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सोमवार, 9 जून 2014

दुनियाँ है रंग अपने ही दिखाती है

भैंस के बराबर
काले अक्षरों को
रोज चरागाह पर
चराने की आदत
किसी को हो जाना
एक अच्छी बात है
अक्षरों के साथ
खेलते खेलते
घास की तरह
उनको उगाना
शुरु हो जाना
बहुत बुरी बात है
बिना एक सोच के
खाली लोटे जैसे
दिमाग में शायद
हवा भी रहना
नहीं चाहती है
ऐसे में ही सोच
खाली में से
खाली खाली ही
कुछ बाहर निकाल
कर ले आती है
उसी तरह से जैसे
किसी कलाकार की
कूँची किसी एक को
एक छोटा सा झाड़ू
जैसा नजर आती है
साफ जगह होने से
कुछ नहीं होता है
झाड़ने की आदत
से मजबूर सफाई
को तक बुहारना
शुरु हो जाती है
बहुत कुछ होता है
आसपास के लोगों
के दिमाग में
और हाथ में भी
पर मंद बुद्धी का
क्या किया जाये
वो अपनी बेवकूफियों
के हीरों के सिवाय
कुछ भी देखना
नहीं चाहती है
और क्या किया जाये
‘उलूक’ तेरी इस
फितरत का जो
सोती भी है
सपने भी देखती है
नींद में होने के
बावजूद आँखे
पूरी की पूरी खुली
नजर भी आती हैं ।

सोमवार, 31 मार्च 2014

अपने खेत की खरपतवार को, देखिये जरा, देश से बड़ा बता रहा है

ट्रिंग ट्रिंग ट्रिंग ट्रिंग
हैल्लो हैल्लो ये लो 

घर पर ही हो क्या?
क्या कर रहे हो?

कुछ नहीं
बस खेत में
कुछ सब्जी
लगाई है
बहुत सारी
खरपतवार
अगल बगल
पौंधौं के
बिना बोये
उग आई है
उसी को
उखाड़ रहा हूँ
अपनी और
अपने खेत
की किस्मत
सुधार रहा हूँ 


आज तो
वित्तीय वर्ष
पूरा होने
जा रहा है
हिसाब
किताब
उधर का
कौन बना
रहा है?


तुम भी
किस जमाने
में जी रहे
हो भाई
गैर सरकारी
संस्था यानी
एन जी ओ
से आजकल
जो चाहो
करवा लिया
जा रहा है
कमीशन
नियत होता है
उसी का
कोई आदमी
बिना तारीख
पड़ी पर्चियों
पर मार्च की
मुहर लगा
रहा है
अखबार
नहीं पहुँचा
लगता है
स्कूल के
पुस्तकालय
का अभी
तक घर
में आपके
पढ़ लेना
चुनाव की
खबरों में
लिखा भी
आ रहा है
किसका कौन
सा सरकारी
और कौन सा
गैर सरकारी
कहाँ किस
जगह पर
किस के लिये
सेंध लगा रहा है
कहाँ कच्ची हो
रही हैं वोट और
कहाँ धोखा होने
का अंदेशा
नजर आ रहा है 


भाई जी
आप ने भी तो आज
चुनाव कार्यालय की
तरफ दौड़ अभी तक
नहीं लगाई है
लगता है तुम्हारा ही
हिसाब किताब कहीं
कुछ गड़बड़ा रहा है
आजकल जहाँ मास्टर
स्कूल नहीं जा रहा है
डाक्टर अस्पताल से
गोल हो जा रहा है
वकील मुकदमें की
तारीखें बदलवा रहा है
हर किसी के पास
एक ना एक टोपी या
बिल्ला नजर आ रहा है
अवकाश प्राप्त लोगों
के लिये सोने में
सुहागा हो जा रहा है
बीबी की चिक चिक
को घर पर छोड़ कर
लाऊड स्पीकर लिये
बैठा हुआ नजर
यहाँ और वहाँ भी
आ रहा है
जोश सब में है
हर कोई देश के
लिये ही जैसे
आज और अभी
सीमा पर जा रहा है
तन मन धन
कुर्बान करने की
मंसा जता रहा है
वाकई में महसूस
हो रहा है इस बार
बस इस बार
भारतीय राष्ट्रीय चरित्र
का मानकीकरण
होने ही जा रहा है
लेकिन अफसोस
कुछ लोग तेरे
जैसे भी हैं ‘उलूक’
जिंन्हें देश से बड़ा
अपना खेत
नजर आ रहा है
जैसा दिमाग में है
वैसी ही घास को
अपने खेत से
उखाड़ने में एक
स्वर्णिम समय
को गवाँ रहा है ।

