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शनिवार, 9 मई 2015

लिखने लिखाने वालों का लिखना लिखना तेरा लिखना लिखाना लिखने जैसा ही नहीं

लिखने लिखाने
की बातें वैसे बहुत
कम की जाती हैं
कभी कभी
गलतियाँ
भी मगर हो
ही जाती हैं
बातों बातों में
पूछ बैठा कोई कहीं
लिखने वाले से ही
लिखने लिखाने
के बावत यूँ ही
क्यों लिखते हो
कहाँ लिखते हो
क्या लिखते हो
ज्यादा कुछ नहीं
कुछ ही बताओ
मगर बताओ तो सही
हम तो बताते भी हैं
लिखते लिखाते भी हैं
छपते छपाते भी हैं
किताबों में कहीं
अखबारों में कहीं
तुम तो दिखते नहीं
लिखते हुऐ भी कहीं
पढ़े तो क्या पढ़े
कैसे पढ़े कुछ कोई
लिखने वाले के
लिये ऐसा नहीं
किसी ने पूछी हो
नई बात अब कोई
उसे मालूम है
वो भी लिखता है कुछ
कुछ भी कभी भी
कहीं भी बस यूँ ही
लिखता है
जिनके कामों को
जिनकी बातों को
उनको करने
कराने से ही
फुरसत नहीं
पढ़ने आते हैं मगर
कुछ भटकते हुऐ
जो पढ़ते तो हैं
लिखे हुऐ को यहीं
पल्ले पढ़ता है कुछ
या कुछ भी नहीं
पढ़ने वाला ही तो
कुछ कहीं लिखता नहीं ।

चित्र साभार: fashions-cloud.com

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