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रविवार, 12 जनवरी 2014

मिर्ची क्यों लग रही है अगर तेरी दुकान के बगल में कोई नयी दुकान लगा रहा है

माना कि नई दुकान
एक पुरानी दुकानों के
बाजार में घुस कर
कोई खोल बैठा है
पुराना ग्राहक इतने से
में ही पता नहीं क्यों
आपा खो बैठा है
खरीदता है सामान
भी अपनी ही दुकान
से धेले भर का
नई दुकान के नये
ग्राहकों को खाली पीली
धौंस पता नहीं
क्यों इतना देता है
अपने मतलब के समय
एक दुकानदार दूसरे
दुकानदार को माल
भी जो चाहे दे देता है
ग्राहक एक का
बेवकूफ जैसा
दूसरे के ग्राहक से
खाली पीली में
ही उलझ लेता है
पचास साठ सालों से
एक्स्पायरी का सामान
ग्राहकों को भिड़ा रहे हैं
ऐसे दुकानदारों के
कैलेण्डर ग्राहक
अपने अपने घर पर
जरूर लगा रहे हैं
माल सारा दुकानदारों
के खातों में ही
फिसल के जा रहा है
बाजार चढ़ते चढ़ते
बैठा दिया जा रहा है
नफा ही नफा हो रहा है
पुरानी दुकानों को
थोड़ा बहुत कमीशन
ग्राहकों में अपने अपने
पहुंचा दिया जा रहा है
ग्राहक लगे हैं अपनी
अपनी दुकानो के
विज्ञापन सजाने में
कोई अपने घर का
कोई बाजार का माल
यूं ही लुटा रहा है
क्या फर्क पड़ता है
ऐसे में अगर कोई
एक नई दुकान
कुछ दिन के लिये
ही सही यहाँ लगा रहा है
खरीदो आप अपनी ही
दुकान का कैसा भी सामान
क्यों चिढ़ रहे हो
अगर कोई नई दुकान
की तरफ जा रहा है
बाजार लुट रही है
कब से पता है तुम्हें भी
फिर आज ही सबको
रोना सा क्यों आ रहा है
बहुत जरूरी हो गया है
अब इस बाजार में
एक अकेला कैसे
सारी बाजार को लूट कर
अपनो में ही कमीशन
बटवा रहा हैं
तुम करते रहो धंदा
अपने इलाके में
अपने हिसाब से
एक नये दुकानदार की
दुकानदारी कुछ दिन
देख लेने में
किसी का क्या
जा रहा है !

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