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बुधवार, 13 नवंबर 2013

चारा लूटने पर तो नहीं बोला था कि घबराहट सी हो जाती है

बहुत बैचैनी है तुझे
कभी कभी समझ से
बाहर हो जाती है
अपनी अपनी सबकी
हैसियत होती है
दिखानी भी बहुत
जरूरी हो जाती है
जरूरत की
होती हैं चीजें
तभी उधार लेकर
भी खरीदी जाती हैं
कौन सा देना होता है
किसी को
एक साथ वापस
कुछ किश्तें ही तो
बांध दी जाती हैं
गर्व की बात हो जाये
कोई चीज
किसी के लिये
ऐसे वैसे ही बिना
जेब ढीली किये तो
नहीं हो जाती है
जब जा रही हो
बहुत ही दूर कहीं
पगड़ी देश की
क्या होना है
रास्ते में थोड़ा सा
सर से नीचे अगर
खिसक भी जाती है
लाख करोड़ की कई
थैलियां यूं ही इधर से
उधर हो जाती हैं
ध्यान भी
नहीं देता कोई
ऐसे समाचारों पर
जब रोज ही
आना इनका
आम सी बात
हो जाती है
महान है गाय
तक जहां की
करोड़ों की
घास खा जाती है
तीसरी कक्षा
तक पहुंचने
के बाद ही तो
लड़खड़ाया है
वो भी थोड़ा सा
की खबर
देश की धड़कन को
अगर कुछ बढ़ाती है
तेरा कौन सा क्या
चला जाने वाला है
इस पर
यही बात मेरे
बिल्कुल भी
समझ में
नहीं आती है ।

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