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शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

पागलों के साथ कौन खड़ा होना चाहता है ?

किसी को कुछ
समझाने के लिये
नहीं कहता है
‘उलूक’ आदतन
बड़बड़ाता है
देखता है अपने
चश्मे से अपना
घर जैसा
है जो भी
सामने से
नजर आता है
बक बका जाता
है कुछ भी
अखबार में जो
कभी भी
नहीं आता है
तेरे घर में नहीं
होता होगा
अच्छी बात है
उसके घर में
बबाल होता है
रोज कुछ ना
कुछ बेवकूफ
रोज आकर
साफ साफ
बता जाता है
रुपिये पैसे का
हिसाब कौन
करता है
सामने आकर
पीछे पीछे
बहुत कुछ
किया जाता है
अभी तैयारियाँ
चल रही है
नाक के लिये
नाक बचाने
के लिये झूठ
पर झूठ
अखबार में दिखे
सच्चों से बोला
जाता है
कौन कह रहा है
झूठ को झूठ
कुछ भी कह
दीजिये हर कोई
झूठ के छाते के
नीचे आकर खड़ा
होना चाहता है
किसी में नहीं है
हिम्मत सच के
लिये खड़े होने
के लिये हर कोई
सच को झूठा
बनाना चाहता है
‘उलूक’ के साथ
कोई भी नहीं है
ना होगा कभी
पागलों के साथ
खड़ा होना भी
कौन चाहता है ।

 चित्रसाभार: www.clipartsheep.com

शनिवार, 25 जुलाई 2015

किया कराया दिख जाता है बस देखने वाली आँखों को खोलना आना चाहिये

बहुत कुछ
दिख जाता है
सामने वाले
की आँखों में
बस देखने का
एक नजरिया
होना चाहिये
सभी कुछ
एक सा ही
होता है
जब आदमी
के सामने से
आदमी होता है
बस चश्मा
सामने वाले
की आँखों में
नहीं होना चाहिये
आँखों में आँखे
डाल कर देखने
की बात ही कुछ
और होती है
कितनी भी
गहराई हो
आँख तो बस
आँख होती है
तैरना भी हो
सकता है वहीं
डूबना भी हो
सकता है कहीं
बस डूबने मरने
की सोच कर
डरना नहीं चाहिये
निपटा दिया गया
कुछ भी काम
छुप नहीं पाता है
कितना भी ढकने
की कोशिश
कर ले कोई
छुपा नहीं पाता है
मुँह से राम
निकलता हुआ
सुनाई भी देता है
पर आँखों में
सीता हरण साफ
दिखाई दे जाता है
आँखों में देखना
शुरु कर ही दिया
हो अगर फिर
आँखों से आँखों
को हटाना
नहीं चाहिये
निकलती हैं
कहानियाँ
कहानियों में से ही
बहुत इफरात में
‘उलूक’
कितना भी दफन
कर ले कोई जमीन
के नीचे गहराई में
बस मिट्टी को हाथों
से खोदने में
शर्माना नहीं चाहिये ।

चित्र साभार: www.123rf.com

शनिवार, 7 सितंबर 2013

पहचान नहीं बना पायेगा सलीका अपना अगर दिखायेगा !


