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गुरुवार, 17 अक्तूबर 2013

आदमी जानवर को लिखना क्यों नहीं सिखाता है !

घोडे‌ बैल या गधे को
अपने आप कहां
कुछ आ पाता है
बोझ उठाना वो ही
उसको सिखाता है
जिसके हाथ मे‌ जा
कर पड़ जाता है
क्या उठाना है
कैसे उठाना है
किसका उठाना है
इस तरह की बात
कोई भी नहीं कहीं
सिखा पाता है
एक मालिक का
एक जानवर जब
दूसरे मालिक का
जानवर हो जाता है
कोशिश करता है
नये माहौल में भी
उसी तरह ढल जाता है
एक घर का एक
दूसरे घर का दूसरा
होने तक तो सब
सामान्य सा ही
नजर आता है
एक मौहल्ले का एक
होने के बाद से ही
बबाल शुरु हो जाता है
एक जान एक काम
बहुत अच्छी तरह से
करना चाहता है
क्या करे अगर कोई
लादना चाहता है
और दूसरा उसी समय
जोतना चाहता है
जानवर इतने के लिये
जानवर ही होता है
आदमी ना जाने
क्यों सोचता है कि
उसके कहने से तो
बैठ जाता है और
मेरे कहने पर सलाम
ठोकने को नहीं आता है
अब ऐसे में तीसरा आदमी
भी कुछ नहीं पाता है
आदमी के बारे में 
सोचने की फुर्सत नहीं
हो जिसके पास
जानवर की समस्या में
टांग अड़ाने की हिम्मत
नही‌ कर पाता है ।

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