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शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

शुतुरमुर्ग और शुतुरमुर्ग

कम नहीं हैं
बहुत हैं
चारों तरफ हैं
 फिर भी
मानते नहीं हैं
कि हैं
हो सकता है
नहीं भी होते हों
उनकी सोच में वो
बस सोच की
ही तो बात है
देखने की
बात है ही नहीं
हो भी नहीं
सकती है
जब गर्दन
किसी भी
शुतुरमुर्ग की
रेत के अन्दर
घुसी हुई हो
कितनी अजीब
बात है
है ना
आँख वाले
के पास देखने
का काम
जरा सा भी
ना हो
और सारे
शुतुरमुर्गों
के हाथ में
हो सारे देखने
दिखाने के
काम सारे
सभी कुछ
गर्दन भी हो
चेहरा भी हो
जो भी हो
घुसा हुआ हो
और
चारों तरफ
रेत हो
बस रेत
ही रेत हो
शुतुरमुर्ग
होने मे कोई
बुराई नहीं है
शुतुरमुर्ग होने
के लिये कहीं
मनाही नहीं है
कुछ होते ही हैं
शुतुरमुर्ग
मानते भी हैं
कि हैं
मना भी
नहीं करते हैं
शुतुरमुर्ग की
तरह रहते भी हैं
मौज करते हैं 
बेशरम शुतुरमुर्ग
नहीं कह सकते हैं
अपनी मर्जी से
रेत में गर्दन भी
घुसा सकते हैं
ईमानदार होते हैं
देखने दिखाने
और बताने का
कोई भी ठेका
नहीं लेते हैं
‘उलूक’
बकवास करना
बंद कर
गर्दन खींच
और घुसेड़ ले
जमीन के अन्दर
और देख
बहुत कुछ
दिखाई देगा
शुतुरमुर्गो
नाराज मत होना
बात शुतुरमुर्गों
की नहीं हो रही है
बात हो रही है
देखने दिखाने
और
बताने की
गर्दन घुसेड़ कर
रेत के अन्दर ।

चित्र साभार: www.patheos.com

रविवार, 9 अगस्त 2015

समझ में आता है कभी शुतुरमुर्ग क्यों रेत में गरदन घुसाता है

कुछ खूबसूरत सा
नहीं लिख पाता है
कोशिश भी करता है
नहीं लिखा जाता है
किसने कह दिया
मायूस होने के लिये
कभी निकल के देख
अपनी बदसूरत सोच
के दायरे से बाहर
बदसूरतों के बदसूरत से
रास्तों में हमेशा ही
क्यों दौड़ जाता है
बहुत सा बहुत कुछ
और भी है खूबसूरत है
खूबसूरती से उतारता है
खूबसूरत लफ्जों को
लिखा हुआ हर तरफ
सभी कुछ खूबसूरत
और बस खूबसूरत
सा नजर आता है
सब कुछ मिलता है
उस लिखे लिखाये में
चाँद होता है तारे होते हैं
आसमान होता है
हवा होती है
चिड़िया होती है
आवाजें बहुत सी होती हैं
सब कविता होती हैं
या केवल गीत होती हैं
इसीलिये हर खूबसूरत
उसी दायरे के
कहीं ना कहीं आसपास
में ही पाया जाता है
कभी किसी दिन
झूठ ही सही
अपनी उल्टी सोच के
कटोरे से बाहर निकल
कर क्यों नहीं आता है
अच्छा लगेगा तुझे भी
और उसे भी ‘उलूक’
होने दे जो हो रहा है
करने दे जो भी
जहाँ भी कर रहा है
कीचड़ में कैसे
खिलता होगा कमल
असहनीय सड़ाँध में
भी खिलखिलाता है
सोच कर देख तो सही
कोशिश करके
बदसूरती के बीच
कभी खूबसूरती से
कुछ खूबसूरत
भी लिखा जाता है ।

चित्र साभार: www.moonbattery.com

सोमवार, 29 सितंबर 2014

सोच तो सोच है सोचने में क्या जाता है और क्या होता है अगर कोई सोच कर बौखलाता है

अपने कुछ भी
सोचे हुऐ पर
कुछ नहीं
कह रहा हूँ
मेरे सोचे गये
कुछ पर कुछ
उसके अपने
नजरिये से
सोच दिये गये
पर कुछ सोच
कर कहने की
कोशिश कर
ले रहा हूँ
बड़ी अजीब
सी पहेली है
एक एक का
अपना खुद
का सोचना है
और दूसरा
एक के कुछ
सोचे हुऐ पर
किसी दूसरे का
कुछ भी
सोच लेना है
अब कुछ सोच
कर ही कुछ
लिखा जाता है
बिना सोचे कुछ
लिख लेने वाला
होता भी है
ऐसा सोचा भी
कहाँ जाता है
कहने को तो
अपनी सोच
के हिसाब से
किसी पर भी
कोई भी कुछ भी
कह जाता है
दूसरा उस हिसाब
पर सोचने लायक
भी हो ये भी जरूरी
नहीं हो जाता है
इसलिये सोचने पर
किसी के रोक
कहीं लगाई भी
नहीं जाती है
सोच सोच होती है
समझाई भी
नहीं जाती है
अपनी अपनी
सोच में सब
अपने हिसाब से
सोच ही ले जाते हैं
दूसरे की सोच से
सोचने वाले भी
होते है थोड़े कुछ
अजूबे होते भी हैं
और इसी दुनियाँ
में पाये भी जाते हैं
‘उलूक’ तेरे सोच
दिये गये कुछ पर
अगर कोई अपने
हिसाब से कुछ
सोच लेना चाहता है
तो वो जाने
उसकी सोच जाने
उसके सोचने पर
तू क्यों अपनी
सोच की टाँग
घुसाना चाहता है
बिना सोचे ही
कह ले जो कुछ
कहना चाहता है
होना कुछ भी
नहीं है कहीं भी
किसी की सोच में
कुछ आता है
या नहीं आता है ।

चित्र साभार: http://www.canstockphoto.com

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