जिंदगी कोई चावल
और दाल के बडे़ दाने
की तरह नहीं है कि
बिना चश्मा लगाये
साफ कर ले जायेगा
जीवन को सीधा सीधा
चलाने की कोशिश करने
वाले तेरी समझ में
कभी ये भी आजायेगा
जब तरतीब और सलीके से
साफ किये जा चुके
जिंदगी के रामदाने
का डिब्बा तेरे हाथ
से फिसल जायेगा
डब्बे का ढक्कन खुला नहीं
कि दाना दाना मिट्टी में
बिखर कर फैल जायेगा
समय रहते अपने
आस पास के माहौल से
अगर तू अभी भी
कुछ नहीं सीख पायेगा
खुद भी परेशान रहेगा
लोगों की परेशानियों
को भी बढा़येगा
तरतीब से लगी
जिंदगी की किताबें
किसी काम की
नहीं हैं होती
सलीकेदार आदमी की
पहचान होना सबसे
बुरी एक बात है होती
आज सबसे सफल
वो ही कहलाता है
जिसका हर काम
फैला हुआ हर जगह
पर नजर आता है
एक काम को
एक समय में
ध्यान लगा
कर करने वाला
सबसे बड़ा एक
बेवकूफ कहलाता है
बहुत सारे आधे अधूरे
कामों को एक साथ
अपने पास रखना
और अधूरा रहने
देना ही आज के
समय में दक्षता की
परिभाषा बनाता है
इनमें सबसे महत्वपूर्ण
जो होता है वो हिसाब
किताब करना कहलाता है
जिंदगी की किताब का
हिसाब हो या उसके
हिसाब की किताब हो
इसमें अगर कोई
माहिर हो जाता है
ऊपर वाला भी ऎसी
विभूतियों को ऊपर
जल्दी बुलाने से
बहुत कतराता है
इन सबको साफ
सुथरा रखने वाला
कभी एक गल्ती भी
अगर कर जाता है
बेचारा पकड़ में
जरूर आ जाता है
अपनी जिंदगी भर की
कमाई गई एकमात्र
इज्जत को गंवाता है
सियार की तरह
होशियार रहने वाला
कभी किसी चीज को
तरतीब से इसी लिये
नहीं लगाता है
घर में हो या शहर में हो
एक उबड़खाबड़ अंदाज
से हमेशा पेश आता है
हजार कमियाँ होती हैं
किताब में या हिसाब में
फिर भी किसी से कहीं
नहीं पकड़ा जाता है
अपनी एक अलग
ही छवि बनाता है
समझने लायक
कुछ होता नहीं है
किसी में ऎसे अनबूझ
को समझने के लिये
कोई दिमाग भी
अपना नहीं लगाता है
ऎसे समय में ही
तो महसूस होता है
तरतीब से करना
और सलीके से रहना
कितना बड़ा बबाल
जिंदगी का हो जाता है
एक छोटे दिमाग वाला
भी समझने के लिये
चला आता है
बचना इन सब से
अगर आज भी
तू चाहता है
सब कुछ अपना भी
मिट्टी में फैले हुवे
रामदाने के दानों की
तरह क्यों नहीं
बना ले जाता है ।

शनिवार, 13 अक्तूबर 2012

मूल्याँकन का मूल्याँकन

दो सप्ताह से व्यस्त
नजर आ रहे थे
प्रोफेसर साहब
मूल्याँकन केन्द्र पर
बहुत दूर से आया हूँ
सबको बता रहे थे
कर्मचारी उनके बहुत ही
कायल होते जा रहे थे
कापियों के बंडल के बंडल
मिनटों में निपटा रहे थे
जाने के दिन जब
अपना पारिश्रमिक बिल
बनाने जा ही रहे थे
पचास हजार की
जाँच चुके हैं अब तक
सोच सोच कर खुश
हुऎ जा रहे थे
पर कुछ कुछ परेशान
सा भी नजर आ रहे थे
पूछने पर बता रहे थे
कि देख ही नहीं पा रहे थे
एक देखने वाले चश्में की
जरूरत है बता रहे थे
मूल्याँकन केन्द्र के प्रभारी
अपना सिर खुजला रहे थे
प्रोफेसर साहब को अपनी राय
फालतू में दिये जा रहे थे
अपना चश्मा वो गेस्ट हाउस
जाकर क्यों नहीं ले आ रहे थे
भोली सी सूरत बना के
प्रोफेसर साहब बता रहे थे
अपना चश्मा वो तो पहले ही
अपने घर पर ही भूल कर
यहाँ पर आ रहे थे
मूल्याँकन केन्द्र प्रभारी
अपने चपरासी से
एक गिलास पानी ले आ
कह कर रोने जैसा मुँह
पता नहीं क्यों बना रहे थे !

मंगलवार, 14 फ़रवरी 2012

समय

कोयल की तरह
कूँकने वाली
हिरन की मस्त
चाल चलने वाली
बहुत भाती थी
मनमोहनी रोज
सुबह गली को
एक खुश्बू से
महकाते हुवे
गुजर जाती थी
दिन बरस साल
गुजर गये
मनमौजी रोजमर्रा
की दुकानदारी में
उलझ गये
अचानक एक दिन
याद कर बैठे
तो किसी ने बताया
हिरनी तो नहीं
हाँ रोज एक हथिनी
गली से आती जाती
पूरा मोह्ल्ला हिलाती है
आवाज जिसकी
छोटे बच्चों को
डराती है
समय की बलिहारी है
पता नहीं कहाँ कहाँ
इसने मार मारी है
कब किस समय
कौन कबूतर से कौवा
हो जाता है
समय ये कहाँ बता
पाता है
मनमौजी सोच में
डूब जाता है
बही उठाता है
चश्मा आँखों में
चढा़ता है
फिर बड़बड़ाता है
बेकार है अपने बारे
में किसी से कुछ
पूछना
जरूर परिवर्तन
यहाँ भी बहुत
आया होगा
जब हिरनी हथिनी
बना दी गयी
मुझ उल्लू को
पक्का ऊपर वाले ने
इतने समय में
एक गधा ही
बनाया होगा।

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