बुधवार, 13 नवंबर 2013

चारा लूटने पर तो नहीं बोला था कि घबराहट सी हो जाती है

बहुत बैचैनी है तुझे
कभी कभी समझ से
बाहर हो जाती है
अपनी अपनी सबकी
हैसियत होती है
दिखानी भी बहुत
जरूरी हो जाती है
जरूरत की
होती हैं चीजें
तभी उधार लेकर
भी खरीदी जाती हैं
कौन सा देना होता है
किसी को
एक साथ वापस
कुछ किश्तें ही तो
बांध दी जाती हैं
गर्व की बात हो जाये
कोई चीज
किसी के लिये
ऐसे वैसे ही बिना
जेब ढीली किये तो
नहीं हो जाती है
जब जा रही हो
बहुत ही दूर कहीं
पगड़ी देश की
क्या होना है
रास्ते में थोड़ा सा
सर से नीचे अगर
खिसक भी जाती है
लाख करोड़ की कई
थैलियां यूं ही इधर से
उधर हो जाती हैं
ध्यान भी
नहीं देता कोई
ऐसे समाचारों पर
जब रोज ही
आना इनका
आम सी बात
हो जाती है
महान है गाय
तक जहां की
करोड़ों की
घास खा जाती है
तीसरी कक्षा
तक पहुंचने
के बाद ही तो
लड़खड़ाया है
वो भी थोड़ा सा
की खबर
देश की धड़कन को
अगर कुछ बढ़ाती है
तेरा कौन सा क्या
चला जाने वाला है
इस पर
यही बात मेरे
बिल्कुल भी
समझ में
नहीं आती है ।

शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

फसल तो होती है किसान ध्यान दे जरूरी नहीं होता है

ना कहीं खेत होता है
ना ही कहीं रेत होती है
ना किसी तरह की खाद की
और ना ही पानी की कभी
कहीं जरूरत होती है
फिर भी कुछ ना कुछ
उगता रहता है
हर किसी के पास
हर क्षण हर पल
अलग अलग तरह से
कहीं सब्जी तो कहीं फल
किसी को काटनी
आती है फसल
किसी को आती है
पसंद बस घास उगानी
काम फसल भी आती है
और उतना ही घास भी
शब्दों को बोना हर किसी के
बस का नहीं होता है
इसके बावजूद कुछ ना कुछ
उगता चला जाता है
काटना आता है जिसे
काट ले जाता है
नहीं काट पाये कोई
तब भी कुछ नहीं होता है
अब कैसे कहा जाये
हर तरह का पागलपन
हर किसे के बस
का नहीं होता है
कुकुरमुत्ते भी तो
उगाये नहीं जाते हैं
उग आते हैं अपने आप
कब कहाँ उग जायें
किसी को भी
पता नहीं होता है
पर कुछ कुकुरमुत्ते
मशरूम हो जाते हैं
सोच समझ कर अगर
कहीं कोई बो लेता है
रेगिस्तान हो सकता है
कैक्टस दिख सकता है
कोई लम्हा कहा जा सके
कहीं एक बंजर होता है
बस शायद ऐसा ही
कहीं नहीं होता है ।

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