारी बंद मुट्ठियां
खुली रह जाती है
और उनमें चावल
का एक दाना
भी नहीं होता
गौरैया
शायद ये
जानती होगी

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